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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 9: मुक्ति  »  अध्याय 6: सौभरि मुनि का पतन  »  श्लोक 7
 
 
श्लोक  9.6.7 
तथेति स वनं गत्वा मृगान् हत्वा क्रियार्हणान् ।
श्रान्तो बुभुक्षितो वीर: शशं चाददपस्मृति: ॥ ७ ॥
 
शब्दार्थ
तथा—आदेशानुसार; इति—इस प्रकार; स:—विकुक्षि; वनम्—जंगल में; गत्वा—जाकर; मृगान्—पशुओं को; हत्वा—मारकर; क्रिया-अर्हणान्—श्राद्ध में यज्ञ करने के उपयुक्त; श्रान्त:—थका हुआ; बुभुक्षित:—तथा भूखा; वीर:—वीर पुरुष; शशम्—खरहे को; —भी; आदत्—खाया; अपस्मृति:—यह भूल गया (कि यह मांस श्राद्ध में भेंट के लिए है) ।.
 
अनुवाद
 
 तत्पश्चात् इक्ष्वाकु पुत्र विकुक्षि जंगल में गया और उसने श्राद्ध में भेंट देने के लिए अनेक पशु मारे। किन्तु जब वह थक गया और भूखा हुआ तो भूल से उसने मारे हुए एक खरगोश को खा लिया।
 
तात्पर्य
 स्पष्ट है कि क्षत्रिय लोग जंगल में जाकर पशुओं का वध करते थे क्योंकि पशुओं का मांस विशेष प्रकार के यज्ञों में भेंट चढ़ाया जाता था। श्राद्ध में पूर्वजों को भेंटें चढ़ाना भी एक प्रकार का यज्ञ है। इस यज्ञ में जंगल में किए गए शिकार से प्राप्त किया गया मांस भेंट किया जाता था। लेकिन अधुना कलियुग में ऐसी भेंट चढ़ाना वर्जित है। ब्रह्मवैवर्त पुराण से उद्धरण देते हुए श्री चैतन्य महाप्रभु ने कहा—

अश्वमेधं गवालम्भं संन्यासं पलपैतृकम्।

देवरेण सुतोत्पत्तिं कलौ पञ्च विवर्जयेत् ॥

“इस कलिकाल में पाँच कर्म वर्जित हैं—यज्ञ में घोड़े की बलि, यज्ञ में गाय की बलि, संन्यास आश्रम ग्रहण करना, पितरों को श्राद्ध में मांस भेंट करना तथा अपने अनुज की पत्नी से सन्तान उत्पन्न करना।” पल-पैतृकम् शब्द पितरों के श्राद्ध में मांस की भेंट चढ़ाने का सूचक है। पहले ऐसी भेंट की अनुमति दी जाती थी, किन्तु इस युग में यह वर्जित है। कलियुग में हर व्यक्ति पशु का शिकार करने में पटु है, किन्तु अधिकांश लोग क्षत्रिय न होकर शूद्र हैं। वैदिक आदेशानुसार क्षत्रिय ही शिकार कर सकते हैं जबकि शूद्रों को देवी काली या अन्य देवताओं के अर्चाविग्रह के समक्ष बकरे या अन्य नगण्य पशुओं की बलि देकर मांस खाने की अनुमति प्राप्त है। कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है कि मांस खाना सर्वथा वर्जित नहीं है; किसी विशेष श्रेणी के व्यक्तियों को विविध परिस्थितियों एवं आदेशों के अनुसार मांस खाने की अनुमति प्राप्त है। किन्तु जहाँ तक गोमांस खाने की बात है, यह सर्वथा वर्जित है। इसीलिए भगवद्गीता में कृष्ण स्वयं गोरक्ष्यम् अर्थात् गोरक्षा की बात कहते हैं। मांस खाने वालों को विभिन्न स्थितियों एवं शास्त्रों के निर्देशानुसार मांस खाने की अनुमति मिली है लेकिन गोमांस की कदापि नहीं। गायों की पूरी तरह से रक्षा की जानी चाहिए।

 
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