श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 9: मुक्ति  »  अध्याय 9: अंशुमान की वंशावली  »  श्लोक 48

 
श्लोक
इति व्यवसितो बुद्ध्या नारायणगृहीतया ।
हित्वान्यभावमज्ञानं तत: स्वं भावमास्थित: ॥ ४८ ॥
 
शब्दार्थ
इति—इस प्रकार; व्यवसित:—दृढ़ निश्चय करके; बुद्ध्या—बुद्धि से; नारायण-गृहीतया—नारायण की कृपा से पूर्णतया वशीभूत; हित्वा—त्यागकर; अन्य-भावम्—कृष्णभावनामृत के अतिरिक्त अन्य चेतना; अज्ञानम्—जो निरतंर अज्ञान तथा अंधकार ही है; तत:—तत्पश्चात्; स्वम्—अपनी मूल स्थिति, जो कृष्ण के नित्यदास के रूप में है; भावम्—भक्ति में; आस्थित:—स्थित ।.
 
अनुवाद
 
 इस तरह भगवान् की सेवा करने में अपनी उन्नत बुद्धि से महाराज खट्वांग ने अज्ञानमय शरीर से मिथ्या सम्बन्ध का परित्याग कर दिया। अपनी नित्य सेवक की मूल स्थिति में रहकर उन्होंने भगवान् की सेवा करने में अपने को संलग्न कर लिया।
 
तात्पर्य
 जब वास्तव में कोई कृष्णभक्त बन जाता है तो उस पर किसी को शासन करने का अधिकार नहीं रह जाता। कृष्णभावनाभावित होने पर वह अज्ञान के अंधकार में नहीं रहता और ऐसे अज्ञान से मुक्त होने पर वह अपनी मूल
स्थिति में आरूढ़ होता है। जीवेर ‘स्वरूप’ हय—कृष्णेर ‘नित्यदास’। जीव भगवान् का नित्यदास होता है और जब वह सभी प्रकार से भगवान् की सेवा में लग जाता है तो उसे जीवन की सिद्धि प्राप्त होती है।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥