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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 9: मुक्ति  »  अध्याय 6: सौभरि मुनि का पतन  »  श्लोक 26
 
 
श्लोक  9.6.26 
भार्याशतेन निर्विण्ण ऋषयोऽस्य कृपालव: ।
इष्टिं स्म वर्तयांचक्रुरैन्द्रीं ते सुसमाहिता: ॥ २६ ॥
 
शब्दार्थ
भार्या-शतेन—एक सौ पत्नियों के साथ; निर्विण्ण:—अत्यन्त खिन्न; ऋषय:—ऋषिगण; अस्य—उस पर; कृपालव:—अत्यन्त कृपालु; इष्टिम्—एक अनुष्ठान; स्म—भूतकाल में; वर्तयाम् चक्रु:—सम्पन्न करने लगा; ऐन्द्रीम्—इन्द्रयज्ञ; ते—वे सभी; सु समाहिता:—अत्यन्त सावधान ।.
 
अनुवाद
 
 यद्यपि युवनाश्व अपनी एक सौ पत्नियों सहित जंगल में चला गया, किन्तु वे सभी अत्यन्त खिन्न थीं। तथापि जंगल के ऋषि राजा पर अत्यन्त दयालु थे, अतएव वे मनोयोगपूर्वक इन्द्रयज्ञ करने लगे जिससे राजा के पुत्र उत्पन्न हो सके।
 
तात्पर्य
 यदि कोई चाहे तो अपनी पत्नी के साथ वानप्रस्थ आश्रम में प्रवेश हो सकता है, किन्तु वानप्रस्थ आश्रम का अर्थ है गृहस्थ जीवन से पूर्ण विरक्ति। यद्यपि युवनाश्व गृहस्थ जीवन से विरक्त हो चुका था, किन्तु वे और उसकी पत्नियाँ कोई सन्तान न होने के कारण सदा खिन्न रहती थीं।
 
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