श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 9: मुक्ति  »  अध्याय 4: दुर्वासा मुनि द्वारा अम्बरीष महाराज का अपमान  »  श्लोक 48

 
श्लोक
प्राग्दिष्टं भृत्यरक्षायां पुरुषेण महात्मना ।
ददाह कृत्यां तां चक्रं क्रुद्धाहिमिव पावक: ॥ ४८ ॥
 
शब्दार्थ
प्राक् दिष्टम्—पूर्व आयोजित; भृत्य-रक्षायाम्—अपने दासों की रक्षा करने के लिए; पुरुषेण—परम पुरुष द्वारा; महा-आत्मना— परमात्मा द्वारा; ददाह—जलाकर राख कर दिया; कृत्याम्—सृजित कृत्या को; ताम्—उस; चक्रम्—चक्र; क्रुद्ध—क्रुद्ध; अहिम्— सर्प को; इव—सदृश; पावक:—अग्नि ।.
 
अनुवाद
 
 जिस प्रकार दावाग्नि एक क्रुद्ध सर्प को तुरन्त जला देती है उसी प्रकार पहले से आदिष्ट भगवान् के सुदर्शन चक्र ने भगवद्भक्त की रक्षा करने के लिए उस सृजित कृत्या को जलाकर क्षार कर दिया।
 
तात्पर्य
 शुद्ध भक्त होने के कारण महाराज अम्बरीष ऐसे संकट में पडक़र भी न तो अपने स्थान से रंचभर हटे, न ही भगवान् से अपनी रक्षा करने के लिए कोई प्रार्थना की। वे विचार में स्थिर थे अतएव यह स्पष्ट था कि वे अपने मन में भगवान् का चिन्तन मात्र कर रहे थे। भक्त कभी अपनी मृत्यु से डरता नहीं क्योंकि वह सदैव भगवान् का ध्यान अपने कर्तव्य के रूप में करता है, किसी भौतिक लाभ के लिए नहीं। लेकिन भगवान् जानते हैं कि भक्त की रक्षा कैसे करनी चाहिए। जैसा कि प्राग्-दिष्टम् शब्द से सूचित होता है, भगवान् सब जानते थे।अतएव इसके पूर्व कि कोई घटना घटे, उन्होंने महाराज अम्बरीष की रक्षा करने के लिए अपने चक्र को तैयार रखा था। भक्त को यह सुरक्षा भक्ति शुरू करने के दिन से ही प्रदान की जाती है। कौन्तेय प्रतिजानीहि न मे भक्त: प्रणश्यति
(भगवद्गीता ९.३१)। यदि कोई व्यक्ति भक्ति शुरू करता है तो तुरन्त ही भगवान् उसकी रक्षा करने लगते हैं। इसकी पुष्टि भगवद्गीता (१८.६६) के द्वारा होती है—अहं त्वां सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि। सुरक्षा का कार्य तुरन्त प्रारम्भ हो जाता है। भगवान् इतने दयालु हैं कि वे अपने भक्त को सही मार्गदर्शन तथा सारी सुरक्षा प्रदान करते हैं। इस तरह भक्त शान्तिपूर्वक बिना किसी बाहरी उपद्रव के कृष्णभावनामृत में ठोस प्रगति करता है। सर्प कितना ही क्रुद्ध और काटने को तैय्यार क्यों न हो, किन्तु जब उसे जंगल की प्रज्ज्वलित अग्नि का सामना करना पड़ता है तो क्रुद्ध से क्रुद्ध सर्प भी असहाय बन जाता है। यद्यपि भक्त का शत्रु अत्यन्त प्रबल भी हो, वह भक्ति की अग्नि के समक्ष क्रुद्ध सर्प जैसा बन जाता है।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥