श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 9: मुक्ति  »  अध्याय 8: भगवान् कपिलदेव से सगर-पुत्रों की भेंट  »  श्लोक 25

 
श्लोक
त्वन्मायारचिते लोके वस्तुबुद्ध्या गृहादिषु ।
भ्रमन्ति कामलोभेर्ष्यामोहविभ्रान्तचेतस: ॥ २५ ॥
 
शब्दार्थ
त्वत्-माया—आपकी माया से; रचिते—निर्मित; लोके—इस जगत में; वस्तु-बुद्ध्या—वास्तविक मानते हुए; गृह-आदिषु—घर आदि में.; भ्रमन्ति—घूमते हैं; काम—विषयवासनाओं से; लोभ—लालच से; ईर्ष्या—द्वेष से; मोह—तथा मोह से; विभ्रान्त—मोहग्रस्त; चेतस:—जिनके हृदय ।.
 
अनुवाद
 
 हे भगवन्, जिनके मन काम, लोभ, ईर्ष्या तथा मोह से मोहित हैं वे आपकी माया द्वारा सृजित इस जगत में झूठे ही घर, गृहस्थी आदि में रुचि रखते हैं। वे घर, पत्नी तथा सन्तान में आसक्त रहकर इसी जगत में निरन्तर घूमते रहते हैं।
 
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥