श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 9: मुक्ति  »  अध्याय 8: भगवान् कपिलदेव से सगर-पुत्रों की भेंट  »  श्लोक 22

 
श्लोक
ये देहभाजस्त्रिगुणप्रधाना
गुणान् विपश्यन्त्युत वा तमश्च ।
यन्मायया मोहितचेतसस्त्वां
विदु: स्वसंस्थं न बहि:प्रकाशा: ॥ २२ ॥
 
शब्दार्थ
ये—जिन पुरुषों ने; देह-भाज:—भौतिक शरीर धारण किया है; त्रि-गुण-प्रधाना:—भौतिक प्रकृति के तीनों गुणों द्वारा प्रभावित; गुणान्—तीनों गुणों की अभिव्यक्ति; विपश्यन्ति—केवल देख सकते हैं; उत—ऐसा कहा जाता है; वा—अथवा; तम:—तमोगुण; च—और; यत्-मायया—जिसकी माया से; मोहित—मोहित; चेतस:—जिनके हृदय; त्वाम्—आपको; विदु:—जानते हैं; स्व संस्थम्—अपने शरीर में स्थित; न—नहीं; बहि:-प्रकाशा:—जो केवल बहिरंगा शक्ति के फलों को देख पाते हैं ।.
 
अनुवाद
 
 हे स्वामी, आप सबों के हृदयों मे भलीभाँति स्थित हैं, किन्तु भौतिक शरीर से आवृत सारे जीव आपको नहीं देख पाते क्योंकि वे त्रिगुणमयी माया द्वारा प्रेरित बहिरंगा शक्ति के द्वारा प्रभावित रहते हैं। उनकी बुद्धि सतो, रजो तथा तमो गुणों से ढकी होने से वे प्रकृतिके इन तीनों गुणों की क्रियाओं- प्रतिक्रियाओं को ही देख पाते हैं। तमोगुण की क्रिया-प्रतिक्रियाओं के कारण जाग्रत या सुप्त जीव प्रकृति की कार्यविधि को ही देख पाते हैं; वे आप (भगवान्) को नहीं देख सकते।
 
तात्पर्य
 भगवान् की प्रेमाभक्ति में स्थित हुए बिना प्रत्येक मनुष्य भगवान् को समझने में असमर्थ रहता है। भगवान् हरएक के हृदय में स्थित हैं। किन्तु बद्धजीव प्रकृति द्वारा प्रभावित होने के कारण उसके कर्मों तथा फलों को ही देख पाते हैं, भगवान् को नहीं। अतएव मनुष्य को भीतर-बाहर से अपने आपको पवित्र बनाना चाहिए।
अपवित्र: पवित्रो वा सर्वावस्थां गतोऽपि वा।

य: स्मरेत् पुण्डरीकाक्षं स बाह्याभ्यन्तर: शुचि: ॥

अपने आप को बाहर से स्वच्छ रखने के लिए हमें तीन बार स्नान करना चाहिए और आन्तरिक शुद्धि के लिए हमें हरे कृष्ण मंत्र का कीर्तन करके अपने हृदय को शुद्ध करना चाहिए। कृष्णभावनामृत आन्दोलन के सारे सदस्यों को इस नियम (बाह्याभ्यन्तर शुचि: ) का सदैव पालन करना चाहिए। तभी एक दिन भगवान् का साक्षात्कार हो सकेगा।

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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥