श्रीमद् भागवतम
शब्द आकार

भागवत पुराण  »  स्कन्ध 9: मुक्ति  »  अध्याय 9: अंशुमान की वंशावली  »  श्लोक 46

 
श्लोक
ये विक्षिप्तेन्द्रियधियो देवास्ते स्वहृदि स्थितम् ।
न विन्दन्ति प्रियं शश्वदात्मानं किमुतापरे ॥ ४६ ॥
 
शब्दार्थ
ये—जो महापुरुष; विक्षिप्त-इन्द्रिय-धिय:—जिनकी इन्द्रियाँ, मन तथा बुद्धि सदैव भौतिक अवस्थाओं के कारण विक्षुब्ध रहती हैं; देवा:—देवताओं की तरह; ते—ऐसे व्यक्ति; स्व-हृदि—अपने हृदय में; स्थितम्—स्थित; न—नहीं; विन्दन्ति—जानते हैं; प्रियम्— अत्यन्त प्रिय; शश्वत्—निरन्तर; आत्मानम्—भगवान् को; किम् उत—क्या कहा जाये; अपरे—अन्यों के विषय में ।.
 
अनुवाद
 
 यद्यपि देवताओं को स्वर्गलोक में स्थित होने का लाभ मिलता है, किन्तु उनके मन, इन्द्रियाँ तथा बुद्धि भौतिक अवस्थाओं से विक्षुब्ध रहती हैं। अतएव ऐसे महापुरुष भी हृदय में निरन्तर स्थित भगवान् का साक्षात्कार नहीं कर पाते। तो फिर अन्यों के विषय में, यथा मनुष्यों के विषय में, क्या कहा जाय जिन्हें बहुत ही कम लाभ प्राप्त हैं?
 
तात्पर्य
 वस्तुत: भगवान् हर एक के हृदय में सदैव स्थित रहते हैं(ईश्वर: सर्वभूतानां हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति )। लेकिन हम अपनी भौतिक चिन्ताओं के कारण जो इस भौतिक जगत में अनिवार्य हैं, भगवान् को समझ नहीं पाते, यद्यपि वह हमारे सन्निकट स्थित होते हैं। जो लोग सदैव भौतिक अवस्थाओं से विक्षुब्ध रहते हैं उनके लिए योग विधि की संस्तुति की जाती है जिससे वे अपने हृदय में स्थित भगवान् पर अपना मन क्रेन्द्रित कर सकें। ध्यानावस्थिततद्गतेन मनसा पश्यन्ति यं योगिन:। चूँकि भौतिक जगत में मन तथा इन्द्रियाँ सदा विक्षुब्ध रहती हैं अतएव मनुष्य को धारणा, आसन तथा ध्यान जैसी योग की विधियों से मन को शान्त करके उसे भगवान् में केन्द्रित करना चाहिए। दूसरे शब्दों
में, योग की विधि ईशसाक्षात्कार का भौतिक प्रयास है जब कि भक्ति ईशसाक्षात्कार की आध्यात्मिक विधि है। महाराज खट्वांग ने आध्यत्मिक मार्ग ग्रहण किया अतएव उन्हें किसी भी भौतिक वस्तु में रुचि नहीं रह गई थी। भगवद्गीता (१८.५५) में कृष्ण कहते हैं—भक्त्या मामभिजानाति—केवल भक्ति के द्वारा मुझे जाना जा सकता है। केवल भक्ति के द्वारा परब्रह्म भगवान् कृष्ण को समझा जा सकता है। भगवान् यह कभी नहीं कहते कि उन्हें योगाभ्यास या दार्शनिक चिन्तन के द्वारा जाना जा सकता है। भक्ति ऐसे सारे भौतिक प्रयासों से ऊपर है। अन्याभिलाषिताशून्यं ज्ञानकर्माद्यनावृतम्। भक्ति शुद्ध, होने के कारण ज्ञान या पुण्य कर्म से भी कलुषित नहीं होती।
____________________________
 
All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥