श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 9: मुक्ति  »  अध्याय 8: भगवान् कपिलदेव से सगर-पुत्रों की भेंट  »  श्लोक 8

 
श्लोक
सुमत्यास्तनया द‍ृप्ता: पितुरादेशकारिण: ।
हयमन्वेषमाणास्ते समन्तान्न्यखनन् महीम् ॥ ८ ॥
 
शब्दार्थ
सुमत्या: तनया:—रानी सुमति से उत्पन्न पुत्र; दृप्ता:—अपने पराक्रम तथा प्रभाव से गर्वित; पितु:—अपने पिता (सगर) का; आदेश- कारिण:—आदेश का पालन करते हुए; हयम्—(इन्द्र द्वारा चुराये) घोड़े को; अन्वेषमाणा:—ढूँढते हुए; ते—वे सब; समन्तात्— सर्वत्र; न्यखनन्—खोद डाला; महीम्—पृथ्वी को ।.
 
अनुवाद
 
 (राजा सगर के दो पत्नियाँ थीं—सुमति तथा केशिनी)। सुमति के पुत्रों ने, जिन्हें अपने पराक्रम तथा प्रभाव पर गर्व था, अपने पिता के आदेशानुसार खोये हुए घोड़े को सर्वत्र ढूँढा। ऐसा करते हुए उन्होंने पृथ्वी को बहुत दूर तक खोद डाला।
 
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥