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श्री महाभारत  »  पर्व 4: विराट पर्व  » 
 
 
 
पाण्डवप्रवेश पर्वसमयपालन पर्वकीचकवध पर्वगोहरण पर्व
वैवाहिक पर्व
 
 
 
 
उपपर्व: पाण्डवप्रवेश पर्व
अध्याय 1:  विराटनगरमें अज्ञातवास करनेके लिये पाण्डवोंकी गुप्त मन्त्रणा तथा युधिष्ठिरके द्वारा अपने भावी कार्यक्रमका दिग्दर्शन
 
अध्याय 2:  भीमसेन और अर्जुनद्वारा विराटनगरमें किये जानेवाले अपने अनुकूल कार्योंका निर्देश
 
अध्याय 3:  नकुल, सहदेव तथा द्रौपदीद्वारा अपने-अपने भावी कर्तव्योंका दिग्दर्शन
 
अध्याय 4:  धौम्यका पाण्डवोंको राजाके यहाँ रहनेका ढंग बताना और सबका अपने-अपने अभीष्ट स्थानोंको जाना
 
अध्याय 5:  पाण्डवोंका विराटनगरके समीप पहुँचकर श्मशानमें एक शमीवृक्षपर अपने अस्त्र- शस्त्र रखना
 
अध्याय 6:  युधिष्ठिरद्वारा दुर्गादेवीकी स्तुति और देवीका प्रत्यक्ष प्रकट होकर उन्हें वर देना
 
अध्याय 7:  युधिष्ठिरका राजसभामें जाकर विराटसे मिलना और वहाँ आदरपूर्वक निवास पाना
 
अध्याय 8:  भीमसेनका राजा विराटकी सभामें प्रवेश और राजाके द्वारा आश्वासन पान
 
अध्याय 9:  द्रौपदीका सैरन्ध्रीके वेशमें विराटके रनिवासमें जाकर रानी सुदेष्णासे वार्तालाप करना और वहाँ निवास पाना
 
अध्याय 10:  सहदेवका राजा विराटके साथ वार्तालाप और गौओंकी देखभालके लिये उनकी नियुक्ति
 
अध्याय 11:  अर्जुनका राजा विराटसे मिलना और राजाके द्वारा कन्याओंको नृत्य आदिकी शिक्षा देनेके लिये उनको नियुक्त करना
 
अध्याय 12:  नकुलका विराटके अश्वोंकी देख-रेखमें नियुक्त होना
 
 
 
उपपर्व: समयपालन पर्व
अध्याय 13:  भीमसेनके द्वारा जीमूत नामक विश्वविख्यात मल्लका वध
 
 
 
उपपर्व: कीचकवध पर्व
अध्याय 14:  कीचकका द्रौपदीपर आसक्त हो उससे प्रणय-याचना करना और द्रौपदीका उसे फटकारना
 
अध्याय 15:  रानी सुदेष्णाका द्रौपदीको कीचकके घर भेजना
 
अध्याय 16:  कीचकद्वारा द्रौपदीका अपमान
 
अध्याय 17:  द्रौपदीका भीमसेनके समीप जाना
 
अध्याय 18:  द्रौपदीका भीमसेनके प्रति अपने दुःखके उद् गार प्रकट करना
 
अध्याय 19:  पाण्डवोंके दुःखसे दुःखित द्रौपदीका भीमसेनके सम्मुख विलाप
 
अध्याय 20:  द्रौपदीद्वारा भीमसेनसे अपना दुःख निवेदन करना
 
अध्याय 21:  भीमसेन और द्रौपदीका संवाद
 
अध्याय 22:  कीचक और भीमसेनका युद्ध तथा कीचक-वध
 
अध्याय 23:  उपकीचकोंका सैरन्ध्रीको बाँधकर श्मशान-भूमिमें ले जाना और भीमसेनका उन सबको मारकर सैरन्ध्रीको छुड़ाना
 
अध्याय 24:  द्रौपदीका राजमहलमें लौटकर आना और बृहन्नला एवं सुदेष्णासे उसकी बातचीत
 
 
 
उपपर्व: गोहरण पर्व
अध्याय 25:  दुर्योधनके पास उसके गुप्तचरोंका आना और उनका पाण्डवोंके विषयमें कुछ पता न लगा, यह बताकर कीचकवधका वृत्तान्त सुनाना
 
अध्याय 26:  दुर्योधनका सभासदोंसे पाण्डवोंका पता लगानेके लिये परामर्श तथा इस विषयमें कर्ण और दुःशासनकी सम्मति
 
अध्याय 27:  आचार्य द्रोणकी सम्मति
 
अध्याय 28:  युधिष्ठिरकी महिमा कहते हुए भीष्मकी पाण्डवोंके अन्वेषणके विषयमें सम्मति
 
अध्याय 29:  कृपाचार्यकी सम्मति और दुर्योधनका निश्चय
 
अध्याय 30:  सुशर्माके प्रस्तावके अनुसार त्रिगर्तों और कौरवोंका मत्स्यदेशपर धावा
 
अध्याय 31:  चारों पाण्डवोंसहित राजा विराटकी सेनाका युद्धके लिये प्रस्थान
 
अध्याय 32:  मत्स्य तथा त्रिगर्तदेशीय सेनाओंका परस्पर युद्ध
 
अध्याय 33:  सुशर्माका विराटको पकड़कर ले जाना, पाण्डवोंके प्रयत्नसे उनका छुटकारा, भीमद्वारा सुशर्माका निग्रह और युधिष्ठिरका अनुग्रह करके उसे छोड़ देना
 
अध्याय 34:  राजा विराटद्वारा पाण्डवोंका सम्मान, युधिष्ठिरद्वारा राजाका अभिनन्दन तथा विराटनगरमें राजाकी विजयघोषणा
 
अध्याय 35:  कौरवोंद्वारा उत्तर दिशाकी ओरसे आकर विराटकी गौओंका अपहरण और गोपाध्यक्षका उत्तरकुमारको युद्धके लिये उत्साह दिलाना
 
अध्याय 36:  उत्तरका अपने लिये सारथि ढूँढ़नेका प्रस्ताव, अर्जुनकी सम्मतिसे द्रौपदीका बृहन्नलाको सारथि बनानेके लिये सुझाव देना
 
अध्याय 37:  बृहन्नलाको सारथि बनाकर राजकुमार उत्तरका रणभूमिकी ओर प्रस्थान
 
अध्याय 38:  उत्तरकुमारका भय और अर्जुनका उसे आश्वासन देकर रथपर चढ़ाना
 
अध्याय 39:  द्रोणाचार्यद्वारा अर्जुनके अलौकिक पराक्रमकी प्रशंसा
 
अध्याय 40:  अर्जुनका उत्तरको शमीवृक्षसे अस्त्र उतारनेके लिये आदेश
 
अध्याय 41:  उत्तरका अर्जुनके आदेशके अनुसार शमीवृक्षसे पाण्डवोंके दिव्य धनुष आदि उतारना
 
अध्याय 42:  उत्तरका बृहन्नलासे पाण्डवोंके अस्त्र-शस्त्रोंके विषयमें प्रश्न करना
 
अध्याय 43:  बृहन्नलाद्वारा उत्तरको पाण्डवोंके आयुधोंका परिचय कराना
 
अध्याय 44:  अर्जुनका उत्तरकुमारसे अपना और अपने भाइयोंका यथार्थ परिचय देना
 
अध्याय 45:  अर्जुनद्वारा युद्धकी तैयारी, अस्त्र-शस्त्रोंका स्मरण, उनसे वार्तालाप तथा उत्तरके भयका निवारण
 
अध्याय 46:  उत्तरके रथपर अर्जुनको ध्वजकी प्राप्ति, अर्जुनका शंखनाद और द्रोणाचार्यका कौरवोंसे उत्पातसूचक अपशकुनोंका वर्णन
 
अध्याय 47:  दुर्योधनके द्वारा युद्धका निश्चय तथा कर्णकी उक्ति
 
अध्याय 48:  कर्णकी आत्मप्रशंसापूर्ण अहंकारोक्ति
 
अध्याय 49:  कृपाचार्यका कर्णको फटकारते हुए युद्धके विषयमें अपना विचार बताना
 
अध्याय 50:  अश्वत्थामाके उद् गार
 
अध्याय 51:  भीष्मजीके द्वारा सेनामें शान्ति और एकता बनाये रखनेकी चेष्टा तथा द्रोणाचार्यके द्वारा दुर्योधनकी रक्षाके लिये प्रयत्न
 
अध्याय 52:  पितामह भीष्मकी सम्मति
 
अध्याय 53:  अर्जुनका दुर्योधनकी सेनापर आक्रमण करके गौओंको लौटा लेना
 
अध्याय 54:  अर्जुनका कर्णपर आक्रमण, विकर्णकी पराजय, शत्रुंतप और संग्रामजित् का वध, कर्ण और अर्जुनका युद्ध तथा कर्णका पलायन
 
अध्याय 55:  अर्जुनद्वारा कौरवसेनाका संहार और उत्तरका उनके रथको कृपाचार्यके पास ले जाना
 
अध्याय 56:  अर्जुन और कृपाचार्यका युद्ध देखनेके लिये देवताओंका आकाशमें विमानोंपर आगमन
 
अध्याय 57:  कृपाचार्य और अर्जुनका युद्ध तथा कौरवपक्षके सैनिकोंद्वारा कृपाचार्यको हटा ले जाना
 
अध्याय 58:  अर्जुनका द्रोणाचार्यके साथ युद्ध और आचार्यका पलायन
 
अध्याय 59:  अश्वत्थामाके साथ अर्जुनका युद्ध
 
अध्याय 60:  अर्जुन और कर्णका संवाद तथा कर्णका अर्जुनसे हारकर भागना
 
अध्याय 61:  अर्जुनका उत्तरकुमारको आस्थासन तथा अर्जुनसे दुःशासन आदिकी पराजय
 
अध्याय 62:  अर्जुनका सब योद्धाओं और महारथियोंके साथ युद्ध
 
अध्याय 63:  अर्जुनपर समस्त कौरवपक्षीय महारथियोंका आक्रमण और सबका युद्धभूमिसे पीठ दिखाकर भागना
 
अध्याय 64:  अर्जुन और भीष्मका अद्भतु युद्ध तथा मूर्छि त भीष्मका सारथिद्वारा रणभूमिसे हटाया जाना
 
अध्याय 65:  अर्जुन और दुर्योधनका युद्ध, विकर्ण आदि योद्धाओं-सहित दुर्योधनका युद्धके मैदानसे भागना
 
अध्याय 66:  अर्जुनके द्वारा समस्त कौरवदलकी पराजय तथा कौरवोंका स्वदेशको प्रस्थान
 
अध्याय 67:  विजयी अर्जुन और उत्तरका राजधानीकी ओर प्रस्थान
 
अध्याय 68:  राजा विराटकी उत्तरके विषयमें चिन्ता, विजयी उत्तरका नगरमें प्रवेश, प्रजाओंद्वारा उनका स्वागत, विराटद्वारा युधिष्ठिरका तिरस्कार और क्षमा-प्रार्थना एवं उत्तरसे युद्धका समाचार पूछना
 
अध्याय 69:  राजा विराट और उत्तरकी विजयके विषयमें बातचीत
 
 
 
उपपर्व: वैवाहिक पर्व
अध्याय 70:  अर्जुनका राजा विराटको महाराज युधिष्ठिरका परिचय देना
 
अध्याय 71:  विराटको अन्य पाण्डवोंका भी परिचय प्राप्त होना तथा विराटके द्वारा युधिष्ठिरको राज्य समर्पण करके अर्जुनके साथ उत्तराके विवाहका प्रस्ताव करना
 
अध्याय 72:  अर्जुनका अपनी पुत्रवधूके रूपमें उत्तराको ग्रहण करना एवं अभिमन्यु और उत्तराका विवाह
 
 
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