श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 9: मुक्ति  »  अध्याय 6: सौभरि मुनि का पतन  »  श्लोक 2

 
श्लोक
रथीतरस्याप्रजस्य भार्यायां तन्तवेऽर्थित: ।
अङ्गिरा जनयामास ब्रह्मवर्चस्विन: सुतान् ॥ २ ॥
 
शब्दार्थ
रथीतरस्य—रथीतर की; अप्रजस्य—नि:सन्तान; भार्यायाम्—अपनी पत्नी के; तन्तवे—सन्तान वृद्धि के लिए; अर्थित:—प्रार्थना किये जाने पर; अङ्गिरा:—अंगिरा ऋषि; जनयाम् आस—उत्पन्न किया; ब्रह्म-वर्चस्विन:—ब्राह्मण गुणों से युक्त; सुतान्—पुत्रों को ।.
 
अनुवाद
 
 रथीतर नि:सन्तान था अतएव उसने अंगिरा ऋषि से पुत्र उत्पन्न करने के लिए प्रार्थना की। इस प्रार्थना के फलस्वरूप अंगिरा ने रथीतर की पत्नी के गर्भ से पुत्र उत्पन्न कराये। ये सारे पुत्र ब्राह्मण तेज से सम्पन्न थे।
 
तात्पर्य
 वैदिक युग में कभी-कभी निम्न कुल वाले पुरुष की पत्नी से अच्छी सन्तान उत्पन्न करने के लिए किसी उच्च पुरुष को बुलाया जाता था। ऐसी स्थिति में स्त्री की तुलना खेत से की जाती है। खेत वाला व्यक्ति किसी अन्य व्यक्ति को अन्न उपजाने का काम सौंप सकता है, किन्तु उस खेत से जो अन्न उपजता है
वह खेत के स्वामी का होता है। इसी प्रकार स्त्री को कभी-कभी अपने पति के अतिरिक्त किसी अन्य पुरुष से गर्भ धारण करना होता था, किन्तु इस तरह से उत्पन्न पुत्र उसके पति के पुत्र कहलाते थे। ये पुत्र क्षेत्र जात कहलाते थे। चूँकि रथीतर के कोई पुत्र न था अतएव उसने इस विधि का लाभ उठाया।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥