श्रीमद् भागवतम
शब्द आकार

भागवत पुराण  »  स्कन्ध 9: मुक्ति  »  अध्याय 9: अंशुमान की वंशावली  »  श्लोक 14

 
श्लोक
न ह्येतत् परमाश्चर्यं स्वर्धुन्या यदिहोदितम् ।
अनन्तचरणाम्भोजप्रसूताया भवच्छिद: ॥ १४ ॥
 
शब्दार्थ
न—नहीं; हि—निस्सन्देह; एतत्—यह; परम्—चरम; आश्चर्यम्—आश्चर्यजनक वस्तु; स्वर्धुन्या:—गंगाजल का; यत्—जो; इह— यहाँ पर; उदितम्—कहा गया है; अनन्त—भगवान् का; चरण-अम्भोज—चरणकमलों से; प्रसूताया:—निकलने वाले का; भव छिद:—भवबन्धन से छुड़ाने में समर्थ ।.
 
अनुवाद
 
 चूँकि गंगामाता भगवान् अनन्तदेव के चरणकमल के अँगूठे से निकलती हैं, अतएव वे मनुष्य को भवबन्धन से मुक्त करने में सक्षम हैं। इसलिए यहाँ पर उनके विषय में जो कुछ बतलाया जा रहा है वह तनिक भी आश्चर्यजनक नहीं है।
 
तात्पर्य
 यह वास्तव में देखा गया है कि जो व्यक्ति नियमित रूप से गंगास्नान करके गंगाजी की पूजा करता है उसका स्वास्थ्य ठीक रहता है और वह धीरे-धीरे भगवद्भक्त बन जाता है। यह गंगाजल में स्नान करने का प्रभाव है। सारे वैदिक शास्त्रों में गंगा
में स्नान करने की संस्तुति की गई है; अतएव जो भी इस पथ को ग्रहण करेगा वह सारे पापफलों से पूर्णतया छूट जायेगा। इसके ज्वलन्त प्रमाण महाराज सगर के भस्मीभूत पुत्र हैं जो गंगाजल के स्पर्शमात्र से स्वर्गलोक को प्राप्त हुए।
____________________________
 
All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥