श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 9: मुक्ति  »  अध्याय 9: अंशुमान की वंशावली  »  श्लोक 33

 
श्लोक
एवं करुणभाषिण्या विलपन्त्या अनाथवत् ।
व्याघ्र: पशुमिवाखादत् सौदास: शापमोहित: ॥ ३३ ॥
 
शब्दार्थ
एवम्—इस प्रकार; करुण-भाषिण्या:—करुणभाव से बोलती वह ब्राह्मण की पत्नी; विलपन्त्या:—घोर विलाप करती; अनाथ वत्—उस स्त्री के समान जिसका कोई रक्षक न हो; व्याघ्र:—बाघ; पशुम्—पशु; इव—सदृश; अखादत्—खा लिया; सौदास:— राजा सौदास ने; शाप—शाप से; मोहित:—शापित होने से ।.
 
अनुवाद
 
 वसिष्ठ के शापवश राजा सौदास उस ब्राह्मण को निगल गया, जिस तरह कोई बाघ अपने शिकार को निगल जाता है। यद्यपि ब्राह्मणपत्नी ने अत्यन्त कातरभाव से विनय की, किन्तु उसके विलाप से भी सौदास नहीं पसीजा।
 
तात्पर्य
 यह भाग्य का उदाहरण है। राजा सौदास को वसिष्ठ ने शाप दे दिया था अतएव योग्य होते हुए भी वह व्याघ्र-सदृश राक्षस बनने से अपने को रोक नहीं पाया क्योंकि यही उसके भाग्य में बदा था। तल्लभ्यते दु:खवद् अन्यत: सुखम् (भागवत १.५.१८)। जिस तरह भाग्य के द्वारा
मनुष्य संकट में फँसता है उसी तरह भाग्य से वह सुख भी प्राप्त कर सकता है। भाग्य (भावी) अत्यन्त प्रबल है, किन्तु यदि कृष्णभावनामृत को प्राप्त कर लिया जाय तो भाग्य को बदला जा सकता है। कर्माणि निर्दहति किन्तु च भक्तिभाजाम् (ब्रह्म-संहिता ५.५४)।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥