श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 9: मुक्ति  »  अध्याय 4: दुर्वासा मुनि द्वारा अम्बरीष महाराज का अपमान  »  श्लोक 21

 
श्लोक
एवं सदा कर्मकलापमात्मन:
परेऽधियज्ञे भगवत्यधोक्षजे ।
सर्वात्मभावं विदधन्महीमिमां
तन्निष्ठविप्राभिहित: शशास ह ॥ २१ ॥
 
शब्दार्थ
एवम्—इस प्रकार (भक्तिमय जीवन बिताते हुए); सदा—सदैव; कर्म-कलापम्—क्षत्रिय राजा के रूप में नियत कार्य; आत्मन:— अपना, स्वयं; परे—परब्रह्म में; अधियज्ञे—परम नियंत्रक, परम भोक्ता में; भगवति—भगवान् में; अधोक्षजे—इन्द्रियबोध से परे जो है उस; सर्व-आत्म-भावम्—भक्ति के विविध प्रकार; विदधत्—सम्पन्न करते हुए, अर्पित करते हुए; महीम्—पृथ्वीलोक को; इमाम्— इस; तत्-निष्ठ—जो भगवान् के निष्ठावान भक्त हैं; विप्र—ऐसे ब्राह्मणों द्वारा; अभिहित:—निर्देशित; शशास—शासन किया; ह— भूतकाल में ।.
 
अनुवाद
 
 राजा के रूप में अपने नियत कर्तव्यों का पालन करते हुए महाराज अम्बरीष अपने राजसी कार्यकलापों के फलों को सदैव भगवान् कृष्ण को अर्पित करते थे, जो प्रत्येक वस्तु के भोक्ता हैं और भौतिक इन्द्रियों के बोध के परे हैं। वे निश्चित रूप से निष्ठावान भगवद्भक्त ब्राह्मणों से सलाह लेते थे और इस प्रकार वे बिना किसी कठिनाई के पृथ्वी पर शासन करते थे।
 
तात्पर्य
 भगवद्गीता (५.२९) में कहा गया है—
भोक्तारं यज्ञतपसां सर्वलोकमहेश्वरम्।

सुहृदं सर्वभूतानां ज्ञात्वा मां शान्तिमृच्छति ॥

इस भौतिक जगत में लोग शान्ति तथा सम्पन्नता में रहने के लिए अतीव उत्सुक रहते हैं और भगवद्गीता के इस श्लोक में साक्षात् भगवान् यह शान्ति सूत्र प्रदान करते हैं—हर एक को समझना चाहिए कि भगवान् कृष्ण सभी लोकों के चरम स्वामी हैं; अतएव वे सभी कार्यों—राजनीतिक, सामाजिक, सांस्कृतिक, धार्मिक, आर्थिक इत्यादि—के भोक्ता हैं। भगवान् ने भगवद्गीता में पूर्ण उपदेश दिया है। अम्बरीष महाराज ने आदर्श कार्यकारी अध्यक्ष के रूप में वैष्णव ब्राह्मणों से परामर्श करके एक वैष्णव की भाँति सारे विश्व पर शासन चलाया। शास्त्रों का कथन है कि भले ही ब्राह्मण अपने ब्राह्मण-कर्मों में कितना ही पटु तथा वैदिक ज्ञान में कितना ही पण्डित क्यों न हो, यदि वह वैष्णव नहीं है तो वह गुरुवत् उपदेश नहीं दे सकता।

षट्कर्मनिपुणो विप्रो मन्त्रतन्त्रविशारद:।

अवैष्णवो गुरुर्न स्याद् वैष्णव: श्वपचो गुरु: ॥

अतएव जैसा कि यहाँ पर तन्निष्ठ विप्राभिहित: शब्दों से सूचित है महाराज अम्बरीष विशुद्ध भगवद्भक्त ब्राह्मणों से सलाह लेते थे क्योंकि केवल विद्वान पण्डित या कर्मकाण्ड में पटु सामान्य ब्राह्मण सलाह देने में कुशल नहीं होते।

आधुनिक समय में विधान सभाओं के सदस्य राज्य के कल्याण हेतु विधान बनाने के लिए अधिकृत होते हैं, किन्तु महाराज अम्बरीष के साम्राज्य के इस विवरण के अनुसार देश या विश्व का शासन उस कार्यकारी अध्यक्ष के द्वारा चलाया जाना चाहिए जिसके सारे सलाहकार भक्त ब्राह्मण हों। ऐसे सलाहकारों या विधायकों को न तो व्यावसायिक राजनीतिज्ञ होना चाहिए, न ही उन्हें अज्ञानी जनता द्वारा चुना जाना चाहिए प्रत्युत उन्हें राजा द्वारा नियुक्त किया जाना चाहिए। जब राजा अर्थात् राज्याध्यक्ष भक्त होता है और देश का शासन चलाने के लिए भक्त ब्राह्मणों के आदेशों का पालन करता है तो हर व्यक्ति शान्त तथा समृद्ध होगा। जब राजा तथा उसके सलाहकार पूर्ण भक्त होते हैं तो राज्य में कोई अमंगल नहीं हो सकता। सारे नागरिकों को भगवद्भक्त बनना चाहिए जिससे उनका चरित्र स्वत: उत्तम हो—

यस्यास्ति भक्तिर्भगवत्यकिञ्चना सर्वैर्गुणैस्तत्र समासते सुरा:।

हरावभक्तस्य कुतो महद्गुणा मनोरथेनासति धावतो बहि: ॥

“जिसकी भगवान् में अविचल भक्ति होती है उसमें देवताओं के सारे गुण रहते हैं। किन्तु जो भगवद्भक्त नहीं है उसमें केवल भौतिक गुण आ पाते हैं जिनका कोई महत्त्व नहीं है। इसका कारण यह है कि उसका मन मानसिक धरातल पर उड़ता रहता है और उसका चमकीली भौतिक शक्ति द्वारा आकृष्ट होना निश्चित रूप से सम्भव है।” (भागवत ५.१८.१२) कृष्णभक्त राजा के निर्देशन में, जनता भक्त बन जायेगी और तब जीवन को सुधारने के लिए राज्य में नित्य नये विधान बनाने की आवश्यकता नहीं पड़ेगी। यदि जनता को भक्त बनने का प्रशिक्षण दिया जाय तो वह स्वत: शान्त तथा निष्कपट बनती है और यदि जनता भक्तों की मंत्रणा लेने वाले भक्त राजा का पथ-प्रदर्शन प्राप्त करती है तो वह राज्य भौतिक जगत में नहीं अपितु आध्यात्मिक जगत में होता है। अतएव विश्व के सारे राज्यों को महाराज अम्बरीष के शासन का आदर्श ग्रहण करना चाहिए, जिसका वर्णन यहाँ पर हुआ है।

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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥