श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 9: मुक्ति  »  अध्याय 8: भगवान् कपिलदेव से सगर-पुत्रों की भेंट  »  श्लोक 26

 
श्लोक
अद्य न: सर्वभूतात्मन् कामकर्मेन्द्रियाशय: ।
मोहपाशो द‍ृढश्छिन्नो भगवंस्तव दर्शनात् ॥ २६ ॥
 
शब्दार्थ
अद्य—आज; न:—हमारा; सर्व-भूत-आत्मन्—हे परमात्मा स्वरूप; काम-कर्म-इन्द्रिय-आशय:—कामवासनाओं तथा सकाम कर्मों के अधीन रहकर; मोह-पाश:—मोह की यह कठिन ग्रन्थि; दृढ:—अत्यन्त प्रबल; छिन्न:—टूट गई; भगवन्—हे भगवान्; तव दर्शनात्—आपके दर्शन मात्र से ।.
 
अनुवाद
 
 हे समस्त जीवों के परमात्मा, हे भगवान्, मैं अब आपके दर्शनमात्र से सारी कामवासनाओं से मुक्त हो गया हूँ जो दुर्लंघ्य मोह तथा संसार-बन्धन के मूल कारण हैं।
 
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥