श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 9: मुक्ति  »  अध्याय 9: अंशुमान की वंशावली  »  श्लोक 6

 
श्लोक
श्रीभगीरथ उवाच
साधवो न्यासिन: शान्ता ब्रह्मिष्ठा लोकपावना: ।
हरन्त्यघं तेऽङ्गसङ्गात् तेष्वास्ते ह्यघभिद्धरि: ॥ ६ ॥
 
शब्दार्थ
श्री-भगीरथ: उवाच—भगीरथ ने कहा; साधव:—सन्तपुरुष; न्यासिन:—संन्यासीजन; शान्ता:—शान्त, भौतिक झंझटों से मुक्त; ब्रह्मिष्ठा:—वैदिक शास्त्रों के अनुष्ठानों का पालन करने में पटु; लोक-पावना:—पतित अवस्था से लोगों का उद्धार करने में संलग्न; हरन्ति—दूर करेंगे; अघम्—पाप के फल; ते—तुम्हारा (गंगा का); अङ्ग-सङ्गात्—गंगाजल में नहाने से; तेषु—अपने में; आस्ते—है; हि—निस्सन्देह; अघ-भित्—सारे पापों को हरने वाले; हरि:—भगवान् ।.
 
अनुवाद
 
 भगीरथ ने कहा : जो भक्ति के कारण सन्त प्रकृति के हैं और भौतिक इच्छाओं से मुक्त संन्यासी बन चुके हैं, तथा जो वेदवर्णित अनुष्ठानों का पालन करने में पटु हैं और शुद्ध भक्त हैं वे सर्वदा महिमामंडित हैं और शुद्धाचरण वाले हैं तथा सभी पतितात्माओं का उद्धार करने में समर्थ हैं। जब ऐसे शुद्ध भक्त आपके जल में स्नान करेंगे तो अन्य लोगों के संचित पापों के फलों का निश्चय ही निराकरण हो सकेगा क्योंकि ऐसे भक्तगण उन भगवान् को अपने हृदयों में सदा धारण करते हैं जो सारे पापों को दूर कर सकते हैं।
 
तात्पर्य
 माता गंगा स्नान के लिए सबों को सुलभ हैं। अतएव गंगाजल में न केवल पापी लोग स्नान करेंगे अपितु हरद्वार तथा अन्य तीर्थस्थलों में जहाँ से होकर गंगा बहती हैं, सन्तजन तथा भक्तगण भी गंगाजल में स्नान करेंगे। भक्तगण तथा संन्यासीजन गंगा तक का उद्धार कर सकतेहैं। तीर्थीकुर्वन्ति तीर्थानि स्वान्त:स्थेन गदाभृता (भागवत १.१३.१०)। चूँकि सन्त भक्तजन सदैव भगवान् को अपने हृदय में धारण करते हैं अतएव वे तीर्थस्थानों को, सारे पापों के फलों को पूरी तरह धो कर, शुद्ध कर सकते हैं। अतएव सामान्य लोगों को चाहिए कि सन्तपुरुषों का सदैव आदर करें। ऐसा आदेश है कि किसी भी वैष्णव या संन्यासी का दर्शन होने पर उनका तुरंत आदर किया जाय। यदि आदर करने में भूल हो जाय तो उस दिन उपवास रखा जाय। यह वैदिक आदेश है। मनुष्य को चाहिए कि भक्त या सन्त के चरणकमलों के प्रति अपराध करने से अत्यन्त सतर्क रहे।
यद्यपि प्रायश्चित्त की विधियाँ हैं, किन्तु वे पापों के फलों को धोने में अपर्याप्त हैं। मनुष्य केवल भक्ति द्वारा सारे पापों के फलों से छूट सकता है जैसा कि अजामिल की कथा में कहा गया है— केचित् केवलया भक्त्या वासुदेवपरायणा:।

अघं धुन्वन्ति कार्त्स्न्येन नीहारं इव भास्कर: ॥

“केवल ऐसा व्यक्ति, जिसने कृष्ण की अनन्य भक्ति ग्रहण की होती है, पापकर्म रूपी खरपतवारों को समूल नष्ट कर सकता है ताकि वे पुन: न उभर आएँ। जिस तरह सूर्य अपनी किरणों से कुहरे को तुरन्त विनष्ट कर देता है उसी प्रकार मनुष्य भक्ति के द्वारा ऐसा कर सकता है।” (भागवत ६.१.१५)। यदि कोई व्यक्ति किसी भक्त के प्रश्रय में रहता है और निष्ठापूर्वक उसकी सेवा करता है तो वह भक्तियोग के द्वारा सारे पापकर्मों के फलों को नष्ट कर सकने में समर्थ होता है।”

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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥