श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 9: मुक्ति  »  अध्याय 9: अंशुमान की वंशावली  »  श्लोक 47

 
श्लोक
अथेशमायारचितेषु सङ्गं
गुणेषु गन्धर्वपुरोपमेषु ।
रूढं प्रकृत्यात्मनि विश्वकर्तु-
र्भावेन हित्वा तमहं प्रपद्ये ॥ ४७ ॥
 
शब्दार्थ
अथ—अतएव; ईश-माया—भगवान् की माया के द्वारा; रचितेषु—रचे गये; सङ्गम्—अनुरक्ति; गुणेषु—प्रकृति के गुणों में; गन्धर्व पुर-उपमेषु—जिनकी उपमा गन्धर्वपुर के भ्रम से दी जाती है, यह ऐसे नगर या मकान हैंजो जंगल या पर्वत पर दिखते हैं; रूढम्— अत्यन्त शक्तिशाली; प्रकृत्या—प्रकृति के द्वारा; आत्मनि—परमात्मा में; विश्व-कर्तु:—सारे ब्रह्माण्ड के स्रष्टा की; भावेन—भक्ति से; हित्वा—त्यागकर; तम्—उसकी (भगवान् की); अहम्—मैं; प्रपद्ये—शरण में जाता हूँ ।.
 
अनुवाद
 
 अतएव मुझे अब भगवान् की बहिरंगा शक्ति अर्थात् माया द्वारा सृजित वस्तुओं से आसक्ति को त्याग देना चाहिए। मुझे भगवान् के ध्यान में संलग्न होना चाहिए और इस तरह उनकी शरण में जाना चाहिए। यह भौतिक सृष्टि भगवान् की माया से सृजित होने के कारण पर्वत पर या जंगल में स्थित काल्पनिक नगर के सदृश है। हर बद्धजीव को भौतिक वस्तुओं से प्राकृतिक आकर्षण एवं आसक्ति होती है, किन्तु मनुष्य को चाहिए कि इन्हें त्यागकर भगवान् की शरण में जाये।
 
तात्पर्य
 हवाई जहाज द्वारा किसी पर्वतीय क्षेत्र से गुजरते समय आकाश में मीनारों तथा महलों से युक्त कोई शहर दिख सकता है या फिर किसी जंगल में ऐसी वस्तुएँ दिख सकती हैं। यह गंधर्वपुर या मायाजाल कहलाता है। यह समग्र संसार ऐसे ही मायाजाल के सदृश है और हर एक संसारी पुरुष को इससे लगाव होता है। किन्तु कृष्णभावनामृत में उच्च प्रगति के कारण खट्वांग महाराज को ऐसी वस्तुओं में रुचि नहीं रह गई थी। भक्त भले ही ऊपर से संसारी कार्यकलापों में लगा रहे, किन्तु वह अपनी स्थिति को भलीभाँति जानता रहता है। निर्बन्ध: कृष्णसम्बन्धे युक्तं वैराग्यमुच्यते—यदि कोई ईश्वर की प्रेमाभक्ति से सम्बन्धित सारी भौतिक बातों में लगा रहता है तो वह युक्तवैराग्य में स्थित होता है। इस भौतिक जगत में अपनी इन्द्रियतुष्टि के लिए कुछ भी स्वीकार नहीं करना चाहिए—हर वस्तु भगवान् की सेवा के लिए होनी चाहिए। आध्यात्मिक जगत की यही मानसिकता है। महाराज खट्वांग उपदेश देते हैं कि मनुष्य भौतिक आसक्ति त्यागकर भगवान् की शरण ग्रहण करे। इस तरह जीवन में सफलता प्राप्त हो सकती है। यह शुद्ध भक्तियोग है जिसमें वैराग्य-विद्या अर्थात् विरक्ति तथा ज्ञान निहित हैं।
वैराग्यविद्यानिजभक्तियोग शिक्षार्थमेक: पुरुष: पुराण:।

श्रीकृष्णचैतन्यशरीरधारी कृपाम्बुभिर्यस्तमहं प्रपद्ये ॥

“मैं उन भगवान् की शरण ग्रहण करता हूँ जो अब भगवान् श्री चैतन्य महाप्रभु के रूप में प्रकट हुए हैं। वे कृपा के सिन्धु हैं और हमें विरक्ति, ज्ञान तथा अपनी भक्ति सिखलाने आये हैं।” (चैतन्य चन्द्रोदय नाटक ६.७४)। श्रीकृष्ण चैतन्य महाप्रभु ने इस वैराग्यविद्या के आन्दोलन का सूत्रपात किया जिससे मनुष्य अपने को भौतिक संसार से विरक्त करके प्रेमा-भक्ति में लगाता है। भक्ति का कृष्णभावनामृत आन्दोलन ही वह एकमात्र विधि है जो इस जगत में हमारे मिथ्या अहंकार का निराकरण कर सकती है।

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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥