श्रीमद् भागवतम
शब्द आकार

भागवत पुराण  »  स्कन्ध 9: मुक्ति  »  अध्याय 4: दुर्वासा मुनि द्वारा अम्बरीष महाराज का अपमान  »  श्लोक 26

 
श्लोक
स इत्थं भक्तियोगेन तपोयुक्तेन पार्थिव: ।
स्वधर्मेण हरिं प्रीणन् सर्वान् कामान्शनैर्जहौ ॥ २६ ॥
 
शब्दार्थ
स:—उस (अम्बरीष); इत्थम्—इस प्रकार; भक्ति-योगेन—भगवान् की भक्ति के द्वारा; तप:-युक्तेन—जो तपस्या की श्रेष्ठ विधि भी है; पार्थिव:—राजा ने; स्व-धर्मेण—अपने वैधानिक कार्यकलापों से; हरिम्—परमेश्वर को; प्रीणन्—सन्तुष्ट करते हुए; सर्वान्—सभी प्रकार की; कामान्—भौतिक इच्छाओं को; शनै:—धीरे-धीरे; जहौ—त्याग दिया ।.
 
अनुवाद
 
 इस तरह इस लोक के राजा महाराज अम्बरीष ने भगवान् की भक्ति की और इस प्रयास में उन्होंने कठिन तपस्या की। उन्होंने अपने वैधानिक कार्यकलापों से भगवान् को सदैव प्रसन्न करते हुए धीरे धीरे सारी भौतिक इच्छाओं का परित्याग कर दिया।
 
तात्पर्य
 भक्ति के अभ्यास में की गई कठिन तपस्याएँ कई प्रकार की होती हैं। उदाहरणार्थ, मन्दिर में अर्चाविग्रह की पूजा में श्रम-साध्य कार्य करने होते हैं। श्रीविग्रहाराधननित्यनानाशृंगारतन्मन्दिरमार्जनादौ। मनुष्य को अर्चाविग्रह को अलंकृत करना चाहिए, मन्दिर साफ करना चाहिए, गंगा तथा यमुना से जल लाना चाहिए, नित्यकर्म करते रहना चाहिए, कई बार आरती करनी चाहिए, अर्चाविग्रह के लिए उत्कृष्ट भोजन तैयार करना चाहिए, वस्त्र तैयार करने चाहिए, आदि-आदि। इस तरह विविध कार्यों में सदैव लगे रहना चाहिए। इसमें जो श्रम लगता है वह निश्चय ही, तपस्या है। इसी प्रकार प्रचारकार्य
करने, साहित्य तैयार करने, नास्तिकों को उपदेश देने तथा द्वार-द्वार जाकर साहित्य बाँटने में जो कठिन श्रम निहित रहता है वह निश्चय ही तपस्या है (तपोयुक्तेन )। तपो दिव्यं पुत्रका। ऐसी तपस्या आवश्यक है। येन सत्त्वं शुद्ध्येत्। भक्ति में ऐसी तपस्या से मनुष्य भौतिकवादिता से पवित्र हो जाता है (कामान् शनैर्जहौ )। निस्सन्देह, ऐसी तपस्या से भक्ति की स्वाभाविक स्थिति प्राप्त होती है। इस तरह मनुष्य अपनी भौतिक इच्छाएँ त्याग सकता है और ज्योंही वह भौतिक इच्छाओं से मुक्त हो जाता है त्योंही वह जन्म, जरा, मृत्यु तथा रोग की पुनरावृत्ति से छूट जाता है।
____________________________
 
All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥