श्रीमद् भागवतम
शब्द आकार

भागवत पुराण  »  स्कन्ध 9: मुक्ति  »  अध्याय 4: दुर्वासा मुनि द्वारा अम्बरीष महाराज का अपमान  »  श्लोक 15-16

 
श्लोक
श्रीशुक उवाच
अम्बरीषो महाभाग: सप्तद्वीपवतीं महीम् ।
अव्ययां च श्रियं लब्ध्वा विभवं चातुलं भुवि ॥ १५ ॥
मेनेऽतिदुर्लभं पुंसां सर्वं तत् स्वप्नसंस्तुतम् ।
विद्वान् विभवनिर्वाणं तमो विशति यत् पुमान् ॥ १६ ॥
 
शब्दार्थ
श्री-शुक: उवाच—श्रीशुकदेव गोस्वामी ने कहा; अम्बरीष:—राजा अम्बरीष; महा-भाग:—अत्यन्त भाग्यशाली राजा; सप्त द्वीपवतीम्—सात द्वीपों वाले; महीम्—सारे विश्व को; अव्ययाम् च—तथा न घटने वाली; श्रियम्—सुन्दरता को; लब्ध्वा—प्राप्त करके; विभवम् च—तथा ऐश्वर्य; अतुलम्—असीम; भुवि—पृथ्वी पर; मेने—उसने निश्चय किया; अति-दुर्लभम्—बहुत कम प्राप्त; पुंसाम्—अनेक व्यक्तियों का; सर्वम्—सर्वस्व; तत्—जो; स्वप्न-संस्तुतम्—मानो स्वप्न में कल्पना की गई हो; विद्वान्—पूरी तरह जानते हुए; विभव-निर्वाणम्—उस ऐश्वर्य का विनाश; तम:—अज्ञान; विशति—प्रवेश करता है; यत्—जिससे; पुमान्—व्यक्ति ।.
 
अनुवाद
 
 शुकदेव गोस्वामी ने कहा : अत्यन्त भाग्यवान महाराज अम्बरीष ने सात द्वीपों वाले समस्त विश्व पर शासन किया और पृथ्वी का अक्षय असीम ऐश्वर्य तथा सम्पन्नता प्राप्त की। यद्यपि ऐसा पद विरले ही मिलता है, किन्तु महाराज अम्बरीष ने इसकी तनिक भी परवाह नहीं की क्योंकि उन्हें पता था कि ऐसा सारा ऐश्वर्य भौतिक है। ऐसा ऐश्वर्य स्वप्नतुल्य है और अन्ततोगत्वा विनष्ट हो जायेगा। राजा जानता था कि कोई भी अभक्त ऐसा ऐश्वर्य प्राप्त करके प्रकृति के तमोगुण में अधिकाधिक प्रविष्ट होता है।
 
तात्पर्य
 भक्त के लिए भौतिक ऐश्वर्य नगण्य है, किन्तु अभक्त के लिए वही ऐश्वर्य अधिकाधिक बन्धन का कारण होता है क्योंकि भक्त जानता है कि कोई भी भौतिक वस्तु नश्वर है जब कि अभक्त
तथाकथित क्षणिक सुख को सर्वस्व मानकर आत्म-साक्षात्कार का मार्ग भूल जाता है। इस प्रकार अभक्त के लिए भौतिक ऐश्वर्य आध्यात्मिक उन्नति के मार्ग में बाधक होता है।
____________________________
 
All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥