श्रीमद् भागवतम
शब्द आकार

भागवत पुराण  »  स्कन्ध 9: मुक्ति  »  अध्याय 4: दुर्वासा मुनि द्वारा अम्बरीष महाराज का अपमान  »  श्लोक 70

 
श्लोक
तपो विद्या च विप्राणां नि:श्रेयसकरे उभे ।
ते एव दुर्विनीतस्य कल्पेते कर्तुरन्यथा ॥ ७० ॥
 
शब्दार्थ
तप:—तपस्या; विद्या—ज्ञान; च—भी; विप्राणाम्—ब्राह्मणों की; नि:श्रेयस—उन्नति के लिए अत्यन्त शुभ है जो उसका; करे— कारण हैं; उभे—दोनों; ते—ऐसी तपस्या तथा विद्या; एव—निस्सन्देह; दुर्विनीतस्य—उद्धत व्यक्ति का; कल्पेते—हो जाते हैं; कर्तु:— कर्ता का; अन्यथा—विपरीत ।.
 
अनुवाद
 
 ब्राह्मण के लिए तपस्या तथा विद्या निश्चय ही कल्याणप्रद हैं, किन्तु जब तपस्या तथा विद्या ऐसे व्यक्ति के पास होती हैं जो विनीत नहीं है तो वे अत्यन्त घातक होती हैं।
 
तात्पर्य
 कहा जाता है कि मणि अत्यन्त मूल्यवान होता है, किन्तु जब वह साँप के फण में होता है तो मूल्यवान होते हुए भी घातक होता है। इसी प्रकार जब भौतिकतावादी अभक्त विद्या तथा तपस्या में महान् सफलता प्राप्त कर लेता है तो वह सारे समाज के लिए घातक बन जाता है। उदाहरणार्थ, तथाकथित विद्वान वैज्ञानिकों ने परमाणु हथियारों का आविष्कार किया है जो सारी मानवता के लिए घातक है। अतएव कहा जाता है—मणिना भूषित: सर्प: किमसौ न भयङ्कर:। मणिधारी सर्प मणिविहीन सर्प की ही
तरह घातक होता है। दुर्वासा मुनि अत्यन्त विद्वान ब्राह्मण थे जिनके पास योगशक्ति थी, किन्तु भद्रपुरुष न होने के कारण उन्हें अपनी शक्ति का प्रयोग करना नहीं आता था। अत: वे अत्यन्त घातक थे। भगवान् कभी भी ऐसे घातक व्यक्ति की ओर प्रवृत्त नहीं होते जो किसी निजी कार्य के लिए अपनी योगशक्ति का प्रयोग करता है। अत: प्रकृति के नियमानुसार शक्ति का दुरुपयोग अन्तत: न केवल समाज के लिए घातक बनता है अपितु शक्ति का दुरुपयोग करने वाले व्यक्ति के लिए भी।
____________________________
 
All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥