श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 9: मुक्ति  »  अध्याय 4: दुर्वासा मुनि द्वारा अम्बरीष महाराज का अपमान  »  श्लोक 44

 
श्लोक
अहो अस्य नृशंसस्य श्रियोन्मत्तस्य पश्यत ।
धर्मव्यतिक्रमं विष्णोरभक्तस्येशमानिन: ॥ ४४ ॥
 
शब्दार्थ
अहो—ओह; अस्य—इस पुरुष का; नृ-शंसस्य—इतने निर्दय का; श्रिया उन्मत्तस्य—अपने ऐश्वर्य के कारण गर्वित; पश्यत—देखो तो; धर्म-व्यतिक्रमम्—धार्मिक सिद्धान्तों का उल्लंघन; विष्णो: अभक्तस्य—जो विष्णु का भक्त नहीं है उसका; ईश-मानिन:—अपने आपको ईश्वर मानने वाला ।.
 
अनुवाद
 
 ओह! जरा इस निर्दय व्यक्ति का आचरण तो देखो, यह भगवान् विष्णु का भक्त नहीं है। यह अपने ऐश्वर्य एवं पद के गर्व के कारण अपने आपको ईश्वर समझ रहा है। देखो न, इसने धर्म के नियमों का उल्लंघन किया है।
 
तात्पर्य
 श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर ने इस श्लोक में दुर्वासा मुनि द्वारा कहे गये वचनों का पूरा अर्थ ही बदल दिया है। दुर्वासा मुनि ने नृशंसस्य शब्द का व्यवहार राजा को क्रूर बताने के लिए किया है लेकिन विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर इसका अर्थ यह लगाते हैं कि राजा के चरित्र की महिमा का गान सारे स्थानीय लोगों ने किया। उनके अनुसार नृ का अर्थ है “सारे स्थानीय लोग” तथा शंसस्य का अर्थ है “अम्बरीष का, जिसके चरित्र का गायन किया गया।” इसी प्रकार जो अत्यन्त धनी होता है वह अपने धन के कारण पागल हो जाता है अतएव वह
श्रिया उन्मत्तस्य कहलाता है, किन्तु श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर के अनुसार यद्यपि महाराज अम्बरीष अत्यन्त ऐश्वर्यवान राजा थे, किन्तु वे दान के पीछे पागल नहीं थे क्योंकि वे भौतिक ऐश्वर्य के पागलपन को पहले ही पार कर चुके थे। इसी प्रकार ईशमानिन: का अर्थ यह लगाया है कि वह भगवान् का इतना आदर करता था कि दुर्वासा मुनि के ऐसा सोचने के बावजूद भी उसने एकादशी पारण के नियम का उल्लंघन नहीं किया क्योंकि उसने केवल जल ग्रहण किया था। इस प्रकार श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर ने अम्बरीष महाराज के सारे
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥