श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 9: मुक्ति  »  अध्याय 4: दुर्वासा मुनि द्वारा अम्बरीष महाराज का अपमान  »  श्लोक 64

 
श्लोक
नाहमात्मानमाशासे मद्भक्तै: साधुभिर्विना ।
श्रियं चात्यन्तिकीं ब्रह्मन् येषां गतिरहं परा ॥ ६४ ॥
 
शब्दार्थ
न—नहीं; अहम्—मैं; आत्मानम्—दिव्य आनन्द; आशासे—चाहता हूँ; मत्-भक्तै:—मेरे भक्तों के साथ; साधुभि:—साधुपुरुषों के साथ; विना—उनके बिना; श्रियम्—मेरे छहो ऐश्वर्य; च—भी; आत्यन्तिकीम्—परम; ब्रह्मन्—हे ब्राह्मण; येषाम्—जिसका; गति:— लक्ष्य; अहम्—मैं; परा—परम, चरम ।.
 
अनुवाद
 
 हे ब्राह्मणश्रेष्ठ, मैं उन साधुपुरुषों के बिना अपना दिव्य आनन्द तथा अपने परम ऐश्वर्यों का भोग नहीं करना चाहता जिनके लिए मैं ही एकमात्र गन्तव्य हूँ।
 
तात्पर्य
 भगवान् आत्मनिर्भर हैं लेकिन अपने दिव्य आनन्द का भोग करने के लिए उन्हें अपने भक्तों के सहयोग की आवश्यकता पड़ती है। उदाहरणार्थ, यद्यपि वृन्दावन में भगवान् कृष्ण स्वयं में पूर्ण हैं, किन्तु वे अपने दिव्य आनन्द को वर्धित करने के लिए अपने भक्त ग्वालों तथा गोपियों का सहयोग चाहते हैं। ऐसे शुद्ध भक्त जो भगवान् की ह्लादिनी शक्ति को बढ़ाने वाले हैं, भगवान् को अत्यन्त प्रिय हैं। भगवान् न केवल अपने भक्तों की संगति का आनन्द लेते हैं अपितु अनन्त होने के कारण वे अपने भक्तों की संख्या को भी असीमित बनाना चाहते हैं। इस तरह वे अभक्तों तथा विद्रोही जीवों को भगवद्धाम वापस जाने के लिए प्रेरित करने हेतु इस भौतिक जगत में अवतरित होते हैं और उन्हें प्रोत्साहित करते हैं कि उनकी शरण में जाया जाय क्योंकि अनन्त होने
के कारण वे अपने भक्तों की संख्या को असीम बनाना चाहते हैं। कृष्णभावनामृत आन्दोलन भगवान् के शुद्धभक्तों की संख्या को अधिकाधिक बढ़ाने का प्रयास है। यह निश्चित है कि जो भक्त भगवान् को संतुष्ट करने के इस प्रयास को पूरा करने में सहायक होता है वह अप्रत्यक्ष रूप से भगवान् का नियंत्रक बन जाता है। यद्यपि भगवान् षड्ऐश्वर्य से पूर्ण हैं, किन्तु अपने भक्तों के बिना उन्हें दिव्य आनन्द प्राप्त नहीं होता। इस सन्दर्भ में यह उदाहरण दिया जा सकता है कि यदि किसी धनी पुरुष के परिवार में पुत्र नहीं होता तो वह अपने को सुखी अनुभव नहीं करता। इसीलिए अपने इस सुख की पूर्ति के लिए वह कभी-कभी दत्तक पुत्र बनाता है। शुद्ध भक्त को दिव्य आनन्द का विज्ञान ज्ञात है अतएव वह भगवान् के दिव्य सुख को बढ़ाने में सदा लगा रहता है।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥