श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 9: मुक्ति  »  अध्याय 6: सौभरि मुनि का पतन  »  श्लोक 30

 
श्लोक
तत: काल उपावृत्ते कुक्षिं निर्भिद्य दक्षिणम् ।
युवनाश्वस्य तनयश्चक्रवर्ती जजान ह ॥ ३० ॥
 
शब्दार्थ
तत:—तत्पश्चात्; काले—समय; उपावृत्ते—पूरा हो जाने पर; कुक्षिम्—उदर का निचला भाग; निर्भिद्य—भेदकर; दक्षिणम्—दाहिनी ओर का; युवनाश्वस्य—राजा युवनाश्व का; तनय:—पुत्र; चक्रवर्ती—राजा के सारे उत्तम लक्षणों से युक्त; जजान—उत्पन्न किया; ह— भूतकाल में ।.
 
अनुवाद
 
 तत्पश्चात् कालक्रम से राजा युवनाश्व के उदर के दाहिनी ओर के निचले भाग से चक्रवर्ती राजा के उत्तम लक्षणों से युक्त एक पुत्र उत्पन्न हुआ।
 
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥