श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 9: मुक्ति  »  अध्याय 6: सौभरि मुनि का पतन  »  श्लोक 51

 
श्लोक
सङ्गं त्यजेत मिथुनव्रतीनां मुमुक्षु:
सर्वात्मना न विसृजेद् बहिरिन्द्रियाणि ।
एकश्चरन् रहसि चित्तमनन्त ईशे
युञ्जीत तद्‍व्रतिषु साधुषु चेत् प्रसङ्ग: ॥ ५१ ॥
 
शब्दार्थ
सङ्गम्—संगति; त्यजेत—छोड़ देना चाहिए; मिथुन-व्रतीनाम्—वैध या अवैध मैथुन कार्यों में लगे रहने वाले व्यक्तियों का; मुमुक्षु:— मोक्ष चाहने वाले व्यक्ति; सर्व-आत्मना—सभी प्रकार से; न—नहीं; विसृजेत्—काम में लगाये; बहि:-इन्द्रियाणि—बाहरी इन्द्रियों को; एक:—अकेले; चरन्—घूमते हुए; रहसि—एकान्त स्थान में; चित्तम्—मन; अनन्ते ईशे—असीम भगवान् के चरणकमलों पर स्थिर; युञ्जीत—लगाये; तत्-व्रतिषु—एक ही कोटि के लोगों के साथ (जो भवबन्धन से मोक्ष के कामी हों); साधुषु—ऐसे पुरुषों की; चेत्—यदि; प्रसङ्ग:—संगति ।.
 
अनुवाद
 
 भवबन्धन से मोक्ष की कामना करने वाले पुरुष को वासनामय जीवन में रुचि रखने वाले व्यक्तियों की संगति छोड़ देनी चाहिए और अपनी इन्द्रियों को किसी बाह्यकर्म में (देखने, सुनने, बोलने, चलने इत्यादि) नहीं लगाना चाहिए। उसे सदैव एकान्त स्थान में ठहरना चाहिए और मन को अनन्त भगवान् के चरणकमलों पर पूर्णत: स्थिर करना चाहिए। यदि कोई संगति करनी भी हो तो उसे उसी प्रकार के कार्य में लगे पुरुषों की संगति करनी चाहिए।
 
तात्पर्य
 सौभरि मुनि अपने अनुभव से प्राप्त निष्कर्षों को हमारे समक्ष प्रस्तुत करते हुए उपदेश देते हैं कि भवसागर को पार करने की इच्छा रखने वाले मनुष्यों को वासनामय जीवन और धन-संग्रह में व्यस्त रहने वाले मनुष्यों की संगति त्याग देनी चाहिए। श्री चैतन्य महाप्रभु ने भी यही उपदेश दिया है : निष्किञ्चनस्य भगवद्भजनोन्मुखस्य पारं परं जिगमिषोर्भवसागरस्य।
सन्दर्शनं विषयिणामथ योषितां च हा हन्त हन्त विषभक्षणतोऽप्यसाधु ॥

(चैतन्य चन्द्रोदय नाटक ८.२७) “ओह! भवसागर को पार करने की तथा बिना किसी कामना के भगवान् की दिव्य प्रेमाभक्ति में व्यस्त रहने की सच्ची इच्छा रखने वाले के लिए इन्द्रियतृप्ति में लगे भौतिकतावादी को देखना तथा इसी प्रकार की रुचि वाली स्त्री को देखना जानबूझ कर विषपान करने से भी घृणित है।”

जो व्यक्ति भवबन्धन से पूर्ण छुटकारा पाना चाहता है उसे भगवान् की दिव्य प्रेमाभक्ति में लगना चाहिए। उसे विषयी पुरुषों की संगति नहीं करनी चाहिए। हर भौतिकतावादी व्यक्ति काम-वासना में रुचि रखता है। इस तरह सीधे-सादे शब्दों में यह सलाह दी गई है कि उच्च साधुपुरुष को भौतिकतावादी प्रवृत्ति वाले लोगों की संगति से बचकर रहना चाहिए। श्रील नरोत्तम दास ठाकुर भी आचार्यों की सेवा करने के लिए संस्तुति करते हैं और यदि किसी की संगति करनी ही है तो भक्तों की संगति करनी चाहिए (तांदेर चरण सेवि भक्त-सने वास )। कृष्णभावनामृत आन्दोलन भक्त उत्पन्न करने के लिए अपने अनेक केन्द्रों की स्थापना कर रहा है जिससे ऐसे केन्द्रों के सदस्यों से सम्पर्क बढ़ाने से लोगों को भौतिक कार्यों में स्वत: अरुचि होने लगे। यद्यपि यह अत्यन्त महत्त्वाकांक्षी प्रस्ताव है, किन्तु यह संघटन भगवान् चैतन्य महाप्रभु की दया से प्रभावशाली सिद्ध हो रहा है। कृष्णभावनामृत आन्दोलन के सदस्यों की क्रमश: संगति करने, केवल प्रसाद ग्रहण करने तथा हरे कृष्णमंत्र का कीर्तन करने से सामान्य लोग काफी ऊँचे उठ जाते हैं। सौभरि मुनि को पश्चात्ताप हो रहा है कि अत्यंत गहरे जल में भी वे बुरी संगति में रहे और मैथुनरत मछली की कुसंगति से उनका पतन हुआ। एकान्त स्थान भी तब तक सुरक्षित नहीं होता जब तक वहाँ अच्छी संगति न मिले।

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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥