श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 9: मुक्ति  »  अध्याय 7: राजा मान्धाता के वंशज  »  श्लोक 14

 
श्लोक
पुनर्जाता यजस्वेति स प्रत्याहाथ सोऽब्रवीत् ।
सान्नाहिको यदा राजन् राजन्योऽथ पशु: शुचि: ॥ १४ ॥
 
शब्दार्थ
पुन:—फिर से; जाता:—उग आये हैं; यजस्व—बलि चढ़ाओ; इति—इस प्रकार; स:—उसने, वरुण ने; प्रत्याह—उत्तर दिया; अथ— तत्पश्चात्; स:—वह, हरिश्चन्द्र; अब्रवीत्—बोला; सान्नाहिक:—ढाल से अपने को सजाने में समर्थ; यदा—जब; राजन्—हे राजा वरुण; राजन्य:—क्षत्रिय; अथ—तब; पशु:—बलि पशु; शुचि:—पवित्र हो जाता है ।.
 
अनुवाद
 
 जब दाँत फिर से उग आये तो वरुण फिर आया और हरिश्चन्द्र से बोला, “अब तुम यज्ञ कर सकते हो।” किन्तु तब हरिश्चन्द्र ने कहा, “हे राजा, जब बलि का पशु क्षत्रिय बन जाता है और वह अपने शत्रु से अपनी रक्षा करने में समर्थ हो जाता है, तभी वह शुद्ध बनेगा।”
 
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥