श्रीमद् भागवतम
शब्द आकार

भागवत पुराण  »  स्कन्ध 9: मुक्ति  »  अध्याय 4: दुर्वासा मुनि द्वारा अम्बरीष महाराज का अपमान  »  श्लोक 3

 
श्लोक
इमे अङ्गिरस: सत्रमासतेऽद्य सुमेधस: ।
षष्ठं षष्ठमुपेत्याह: कवे मुह्यन्ति कर्मणि ॥ ३ ॥
 
शब्दार्थ
इमे—ये सब; अङ्गिरस:—अंगिरा के वंशज; सत्रम्—यज्ञ; आसते—कर रहे हैं; अद्य—आज; सुमेधस:—जो अत्यन्त बुद्धिमान हैं; षष्ठम्—छठवाँ; षष्ठम्—छठवाँ; उपेत्य—प्राप्त करके; अह:—दिन; कवे—हे विद्वान पुरुष; मुह्यन्ति—मोहग्रस्त होते हैं; कर्मणि— सकाम कर्मों में ।.
 
अनुवाद
 
 नाभाग के पिता ने कहा : अंगिरा के वंशज इस समय एक महान् यज्ञ सम्पन्न करने जा रहे हैं, किन्तु अत्यन्त बुद्धिमान होते हुए भी वे हर छठे दिन यज्ञ करते हुए मोहग्रस्त होंगे और अपने नैत्यिक कर्मों में त्रुटि करेंगे।
 
तात्पर्य
 नाभाग अत्यन्त सरल हृदय था। अतएव जब वह अपने पिता के पास गया तो पिता ने दयावश अपने पुत्र को समझाया कि अपनी जीविका
चलाने के लिए वह अंगिरा के वंशजों के पास जाये और यज्ञ करने में होने वाली उनकी त्रुटियों का लाभ उठाये।
____________________________
 
All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥