श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 9: मुक्ति  »  अध्याय 5: दुर्वासा मुनि को जीवन-दान  »  श्लोक 6

 
श्लोक
नम: सुनाभाखिलधर्मसेतवे
ह्यधर्मशीलासुरधूमकेतवे ।
त्रैलोक्यगोपाय विशुद्धवर्चसे
मनोजवायाद्भ‍ुतकर्मणे गृणे ॥ ६ ॥
 
शब्दार्थ
नम:—आपको सादर नमस्कार है; सु-नाभ—हे शुभ नाभि वाले; अखिल-धर्म-सेतवे—जिसके अरे समस्त ब्रह्माण्ड के सेतु समान हैं; हि—निस्सन्देह; अधर्म-शील—अधार्मिक; असुर—असुरों के लिए; धूम-केतवे—जो अग्नि या अशुभ पुच्छल तारे के समान हैं, उनको; त्रैलोक्य—तीनों संसारों के; गोपाय—पालक को; विशुद्ध—दिव्य; वर्चसे—जिसका तेज; मन:-जवाय—मन के समान गति वाला; अद्भुत—विचित्र; कर्मणे—इतना सक्रिय; गृणे—मैं बोलता हूँ ।.
 
अनुवाद
 
 हे सुदर्शन, तुम्हारी नाभि अत्यन्त शुभ है, अतएव तुम धर्म की रक्षा करने वाले हो। तुम अधार्मिक असुरों के लिए अशुभ पुच्छल तारे के समान हो। निस्सन्देह, तुम्हीं तीनों लोकों के पालक हो। तुम दिव्य तेज से पूर्ण हो, तुम मन के समान तीव्रगामी हो और अद्भुत कर्म करने वाले हो। मैं केवल नम: शब्द कहकर तुम्हें सादर नमस्कार करता हूँ।
 
तात्पर्य
 भगवान् का चक्र सुदर्शन कहलाता है क्योंकि यह उच्च तथा निम्न अपराधियों या असुरों में भेदभाव नहीं करता। दुर्वासा मुनि निश्चय ही शक्तिशाली ब्राह्मण थे, किन्तु उनके कार्यकलाप शुद्ध भक्त अम्बरीष महाराज के प्रति असुरों जैसे थे। शास्त्रों का वचन है—धर्मं तु साक्षाद् भगवत्प्रणीतम्—धर्म शब्द का अर्थ है भगवान् द्वारा दिये गये आदेश या नियम। सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज—असली धर्म तो भगवान् की शरण ग्रहण करना है। अतएव असली धर्म का अर्थ है भगवान् की भक्ति। इसीलिए सुदर्शन चक्र को यहाँ धर्मसेतवे अर्थात् धर्म का रक्षक कहा गया है। महाराज अम्बरीष सचमुच धार्मिक व्यक्ति थे अतएव उनकी रक्षा करने के लिए सुदर्शन चक्र दुर्वासा मुनि जैसे कठोर ब्राह्मण को भी दण्ड देने को उद्यत था क्योंकि उन्होंने असुर
जैसा कर्म किया था। ब्राह्मणों के रूप में भी असुर मिलते हैं। अतएव सुदर्शन चक्र ब्राह्मण असुर तथा शूद्र असुर में भेद नहीं बरतता। जो कोई भी भगवान् तथा उनके भक्तों के विरुद्ध होता है वह असुर कहलाता है। शास्त्रों में ऐसे अनेक ब्राह्मण तथा क्षत्रिय असुरों की तरह कर्म करते पाये गए हैं अतएव उनका वर्णन असुरों की भाँति हुआ है। शास्त्रों के निर्णय के अनुसार किसी की पहचान उसके लक्षणों के अनुसार ही की जाती है। यदि कोई ब्राह्मण पिता से उत्पन्न है, किन्तु उसके लक्षण असुरों जैसे हैं तो वह असुर माना जाता है। सुदर्शन चक्र सदैव असुरों का ध्वंस करने के लिए है अतएव उसे अधर्मशीलासुर धूमकेतवे कहा गया है। जो भक्त नहीं हैं वे अधर्मशील कहलाते हैं। सुदर्शन चक्र ऐसे सारे असुरों के लिए अशुभ पुच्छल तारे की भाँति है।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥