श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 9: मुक्ति  »  अध्याय 5: दुर्वासा मुनि को जीवन-दान  »  श्लोक 20

 
श्लोक
प्रीतोऽस्म्यनुगृहीतोऽस्मि तव भागवतस्य वै ।
दर्शनस्पर्शनालापैरातिथ्येनात्ममेधसा ॥ २० ॥
 
शब्दार्थ
प्रीत:—अत्यधिक सन्तुष्ट; अस्मि—हूँ; अनुगृहीत:—अत्यन्त आभारी; अस्मि—हूँ; तव—तुम; भागवतस्य—शुद्ध भक्त का; वै— निस्सन्देह; दर्शन—तुम्हें देखकर; स्पर्शन—तथा तुम्हारे पाँवों का स्पर्श करके; आलापै:—तुमसे बातें करके; आतिथ्येन—तुम्हारे आतिथ्य से; आत्म-मेधसा—अपनी बुद्धि से ।.
 
अनुवाद
 
 दुर्वासा मुनि ने कहा : हे राजा, मैं आपसे अत्यन्त प्रसन्न हूँ। पहले मैंने आपको एक सामान्य व्यक्ति समझकर आपका आतिथ्य स्वीकार किया था, किन्तु बाद में अपनी बुद्धि से मैं समझ सका कि आप भगवान् के अत्यन्त महान् भक्त हैं। इसलिए मात्र आपके दर्शन और आपके चरणस्पर्श से तथा आपसे बातें करके मैं सन्तुष्ट हो गया हूँ और आपका अत्यन्त कृतज्ञ हो गया हूँ।
 
तात्पर्य
 कहा गया है—वैष्णवेर क्रिया मुद्रा विज्ञेह ना बुझय—शुद्ध वैष्णव के कार्यकलापों को बुद्धिमान से बुद्धिमान व्यक्ति भी नहीं समझ सकता। अतएव महान् योगी दुर्वासा ने पहले महाराज अम्बरीष को एक सामान्य व्यक्ति समझ कर उन्हें दण्ड देना चाहा। वैष्णव को समझने में ऐसी भूल हो जाती है। किन्तु जब दुर्वासा मुनि को सुदर्शन चक्र द्वारा सजा मिल चुकी तो उनकी बुद्धि जागी। इसीलिए आत्ममेधसा शब्द प्रयुक्त हुआ है जो सूचित करता है कि वे अपने निजी अनुभव से समझ सके कि राजा कितना महान् वैष्णव था। जब सुदर्शनचक्र ने दुर्वासा मुनि का पीछा करना प्रारम्भ किया तो उन्होंने ब्रह्माजी तथा शिवजी की शरण लेनी चाही और वे वैकुण्ठ
धाम तक भी पहुँच गए जहाँ उन्होंने साक्षात् भगवान् से भी बातें कीं, किन्तु सुदर्शन चक्र के आक्रमण से उन्हें कोई बचा न सका। अतएव वे अपने निजी अनुभव से वैष्णव के प्रभाव को समझ सके। दुर्वासा मुनि निस्सन्देह महान् योगी तथा अत्यन्त विद्वान ब्राह्मण थे, किन्तु इतने बड़े योगी होते हुए भी वे वैष्णव के प्रभाव को नहीं समझ पाये थे। इसीलिए कहा जाता है—वैष्णवेर क्रिया मुद्रा विज्ञेह ना बुझय। जब भी तथाकथित ज्ञानी तथा योगी वैष्णव के चरित्र का अध्ययन करते हैं तो उसमें त्रुटि रहने की सम्भावना बनी रहती है। वैष्णव को इसीसे समझा जा सकता है कि अचिन्त्य कार्य करने में भगवान् की उस पर कितनी दया प्राप्त है।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥