श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 9: मुक्ति  »  अध्याय 4: दुर्वासा मुनि द्वारा अम्बरीष महाराज का अपमान  »  श्लोक 28

 
श्लोक
तस्मा अदाद्धरिश्चक्रं प्रत्यनीकभयावहम् ।
एकान्तभक्तिभावेन प्रीतो भक्ताभिरक्षणम् ॥ २८ ॥
 
शब्दार्थ
तस्मै—उसको (महाराज अम्बरीष को); अदात्—प्रदान किया; हरि:—भगवान् ने; चक्रम्—अपना चक्र; प्रत्यनीक-भय-आवहम्— जो भगवान् तथा उनके भक्तों के शत्रुओं के लिए अत्यन्त भयावह है; एकान्त-भक्ति-भावेन—अनन्य भक्ति करने के कारण; प्रीत:— भगवान् इस प्रकार प्रसन्न होकर; भक्त-अभिरक्षणम्—अपने भक्तों की रक्षा के लिए ।.
 
अनुवाद
 
 महाराज अम्बरीष की अनन्य भक्ति से अतीव प्रसन्न होकर भगवान् ने राजा को अपना चक्र प्रदान किया जो शत्रुओं के लिए भयावह है और जो शत्रुओं तथा विपत्तियों से भक्तों की सदैव रक्षा करता है।
 
तात्पर्य
 सदैव भगवान् की सेवा में लगे रहने के कारण, हो सकता है कि भक्त अपनी रक्षा में पटु न हो, किन्तु भगवान् के चरणकमलों पर पूर्णाश्रित रहने से वह भगवान् द्वारा अपनी रक्षा किये जाने के लिए आश्वस्त रहता है। प्रह्लाद महाराज ने (भागवत ७.९.४३) कहा है—
नैवोद्विजे पर दुरत्ययवैतरण्या स्त्वद्वीर्यगायनमहामृतमग्नचित्त:।

भक्त भगवान् की सेवा करने के दिव्य आनन्द के सागर में सदैव मग्न रहता है; अतएव वह भौतिक जगत की किसी विपरीत स्थिति से कभी भयभीत नहीं होता। भगवान् यह भी वचन देते हैं—कौन्तेय प्रतिजानीहि न मे भक्त: प्रणश्यति—हे अर्जुन! तुम संसार को घोषित कर दो कि भगवान् का भक्त कभी विनष्ट नहीं होता (भगवद्गीता ९.३१)। भक्तों की रक्षा के लिए कृष्ण का सुदर्शन चक्र सदैव तैयार रहता है। यह चक्र अभक्तों के लिए अत्यन्त भयावह है (प्रत्यनीकभयावहम् )। इसलिए महाराज अम्बरीष के भक्ति-संलग्न रहने पर भी उनका साम्राज्य सभी प्रकार के संकट से मुक्त था।

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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥