श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 9: मुक्ति  »  अध्याय 9: अंशुमान की वंशावली  »  श्लोक 5

 
श्लोक
किं चाहं न भुवं यास्ये नरा मय्यामृजन्त्यघम् ।
मृजामि तदघं क्‍वाहं राजंस्तत्र विचिन्त्यताम् ॥ ५ ॥
 
शब्दार्थ
किम् च—भी; अहम्—मैं; न—नहीं; भुवम्—पृथ्वीलोक को; यास्ये—जाऊँगी; नरा:—लोग; मयि—मुझमें, मेरे जल में; आमृजन्ति—धोते हैं; अघम्—पापकर्मों के फल; मृजामि—धो सकूँ; तत्—वह; अघम्—पाकर्मों के फलों का संग्रह; क्व—किसको; अहम्—मैं; राजन्—हे राजा; तत्र—इस बात पर; विचिन्त्यताम्—ध्यान से विचार करके निर्णय करो ।.
 
अनुवाद
 
 हे राजा, मैं पृथ्वीलोक पर नहीं उतरना चाहती क्योंकि सभी लोग अपने पापकर्मों के फलों को धोने के लिए मुझमें स्नान करेंगे। जब ये सारे पापकर्मों के फल मुझमें एकत्र हो जायेंगे तो मैं उनसे किस तरह मुक्त हो सकूँगी? तुम इस पर ध्यानपूर्वक विचार करो।
 
तात्पर्य
 स्वंय भगवान् का कथन है (भगवद्गीता १८.६६)—
सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज।

अहं त्वां सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुच: ॥

“सारे धर्मों का परित्याग करके मेरी शरण में आओ। मैं सारे पापों से तुम्हारा उद्धार कर दूँगा। डरो मत।” भगवान् किसी भी व्यक्ति के पापों के फलों को ग्रहण करके उनका निराकरण कर सकते हैं क्योंकि वे सूर्य के समान पवित्र हैं जो कभी भी सांसारिक स्पर्श से दूषित नहीं होता। तेजीयसां न दोषाय वह्ने: सर्वभुजो यथा (भागवत १०.३३.२९)। जो अत्यन्त शक्तिमान है वह किसी पापकर्म से दूषित नहीं होता। किन्तु यहाँ हम देखते हैं कि माता गंगा उन लोगों के पाप से बोझिल होने से भयभीत हैं जो गंगाजल में स्नान करेंगे। इससे सूचित होता है कि भगवान् के अतिरिक्त अन्य कोई भी व्यक्ति अपने या अन्यों के पापकर्मों के फलों को दूर करने में समर्थ नहीं है। कभी-कभी गुरु को शिष्य बनाने के बाद उस के विगत पापकर्मों का भार ग्रहण करना पड़ता है; फलस्वरूप पापों से बोझिल हो जाने के कारण उसे कष्ट भोगना पड़ता है—पूरी तरह नहीं तो आंशिक रूप में—अतएव शिष्य को चाहिए कि दीक्षा ग्रहण करने के बाद पापकर्म करने के प्रति सतर्क रहे। बेचारा गुरु शिष्य को स्वीकार करते समय अत्यन्त कृपालु रहता है और शिष्य के पापकर्मों को अंशत: भोगता है, किन्तु भगवान् अपने दास पर कृपालु होने के कारण उस दास के पापकृत्यों के फलों का निराकरण कर देते हैं जो उनकी महिमा का प्रचार करने में लगा रहता है। माता गंगा भी लोगों के पापों के फलों से भयभीत होने के कारण चिन्तित थीं कि वे इन पापों के भार को किस तरह वहन कर सकेंगी।

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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥