श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 9: मुक्ति  »  अध्याय 9: अंशुमान की वंशावली  »  श्लोक 18

 
श्लोक
तत: सुदासस्तत्पुत्रो दमयन्तीपतिर्नृप: ।
आहुर्मित्रसहं यं वै कल्माषाङ्‌घ्रिमुत क्‍वचित् ।
वसिष्ठशापाद् रक्षोऽभूदनपत्य: स्वकर्मणा ॥ १८ ॥
 
शब्दार्थ
तत:—सर्वकाम से; सुदास:—सुदास उत्पन्न हुआ; तत्-पुत्र:—सुदास का पुत्र; दमयन्ती-पति:—दमयन्ती का पति; नृप:—राजा बना; आहु:—कहा जाता है; मित्रसहम्—मित्रसह; यम् वै—भी; कल्माषाङ्घ्रिम्—कल्माषपाद से; उत—ज्ञात; क्वचित्—कभी; वसिष्ठ शापात्—वसिष्ठ के शाप से; रक्ष:—मनुष्यभक्षक; अभूत्—बना; अनपत्य:—सन्तानहीन; स्व-कर्मणा—अपने पापपूर्ण कर्म से ।.
 
अनुवाद
 
 सर्वकाम के एक सुदास नामक पुत्र हुआ जिसका पुत्र सौदास कहलाया जो दमयन्ती का पति था। कभी-कभी सौदास मित्रसह या कल्माषपाद के नाम से जाना जाता है। अपने ही दुष्कर्मों के कारण मित्रसह नि:सन्तान था और उसे वसिष्ठ द्वारा राक्षस बनने का शाप मिला।
 
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥