श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 9: मुक्ति  »  अध्याय 6: सौभरि मुनि का पतन  »  श्लोक 8

 
श्लोक
शेषं निवेदयामास पित्रे तेन च तद्गुरु: ।
चोदित: प्रोक्षणायाह दुष्टमेतदकर्मकम् ॥ ८ ॥
 
शब्दार्थ
शेषम्—उच्छिष्ट; निवेदयाम् आस—उसने प्रदान किया; पित्रे—अपने पिता को; तेन—उसके द्वारा; च—भी; तत्-गुरु:—उनके गुरु ने; चोदित:—आग्रह किये जाने पर; प्रोक्षणाय—शुद्ध करने के लिए; आह—कहा; दुष्टम्—प्रदूषित; एतत्—यह मांस; अकर्मकम्— श्राद्ध में अर्पित करने के अयोग्य ।.
 
अनुवाद
 
 विकुक्षि ने शेष मांस राजा इक्ष्वाकु को लाकर दे दिया जिन्होंने उसे शुद्ध करने के लिए वसिष्ठ को दे दिया। लेकिन वसिष्ठ यह तुरन्त समझ गये कि उस मांस का कुछ भाग विकुक्षि ने पहले ही ग्रहण कर लिया है; अतएव उन्होंने कहा कि यह मांस श्राद्ध में प्रयुक्त होने केलिए अनुपयुक्त है।
 
तात्पर्य
 यज्ञ में प्रयुक्त की जाने वाली किसी भी वस्तु को अर्चाविग्रह को भेंट किये बिना चखा नहीं जा सकता। हमारे मन्दिरों में यह नियम लागू है। जब तक भोजन अर्चाविग्रह को अर्पित नहीं कर दिया जाता तब तक कोई व्यक्ति रसोई से भोजन खा नहीं सकता। यदि अर्चाविग्रह
को भेंट करने के पूर्व कुछ भी निकाल लिया जाता है तो सारा भोजन दूषित हो जाता है और उसे अर्चाविग्रह पर नहीं चढ़ाया जाता। जो लोग अर्चाविग्रह की पूजा करते हैं उन्हें इसे ठीक से जान लेना चाहिए जिससे वे अर्चाविग्रह पूजा में अपराध करने से बचे रहें।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥