श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 9: मुक्ति  »  अध्याय 9: अंशुमान की वंशावली  »  श्लोक 49

 
श्लोक
यत् तद् ब्रह्म परं सूक्ष्ममशून्यं शून्यकल्पितम् ।
भगवान् वासुदेवेति यं गृणन्ति हि सात्वता: ॥ ४९ ॥
 
शब्दार्थ
यत्—जो; तत्—वैसा; ब्रह्म परम्—परब्रह्म, भगवान् कृष्ण; सूक्ष्मम्—आध्यात्मिक, सारी भौतिक धारणाओं से परे; अशून्यम्— निर्विशेष या शून्य नहीं; शून्य-कल्पितम्—कम बुद्धिमान व्यक्तियों द्वारा शून्य करके कल्पित; भगवान्—भगवान्; वासुदेव—कृष्ण; इति—इस प्रकार; यम्—जिसको; गृणन्ति—गायन करते हैं; हि—निस्सन्देह; सात्वता:—शुद्ध भक्तगण ।.
 
अनुवाद
 
 वे बुद्धिहीन मनुष्य जो भगवान् के निर्विशेष या शून्य न होने पर भी, उन्हें ऐसा मानते हैंउनके लिए भगवान् वासुदेव कृष्ण को समझ पाना अत्यन्त कठिन है। अतएव शुद्ध भक्त ही भगवान् को समझते तथा उनका गान करते हैं।
 
तात्पर्य
 श्रीमद्भागवत में (१.२.११) कहा गया है—
वदन्ति तत् तत्त्वविदस्तत्त्वं यज्ज्ञानमद्वयम्।

ब्रह्मेति परमात्मेति भगवान् इति शब्द्यते ॥

परम सत्य का साक्षात्कार तीन अवस्थाओं में किया जाता है—ब्रह्म, परमात्मा तथा भगवान् रूप में। भगवान् हर वस्तु के उद्गम हैं। ब्रह्म भगवान् का आंशिक स्वरूप है और वासुदेव भी, जो सर्वत्र एवं प्रत्येक हृदय में स्थित परमात्मा है, भगवान् की प्रगत अनुभूति है। किन्तु जब कोई भगवान् को समझ जाता है (वासुदेव: सर्वमिति ) और जब कोई यह अनुभव करता है कि वासुदेव परमात्मा तथा निराकार ब्रह्म दोनों हैं तो उसे पूर्ण ज्ञान होता है। इसीलिए अर्जुन ने कृष्ण को परं ब्रह्म परं धाम पवित्रं परमं भवान् कहा है। परं ब्रह्म शब्द निर्विशेष ब्रह्म की तथा सर्वव्यापी परमात्मा की शरण का निर्देश करते हैं। जब कृष्ण कहते हैं त्यक्त्वा देहं पुनर्जन्म नैति मामेति तो इसका अर्थ है कि सिद्ध भक्त पूर्ण साक्षात्कार के बाद भगवद्धाम को जाता है। महाराज खट्वांग ने भगवान् की शरण स्वीकार कर ली थी, फलस्वरूप उन्हें सिद्धि प्राप्त हुई।

 
इस प्रकार श्रीमद्भागवत के नवम स्कंध के अन्तर्गत “अंशुमान की वंशावली” नामक नवें अध्याय के भक्तिवेदान्त तात्पर्य पूर्ण हुए।
 
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥