श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 9: मुक्ति  »  अध्याय 4: दुर्वासा मुनि द्वारा अम्बरीष महाराज का अपमान  »  श्लोक 1

 
श्लोक
श्रीशुक उवाच
नाभागो नभगापत्यं यं ततं भ्रातर: कविम् ।
यविष्ठं व्यभजन् दायं ब्रह्मचारिणमागतम् ॥ १ ॥
 
शब्दार्थ
श्री-शुक: उवाच—श्रीशुकदेव गोस्वामी ने कहा; नाभाग:—नाभाग; नभग-अपत्यम्—जो महाराज नभग का पुत्र था; यम्—जिस; ततम्—पिता को; भ्रातर:—बड़े भाइयों ने; कविम्—विद्वान; यविष्ठम्—सबसे छोटा; व्यभजन्—बाँट दिया; दायम्—धन; ब्रह्मचारिणम्—ब्रह्मचारी जीवन स्वीकार करके (नैष्ठिक); आगतम्—वापस आया ।.
 
अनुवाद
 
 शुकदेव गोस्वामी ने कहा : नभग का पुत्र नाभाग बहुत काल तक अपने गुरु के पास रहा। अतएव उसके भाइयों ने सोचा कि अब वह गृहस्थ नहीं बनना चाहता और वापस नहीं आएगा। फलस्वरूप उन्होंने अपने पिता की सम्पत्ति में उसका हिस्सा न रख कर उसे आपस में बाँट लिया। जब नाभाग अपने गुरु के स्थान से वापस आया तो उन्होंने उसके हिस्से के रूप में उसे अपने पिता को दे दिया।
 
तात्पर्य
 ब्रह्मचारी दो प्रकार के होते हैं। एक तो वे जो घर लौटकर विवाह करके गृहस्थ बन जाते हैं और दूसरे वे जो आजीवन ब्रह्मचारी बने रहने का व्रत लेते हैं और बृहद्व्रत कहलाते हैं। बृहद्व्रत ब्रह्मचारी गुरु के स्थान से वापस नहीं आता, अपितु वहीं रहता है और बाद में वहीं संन्यास
ग्रहण कर लेता है। क्योंकि नाभाग अपने गुरु के स्थान से वापस नहीं आया अत: उसके भाइयों ने सोचा कि उसने बृहद्व्रत ब्रह्मचर्य ग्रहण कर लिया है। इसीलिए उन्होंने उसका हिस्सा सुरक्षित नहीं रखा और जब वह लौटा तो उसके हिस्से के रूप में उसे अपने पिता को दे दिया।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥