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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 9: मुक्ति  »  अध्याय 6: सौभरि मुनि का पतन  »  श्लोक 12
 
 
श्लोक  9.6.12 
पुरञ्जयस्तस्य सुत इन्द्रवाह इतीरित: ।
ककुत्स्थ इति चाप्युक्त: श‍ृणु नामानि कर्मभि: ॥ १२ ॥
 
शब्दार्थ
पुरम्-जय:—पुरञ्जय (पुर का विजेता); तस्य—उसका (विकुक्षि का); सुत:—पुत्र; इन्द्र-वाह:—इन्द्रवाह (इन्द्र जिसका वाहन है); इति—इस प्रकार; ईरित:—विख्यात; ककुत्स्थ:—ककुत्स्थ (बैल के डिल्ले पर स्थित); इति—इस प्रकार; —भी; अपि— निस्सन्देह; उक्त:—इस तरह ज्ञात; शृणु—सुनो; नामानि—सारे नाम; कर्मभि:—अपने-अपने कर्म के अनुसार ।.
 
अनुवाद
 
 शशाद का पुत्र पुरञ्जय हुआ जो इन्द्रवाह के रूप में और कभी-कभी ककुत्स्थ के नाम से विख्यात है। अब मुझसे यह सुनो कि उसने विभिन्न कार्यों के लिए भिन्न-भिन्न नाम किस तरह प्राप्त किये।
 
 
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