श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 9: मुक्ति  »  अध्याय 4: दुर्वासा मुनि द्वारा अम्बरीष महाराज का अपमान  »  श्लोक 31-32

 
श्लोक
महाभिषेकविधिना सर्वोपस्करसम्पदा ।
अभिषिच्याम्बराकल्पैर्गन्धमाल्यार्हणादिभि: ॥ ३१ ॥
तद्गतान्तरभावेन पूजयामास केशवम् ।
ब्राह्मणांश्च महाभागान् सिद्धार्थानपि भक्तित: ॥ ३२ ॥
 
शब्दार्थ
महा-अभिषेक-विधिना—अर्चाविग्रह को नहलाने के अनुष्ठान द्वारा; सर्व-उपस्कर-सम्पदा—अर्चाविग्रह की पूजा की सारी सामग्री से; अभिषिच्य—नहलाकर; अम्बर-आकल्पै:—सुन्दर वस्त्रों तथा गहनों से; गन्ध-माल्य—सुगन्धित फूल की मालाओं से; अर्हण- आदिभि:—अर्चाविग्रह की पूजा की अन्य सामग्री सहित; तत्-गत-अन्तर-भावेन—भक्ति से पूरित अपने मन से; पूजयाम् आस— उसने पूजा की; केशवम्—कृष्ण को; ब्राह्मणान् च—तथा ब्राह्मणों को; महा-भागान्—अत्यन्त भाग्यशाली; सिद्ध-अर्थान्— आत्मतुष्ट, किसी पूजा के लिए प्रतीक्षा किये बिना; अपि—भी; भक्तित:—अत्यन्त भक्तिपूर्वक ।.
 
अनुवाद
 
 महाभिषेक के विधि-विधानों के अनुसार महाराज अम्बरीष ने सारी सामग्री से भगवान् कृष्ण के अर्चाविग्रह को स्नान कराया। फिर उन्हें सुन्दर वस्त्रों, आभूषणों, सुगन्धित फूलों की मालाओं तथा पूजा की अन्य सामग्री से अलंकृत किया। उन्होंने ध्यानपूर्वक तथा भक्तिपूर्वक कृष्ण की तथा भौतिक इच्छाओं से मुक्त परम भाग्यशाली ब्राह्मणों की पूजा की।
 
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥