श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 9: मुक्ति  »  अध्याय 9: अंशुमान की वंशावली  »  श्लोक 4

 
श्लोक
कोऽपि धारयिता वेगं पतन्त्या मे महीतले ।
अन्यथा भूतलं भित्त्वा नृप यास्ये रसातलम् ॥ ४ ॥
 
शब्दार्थ
क:—वह कौन व्यक्ति है; अपि—निस्सन्देह; धारयिता—धारण कर सकता है; वेगम्—तरंगों के वेग को; पतन्त्या:—नीचे गिरती हुई; मे—मेरे; मही-तले—पृथ्वी पर; अन्यथा—अन्यथा; भू-तलम्—पृथ्वी की सतह; भित्त्वा—भेदकर; नृप—हे राजा; यास्ये—नीचे चली जाऊँगी; रसातलम्—पाताल ।.
 
अनुवाद
 
 माता गंगा ने उत्तर दिया: जब मैं आकाश से पृथ्वीलोक के धरातल पर गिरूँगी तो मेरा जल अत्यन्त वेगवान होगा। इस वेग को कौन धारण कर सकेगा? यदि कोई मुझे धारण नहीं कर सकेगा तो मैं पृथ्वी की सतह को भेदकर रसातल में अर्थात् ब्रह्माण्ड के पाताल क्षेत्र में चली जाऊँगी।
 
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥