श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 9: मुक्ति  »  अध्याय 4: दुर्वासा मुनि द्वारा अम्बरीष महाराज का अपमान  »  श्लोक 22

 
श्लोक
ईजेऽश्वमेधैरधियज्ञमीश्वरं
महाविभूत्योपचिताङ्गदक्षिणै: ।
ततैर्वसिष्ठासितगौतमादिभि-
र्धन्वन्यभिस्रोतमसौ सरस्वतीम् ॥ २२ ॥
 
शब्दार्थ
ईजे—पूजा किया; अश्वमेधै:—अश्वमेध यज्ञ करके; अधियज्ञम्—सारे यज्ञों के स्वामी को तुष्ट करने के लिए; ईश्वरम्—भगवान् को; महा-विभूत्या—महान् ऐश्वर्य से; उपचित-अङ्ग-दक्षिणै:—समस्त सामग्री तथा ब्राह्मणों को दी गई दक्षिणा समेत; ततै:—सम्पन्न किया; वसिष्ठ-असित-गौतम-आदिभि:—वसिष्ठ, असित तथा गौतम जैसे ब्राह्मणों के द्वारा; धन्वनि—रेगिस्तान में; अभिस्रोतम्—नदी के जल से प्लावित; असौ—महाराज अम्बरीष; सरस्वतीम्—सरस्वती नदी के तट पर ।.
 
अनुवाद
 
 महाराज अम्बरीष ने उस मरुस्थल में अश्वमेध यज्ञ जैसे महान् यज्ञ सम्पन्न किये जिसमें से होकर सरस्वती नदी बहती है और समस्त यज्ञों के स्वामी भगवान् को प्रसन्न किया। ऐसे यज्ञ महान् ऐश्वर्य तथा उपयुक्त सामग्री द्वारा तथा ब्राह्मणों को दक्षिणा देकर सम्पन्न किये जाते थे और इन यज्ञों का निरीक्षण वसिष्ठ, असित तथा गौतम जैसे महापुरुषों द्वारा किया जाता था जो यज्ञों के सम्पन्नकर्ता राजा के प्रतिनिधि होते थे।
 
तात्पर्य
 जब कोई वैदिक विधि से यज्ञ सम्पन्न करता है तो उसे पटु ब्राह्मणों की आवश्यकता होती है जिन्हें याज्ञिक ब्राह्मण कहते हैं। किन्तु कलियुग में ऐसे ब्राह्मणों का अभाव है, अतएव कलियुग में शास्त्रों द्वारा संकीर्तनयज्ञ करने की संस्तुति की जाती है (यज्ञै संकीर्तनप्रायैर्यजन्ति हि सुमेधस: )। कलियुग में याज्ञिक ब्राह्मणों का अभाव होने के कारण असम्भव यज्ञों को सम्पन्न करने में धन का अपव्यय न करके बुद्धिमान मनुष्य संकीर्तन यज्ञ करता है। यदि भगवान् को प्रसन्न करने के लिए ठीक से यज्ञ नहीं किये जाते तो वर्षा अभाव हो जाता है (यज्ञाद् भवति पर्जन्य: ) अतएव यज्ञ सम्पन्न करना अनिवार्य है। यज्ञ के बिना वर्षा का अभाव रहेगा और इस अभाव से अन्न उत्पन्न नहीं होगा जिससे दुर्भिक्ष पड़ेगा। इसलिए राजा का कर्तव्य है कि वह अन्न का उत्पादन बनाये रखने के लिए अश्वमेध यज्ञ जैसे विभिन्न
यज्ञ सम्पन्न करता रहे। अन्नाद् भवन्ति भूतानि। अन्न के बिना मनुष्य तथा पशु दोनों ही भूखों मरेंगे; अतएव राज्य के लिए आवश्यक है कि यज्ञ सम्पन्न होते रहें क्योंकि यज्ञ होने से जनता भरपेट भोजन प्राप्त करेगी। ब्राह्मणों तथा याज्ञिक पुरोहितों को कुशल सेवा के लिए पर्याप्त धन दिया जाना चाहिए। यह दान दक्षिणा कहलाता है। अम्बरीष महाराज राजा होने के नाते इन सारे यज्ञों को वसिष्ठ, गौतम, असित जैसे महापुरुषों से सम्पन्न कराते थे। किन्तु वे स्वयं भक्ति में लगे रहते थे जैसा कि पहले बतलाया जा चुका है (स वै मन: कृष्णपदारविन्दयो: )। राजा का यह धर्म है कि वह यह देखे कि सारा कामकाज समुचित मार्ग-निर्देशन में हो रहा है और उसे महाराज अम्बरीष की भाँति आदर्श भक्त होना चाहिए। राजा का कर्तव्य है कि वह यह देखे कि रेगिस्तान में भी अन्न उत्पन्न हो, अन्य स्थानों के विषय में तो क्या कहना?।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥