श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 9: मुक्ति  »  अध्याय 9: अंशुमान की वंशावली  »  श्लोक 29

 
श्लोक
एष हि ब्राह्मणो विद्वांस्तप:शीलगुणान्वित: ।
आरिराधयिषुर्ब्रह्म महापुरुषसंज्ञितम् ।
सर्वभूतात्मभावेन भूतेष्वन्तर्हितं गुणै: ॥ २९ ॥
 
शब्दार्थ
एष:—यह; हि—निस्सन्देह; ब्राह्मण:—योग्य ब्राह्मण; विद्वान्—वैदिक ज्ञान में पारंगत; तप:—तपस्या; शील—सदाचरण; गुण- अन्वित:—सारे सद्गुणों से युक्त; आरिराधयिषु:—पूजा में लगने की इच्छा करता हुआ; ब्रह्म—परब्रह्म; महा-पुरुष—महापुरुष कृष्ण; संज्ञितम्—के नाम से विख्यात; सर्व-भूत—सारे जीवों का; आत्म-भावेन—परमात्मा रूप; भूतेषु—हर जीव में; अन्तर्हितम्—हृदय के भीतर; गुणै:—गुणों के द्वारा ।.
 
अनुवाद
 
 यह ब्राह्मण विद्वान अत्यन्त योग्य, तपस्या में रत तथा समस्त जीवों के हृदय में वास करने वाले परमात्मा परब्रह्म की पूजा करने के लिए परम उत्सुक है।
 
तात्पर्य
 ब्राह्मण की पत्नी अपने पति को ऐसा दिखावटी ब्राह्मण नहीं मानती थी जो ब्राह्मण कुल में उत्पन्न होने के कारण ब्राह्मण कहलाता हो। प्रत्युत यह ब्राह्मण ब्राह्मण-लक्षणों से युक्त होने से सचमुच योग्य था। यस्य यल्लक्षणं प्रोक्तम् (भागवत ७.११.३५)। ब्राह्मण के लक्षणों का उल्लेख शास्त्र में इस प्रकार हुआ है—
शमो दमस्तप: शौचं क्षान्तिरार्जवमेव च।

ज्ञानं विज्ञानमास्तिक्यं ब्रह्मकर्म स्वभावजम् ॥

“शान्ति, आत्मसंयम, तपस्या, शुद्धि, सहिष्णुता, निष्कपटता, ज्ञान, विज्ञान तथा धार्मिकता—ये गुण हैं जिनके द्वारा ब्राह्मण कर्म करता है।” (भगवद्गीता १८.४२) ब्राह्मण को न केवल सुयोग्य होना चाहिए अपितु उसे वास्तिवक ब्राह्मण-कर्म करने चाहिए। योग्यता ही पर्याप्त नहीं होगी, मनुष्य को ब्राह्मण के कर्तव्य भी करने चाहिए। ब्राह्मण का कर्तव्य है कि वह परब्रह्म कृष्ण को जाने (परं ब्रह्म परं धाम पवित्रं परमं भवान् )। चूँकि यह ब्राह्मण वास्तव में योग्य था और ब्रह्मकर्म में लगा था अतएव इसका वध करना अत्यन्त पापपूर्ण कृत्य होगा। ब्राह्मण की पत्नी ने अनुनय-विनय की कि उसके पति का वध न किया जाय।

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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥