श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 9: मुक्ति  »  अध्याय 7: राजा मान्धाता के वंशज  »  श्लोक 19

 
श्लोक
एवं द्वितीये तृतीये चतुर्थे पञ्चमे तथा ।
अभ्येत्याभ्येत्य स्थविरो विप्रो भूत्वाह वृत्रहा ॥ १९ ॥
 
शब्दार्थ
एवम्—इस प्रकार; द्वितीये—दूसरे वर्ष; तृतीये—तीसरे वर्ष; चतुर्थे—चौथे वर्ष; पञ्चमे—पाँचवें वर्ष; तथा—और; अभ्येत्य—उसके सामने आकर; अभ्येत्य—फिर से उसके सामने आकर; स्थविर:—अत्यन्त वृद्ध पुरुष; विप्र:—ब्राह्मण; भूत्वा—बनकर; आह—कहा; वृत्र-हा—इन्द्र ने ।.
 
अनुवाद
 
 इस तरह द्वितीय, तृतीय, चतुर्थ तथा पंचम वर्षों के अन्त में जब-जब रोहित अपनी राजधानी लौटना चाहता तो इन्द्र एक वृद्ध ब्राह्मण के वेश में उसके पास पहुँचता और वापस जाने के लिए उसे मना करता। वह गत वर्ष जैसे ही शब्दों को फिर से दुहराता।
 
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥