श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 9: मुक्ति  »  अध्याय 6: सौभरि मुनि का पतन  »  श्लोक 33-34

 
श्लोक
त्रसद्दस्युरितीन्द्रोऽङ्ग विदधे नाम यस्य वै ।
यस्मात् त्रसन्ति ह्युद्विग्ना दस्यवो रावणादय: ॥ ३३ ॥
यौवनाश्वोऽथ मान्धाता चक्रवर्त्यवनीं प्रभु: ।
सप्तद्वीपवतीमेक: शशासाच्युततेजसा ॥ ३४ ॥
 
शब्दार्थ
त्रसत्-दस्यु:—त्रसद्दस्यु नाम का (जो चोरों उचक्कों को धमकाये); इति—इस प्रकार; इन्द्र:—इन्द्र; अङ्ग—हे राजा; विदधे—दिया; नाम—नाम; यस्य—जिसका; वै—निस्सन्देह; यस्मात्—जिससे; त्रसन्ति—डरे हुए; हि—निश्चय ही; उद्विग्ना:—चिन्ता का कारण; दस्यव:—चोर-उचक्के; रावण-आदय:—रावण इत्यादि राक्षस; यौवनाश्व:—युवनाश्व का पुत्र; अथ—इस प्रकार; मान्धाता—मान्धाता नाम से विख्यात; चक्रवर्ती—सारे विश्व का सम्राट; अवनीम्—पृथ्वी पर; प्रभु:—स्वामी; सप्त-द्वीप-वतीम्—सात द्वीपों वाली; एक:—एकमात्र; शशास—शासन किया; अच्युत-तेजसा—भगवान् की कृपा से अत्यन्त शक्तिशाली होने से ।.
 
अनुवाद
 
 युवनाश्व-पुत्र मान्धाता, रावण तथा चिन्ता उत्पन्न करने वाले अन्य चोर उचक्कों के लिए भय का कारण बना था। हे राजा परीक्षित, चूँकि वे सब उससे भयभीत रहते थे, अतएव युवनाश्व का पुत्र त्रसद्दस्यु कहलाता था। यह नाम इन्द्र द्वारा रखा गया था। भगवान् की कृपा से युवनाश्व-पुत्र इतना शक्तिशाली था कि जब वह सम्राट बना तो उसने सात द्वीपों से युक्त सारे विश्व पर शासन किया। वह अद्वितीय शासक था।
 
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥