श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 9: मुक्ति  »  अध्याय 9: अंशुमान की वंशावली  »  श्लोक 25

 
श्लोक
राक्षसं भावमापन्न: पादे कल्माषतां गत: ।
व्यवायकाले दद‍ृशे वनौकोदम्पती द्विजौ ॥ २५ ॥
 
शब्दार्थ
राक्षसम्—मनुष्यभक्षक; भावम्—प्रवृत्ति; आपन्न:—प्राप्त करके; पादे—पाँव पर; कल्माषताम्—काला धब्बा; गत:—प्राप्त किया; व्यवाय-काले—मैथुन के समय; ददृशे—देखा; वन-ओक:—वनवासी; दम्-पती—पति-पत्नी; द्विजौ—ब्राह्मण ।.
 
अनुवाद
 
 इस तरह सौदास ने मानवभक्षी प्रवृत्ति अर्जित कर ली और उसके पाँव में एक काला धब्बा हो गया जिससे वह कल्माषपाद कहलाया। एक बार कल्माषपाद ने एक ब्राह्मण दम्पति को जंगल में संभोगरत देखा।
 
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥