श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 9: मुक्ति  »  अध्याय 4: दुर्वासा मुनि द्वारा अम्बरीष महाराज का अपमान  »  श्लोक 23

 
श्लोक
यस्य क्रतुषु गीर्वाणै: सदस्या ऋत्विजो जना: ।
तुल्यरूपाश्चानिमिषा व्यद‍ृश्यन्त सुवासस: ॥ २३ ॥
 
शब्दार्थ
यस्य—जिसके (अम्बरीष के); क्रतुषु—(उसके द्वारा सम्पन्न) यज्ञों में; गीर्वाणै:—देवताओं के साथ; सदस्या:—यज्ञ करने वाले सदस्य; ऋत्विज:—पुरोहित; जना:—तथा अन्य कुशल व्यक्ति; तुल्य-रूपा:—समान रूप वाले; च—तथा; अनिमिषा:—देवताओं की तरह निर्निमेष दृष्टि से, बिना पलक भाँजे; व्यदृश्यन्त—देखे जाकर; सु-वासस:—कीमती वस्त्रों से सज्जित ।.
 
अनुवाद
 
 महाराज अम्बरीष द्वारा आयोजित यज्ञ में सभा के सदस्य तथा पुरोहित (विशेष रूप से होता, उद्गाता, ब्रह्मा तथा अध्वर्यु) वस्त्रों से बहुत अच्छी तरह से सज्जित थे और वे सब देवताओं की तरह लग रहे थे। उन्होंने उत्सुकतापूर्वक यज्ञ को समुचित रूप से सम्पन्न कराया।
 
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥