श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 9: मुक्ति  »  अध्याय 8: भगवान् कपिलदेव से सगर-पुत्रों की भेंट  »  श्लोक 4

 
श्लोक
आज्ञायास्यै सपत्नीभिर्गरो दत्तोऽन्धसा सह ।
सह तेनैव सञ्जात: सगराख्यो महायशा: ।
सगरश्चक्रवर्त्यासीत् सागरो यत्सुतै: कृत: ॥ ४ ॥
 
शब्दार्थ
आज्ञाय—(यह) जानते हुए; अस्यै—गर्भवती रानी को; सपत्नीभि:—बाहुक की अन्य पत्नियों के द्वारा; गर:—विष; दत्त:—दिया गया; अन्धसा सह—उसके भोजन के साथ; सह तेन—उस विष के साथ; एव—भी; सञ्जात:—उत्पन्नहुआ; सगर-आख्य:—सगर नाम से विख्यात; महा-यशा:—अत्यन्त ख्याति वाला; सगर:—राजा सगर; चक्रवर्ती—सम्राट; आसीत्—हुआ; सागर:—गंगासागर नामक स्थान; यत्-सुतै:—जिसके पुत्रों द्वारा; कृत:—खोदा गया था ।.
 
अनुवाद
 
 यह जानते हुए कि वह गर्भवती थी, उसकी सौतों ने उसको भोजन के साथ विष देने की मंत्रणा की लेकिन यह फलीभूत नहीं हुई। किन्तु इस विष सहित एक पुत्र उत्पन्न हुआ जो सगर (विष सहित) कहलाया। बाद में सगर सम्राट बना। गंगासागर नामक स्थान उसके पुत्रों द्वारा खोदा गया था।
 
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥