श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 9: मुक्ति  »  अध्याय 5: दुर्वासा मुनि को जीवन-दान  »  श्लोक 26

 
श्लोक
श्रीशुक उवाच
अथाम्बरीषस्तनयेषु राज्यं
समानशीलेषु विसृज्य धीर: ।
वनं विवेशात्मनि वासुदेवे
मनो दधद् ध्वस्तगुणप्रवाह: ॥ २६ ॥
 
शब्दार्थ
श्री-शुक: उवाच—श्री शुकदेव गोस्वामी ने कहा; अथ—इस प्रकार; अम्बरीष:—राजा अम्बरीष; तनयेषु—अपने पुत्रों को; राज्यम्— राज्य; समान-शीलेषु—अपने पिता की ही भाँति योग्य; विसृज्य—बाँट करके; धीर:—अत्यन्त विद्वान पुरुष, महाराज अम्बरीष; वनम्—वन में; विवेश—प्रविष्ट हुए; आत्मनि—भगवान्; वासुदेवे—वासुदेव नाम से प्रसिद्ध कृष्ण में; मन:—मन को; दधत्— केन्द्रीभूत करते हुए; ध्वस्त—नष्ट; गुण-प्रवाह:—प्रकृति के गुणों की लहरें ।.
 
अनुवाद
 
 श्रील शुकदेव गोस्वामी ने आगे कहा : तत्पश्चात् भक्तिमय जीवन की उन्नत दशा के कारण अम्बरीष भौतिक वस्तुओं की किसी तरह से इच्छा न रखते हुए सक्रिय गृहस्थ जीवन से उपरत हो गये। उन्होंने अपनी सम्पत्ति अपने ही समान योग्य पुत्रों में बाँट दी और स्वयं वानप्रस्थ आश्रम स्वीकार करके भगवान् वासुदेव में अपना मन पूर्णत: एकाग्र करने के लिए जंगल चले गये।
 
तात्पर्य
 शुद्ध भक्त होने के नाते महाराज अम्बरीष जीवन की किसी भी स्थिति में मुक्त थे। जैसा कि श्रील रूपगोस्वामी ने बतलाया है कि भक्त सदैव मुक्त होता है—
ईहा यस्य हरेर्दास्ये कर्मणा मनसा गिरा।

निखिलास्वप्यवस्थासु जीवन्मुक्त: स उच्यते ॥

भक्तिरसामृत सिन्धु में श्रील रूप गोस्वामी इस तरह उपदेश देते हैं कि यदि किसी की एकमात्र इच्छा भगवान् की सेवा करने की है तो वह जीवन की किसी भी दशा में मुक्त होता है। निस्सन्देह, महाराज अम्बरीष किसी भी दशा में मुक्त थे, किन्तु आदर्श राजा के रूप में उन्होंने गृहस्थ जीवन से वानप्रस्थ आश्रम ग्रहण किया। मनुष्य के लिए अत्यावश्यक है कि पारिवारिक जिम्मेदारियाँ त्याग करके वासुदेव के चरणकमलों में एकाग्र हो। इसीलिए महाराज अम्बरीष ने अपना राज्य अपने पुत्रों में बाँट दिया और फिर वे गृहस्थ जीवन से विरक्त हो गये।

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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥