श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 9: मुक्ति  »  अध्याय 9: अंशुमान की वंशावली  »  श्लोक 3

 
श्लोक
दर्शयामास तं देवी प्रसन्ना वरदास्मि ते ।
इत्युक्त: स्वमभिप्रायं शशंसावनतो नृप: ॥ ३ ॥
 
शब्दार्थ
दर्शयाम् आस—प्रकट हुई; तम्—उसको, भगीरथ को; देवी—माता गंगा; प्रसन्ना—अत्यन्त प्रसन्न होकर; वरदा अस्मि—मैं वर दूँगी; ते—तुमको; इति उक्त:—इस प्रकार सम्बोधित करके; स्वम्—अपनी; अभिप्रायम्—इच्छा; शशंस—बतलायी; अवनत:— आदरपूर्वक झुककर प्रणाम करके; नृप:—राजा (भगीरथ) ने ।.
 
अनुवाद
 
 तत्पश्चात् माता गंगा राजा भगीरथ के समक्ष प्रकट होकर बोलीं, “मैं तुम्हारी तपस्या से अत्यधिक प्रसन्न हूँ और तुम्हें मुँहमाँगा वर देने को तैयार हूँ।” गंगादेवी द्वारा इस प्रकार सम्बोधित हुए राजा ने उनके समक्ष अपना सिर झुकाया और अपना मन्तव्य बतलाया।
 
तात्पर्य
 राजा का मन्तव्य अपने उन पूर्वजों का उद्धार कराना था
जो कपिल मुनि का अनादर करने के कारण भस्म हो गये थे।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥