श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 9: मुक्ति  »  अध्याय 9: अंशुमान की वंशावली  »  श्लोक 1

 
श्लोक
श्रीशुक उवाच
अंशुमांश्च तपस्तेपे गङ्गानयनकाम्यया ।
कालं महान्तं नाशक्नोत् तत: कालेन संस्थित: ॥ १ ॥
 
शब्दार्थ
श्री-शुक: उवाच—श्री शुकदेव गोस्वामी ने कहा; अंशुमान्—अंशुमान राजा ने; च—भी; तप: तेपे—तपस्या की; गङ्गा—गंगा नदी; आनयन-काम्यया—अपने पूर्वजों का उद्धार करने के लिए गंगा को इस भौतिक जगत में लाने की इच्छा से; कालम्—काल; महान्तम्—दीर्घकाल तक; न—नहीं; अशक्नोत्—सफल हुआ; तत:—तत्पश्चात्; कालेन—समय आने पर; संस्थित:—मर गया ।.
 
अनुवाद
 
 शुकदेव गोस्वामी ने आगे कहा : राजा अंशुमान ने अपने पितामह की तरह दीर्घकाल तक तपस्या की तो भी वह गंगा नदी को इस भौतिक जगत में न ला सका और उसके बाद कालक्रम में उसका देहान्त हो गया।
 
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥