श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 9: मुक्ति  »  अध्याय 7: राजा मान्धाता के वंशज  »  श्लोक 24

 
श्लोक
सत्यं सारं धृतिं द‍ृष्ट्वा सभार्यस्य च भूपते: ।
विश्वामित्रो भृशं प्रीतो ददावविहतां गतिम् ॥ २४ ॥
 
शब्दार्थ
सत्यम्—सत्य; सारम्—दृढ़ता; धृतिम्—सहनशीलता; दृष्ट्वा—देखकर; स-भार्यस्य—अपनी पत्नी सहित; च—तथा; भूपते:— महाराज हरिश्चन्द्र का; विश्वामित्र:—मुनि विश्वामित्र; भृशम्—अत्यधिक; प्रीत:—प्रसन्न होकर; ददौ—उसे दिया; अविहताम् गतिम्— अक्षय ज्ञान ।.
 
अनुवाद
 
 विश्वामित्र ने देखा कि महाराज हरिश्चन्द्र अपनी पत्नी सहित सत्यप्रिय, सहिष्णु तथा दृढ़ था। इस तरह उन्होंने मानव उद्देश्य की पूर्ति के लिए उन्हें अक्षय ज्ञान प्रदान किया।
 
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥