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श्रील प्रभुपाद लीलमृत  »  अध्याय 22: ‟स्वामी हिप्पियों को आमंत्रित करते हैं”  » 
 
 
 
 
 
जनवरी १६, १९६७

जब यूनाइटेड एयरलाइंस का जेट विमान सैन फ्रान्सिसको के क्षेत्र में नीचे उतर रहा था, श्रील प्रभुपाद अपने शिष्य रणछोड़ की ओर मुड़े और बोले - " इमारतें दियासलाई की डिबियों जैसी दिख रही हैं। जरा सोचो कृष्ण के दृष्टिकोण से यह सब कैसा दिखेगा । "

श्रील प्रभुपाद इकहत्तर वर्ष के थे और यह उनकी पहली हवाई यात्रा थी । रणछोड़ जो उन्नीस वर्ष का था और सूट-टाई पहने था, श्रील प्रभुपाद का सचिव माना जाता था । वह नया शिष्य था, लेकिन उसने कुछ पैसे इकठ्ठे कर लिए थे और प्रभुपाद के साथ सैन फ्रान्सिसको जाने की प्रार्थना की थी ।

यात्रा के दौरान प्रभुपाद बहुत कम बोले थे । वे जप करते रहे थे : "हरे कृष्ण, हरे कृष्ण, कृष्ण कृष्ण, हरे हरे / हरे राम, हरे राम, राम राम, हरे हरे । उनका दाहिना हाथ माला की कपड़े की थैली में था और जब वे मौन जप में लीन थे, तब वे उंगलियों को माला के एक के बाद दूसरे मनके पर फिरा रहे थे। जब विमान न्यू यार्क शहर के ऊपर पहली बार उठा था तो उन्होंने खिड़की में से निरन्तर छोटी दिखती जा रही इमारतों को देखा था । तब विमान बादलों के बीच चला गया था जो प्रभुपाद को आकाश में समुद्र जैसे लगे थे । दबाव के कारण कानों के बंद हो जाने से उन्हें कुछ परेशानी हुई थी और उन्होंने इसकी चर्चा की थी, अन्यथा अधिकतर वे मौन थे। लेकिन वे बार-बार कृष्ण के नामों का जप करते रहे थे। अब, जबकि विमान नीचे उतर रहा था, वे जप करने में लगे रहे, कुछ-कुछ स्फुट आवाज में – “कृष्ण, कृष्ण, कृष्ण.. और खिड़की की राह उन्होंने दियासलाई की डिबियों जैसी हजारों इमारतों और चारों दिशाओं में योजनाबद्ध रूप में फैली सड़कों के जाल के दृश्य पर दृष्टिपात किया ।

जब यूनाइटेड एयरलाइंस जेट विमान की न्यू यार्क उड़ान नंबर २१ की घोषणा लाउड स्पीकर पर सुनाई पड़ी तो लगभग पचास हिप्पियों का दल पहले ही और निकट सिमट आया था। एक क्षण के लिए वे भयभीत से हुए, इस अनिश्चय - से कि आगन्तुक स्वामी से क्या अपेक्षा की जाय या वे कैसे होंगे ।

रोजर सेगल : सैन फ्रांन्सिसको हवाई अड्डे के लिए हमारे दल के लोग विविध प्रकार के लगते थे। मुकुन्द मर्लिन बाजीगर जैसा पहनावा पहने था जिस पर सर्वत्र वर्गाकार खाने बने थे; साम, मरक्को की भेड़ की खाल और उसी की टोपी धारण किए था— उससे भेड़ जैसी गंध भी आ रही थी— और मैं एक जापानी योद्धा की, घर में बनी हुई, नीली पोशाक में था जिस पर छोटी-छोटी सफेद बिन्दियाँ थीं । मनकों की लम्बी लड़ी वाली मालाएँ सर्वत्र दिखाई देती थीं। कहीं मृगछाला में लिपटे लोग थे, कहीं बूटों की चरमर थी, कहीं सेना के दण्डित जवान थे तो कहीं छोटे गोल धूप के चश्मे पहने लोग — सैन फ्रान्सिसको का पूरा मायाजाल अपनी सीमा पर पहुँचा दिखाई देता था ।

एकत्रित समूह में स्वामीजी को जानने वाले बहुत थोड़े लोग थे : मुकुन्द और उसकी पत्नी, जानकी, रवीन्द्र स्वरूप, राय राम- सभी न्यू यार्क के लोग । और एलेन गिन्सबर्ग भी वहाँ था । ( कुछ दिन पहले गोल्डेन गेट पार्क में जो समारोह हुआ था उसके नेताओं में से एक एलेन भी था। उस समारोह में दो हजार से भी अधिक लोग इकट्ठे हुए थे- आदिवासियों का एक समूह परस्पर विचार-विनिमय और शान्त नृत्य के लिए) आज स्वामी भक्तिवेदान्त का स्वागत करने के लिए एलेन मौजूद था, जिनसे वह कई महीने पहले न्यू यार्क के लोअर ईस्ट साइड में मिल चुका था और जिन के साथ कई बार कीर्तन कर चुका था ।

मुकुन्द ने हर एक को याद दिलाया कि जब स्वामीजी बाहर आ रहे होंगे और यदि उस समय सब हरे कृष्ण गाते रहेंगे, तो वे बहुत प्रसन्न होंगे । हरे कृष्ण मंत्र से सभी अवगत थे। न्यू यार्क के पार्क में स्वामीजी के हरे कृष्ण-गान के बारे में सभी सुन चुके थे, या वे स्थानीय भूमिगत पत्र ओरेकल में स्वामीजी और उनके मंत्र के विषय में लेख पढ़ चुके थे। उस दिन सवेरे मुकुंद द्वारा वितरित इश्तहार को पढ़ कर वे गोल्डेन गेट पार्क में इकट्ठे हुए थे और एक घंटे से अधिक हरे कृष्ण का कीर्तन करने के बाद मोटर गाड़ियों में बैठ कर हवाई अड्डे गए थे। अब उनमें से बहुते से – मुकुंद के इश्तहार का अनुसरण करते हुए — हाथ में फूल और सुगंधित पदार्थ लिए वहाँ खड़े थे ।

जब उतरने वाले यात्री हवाई अड्डे के सीमान्त द्वार में प्रवेश करके ढ़लान के ऊपर चढ़ने लगे, तो फूल-मालाएँ लिए हुए और कीर्तन करने वाले स्वागतकर्त्ताओं को देख कर वे आश्चर्य में पड़ गए। किन्तु कीर्तन करने वाले स्वागतकर्त्ताओं की दृष्टि थकान से लथपथ सामान्य यात्रियों पर नहीं थी । वे तो उस विमान से आने वाले एक विशेष व्यक्ति की खोज में थे। अचानक उन्होंने देखा कि स्वामीजी उनकी ओर बढ़ रहे हैं, चमकदार केसरिया वस्त्र पहने हुए गेहुएँ रंग के स्वामीजी ।

प्रभुपाद ने, सीमान्त द्वार में प्रवेश करने के पहले ही, हरे कृष्ण कीर्तन सुन लिया था और वे मुसकराने लगे थे। वे प्रसन्न और विस्मित थे। चेहरों पर दृष्टिपात करते हुए वे केवल कुछ को ही पहचान सके। इतने पर भी उनके स्वागत के लिए पचास लोग एकत्र थे और बिना उनके कुछ कहे हरे कृष्ण का कीर्तन कर रहे थे ।

मुकुन्द : हमने स्वामीजी पर दृष्टि डाली और हम नत मस्तक हो गए — स्वयं मेरी पत्नी और मेरे द्वारा लाए गए मित्र साम, मारजोरी आदि। और तब वहाँ के सभी लोगों ने, युवा पुरुष, स्त्रियाँ, जो वहाँ एकत्र थे, हमारा अनुसरण किया और सभी ने स्वामीजी को सिर झुकाया। सभी को विश्वास था कि उस समय वही करना ठीक और उचित था ।

हिप्पियों का झुंड उस संकरे मार्ग की दोनों ओर पंक्तिबद्ध खड़ा हो गया था जिससे स्वामीजी को निकलना था। जब वे उस मार्ग पर अपने नए प्रशंसकों के बीच से आगे बढ़ रहे थे उस समय दर्जनों हाथ उन्हें फूल और सुगंध अर्पण करने को फैले थे। उपहारों को दोनों हाथों में स्वीकार करते हुए वे मुसकरा रहे थे और रणछोड़ यह सब देख रहे थे। एलेन गिन्सबर्ग एक बड़ा गुलदस्ता लेकर आगे बढ़ा और श्रील प्रभुपाद ने उसे कृपापूर्वक स्वीकार किया । तब प्रभुपाद उपहारों को उन लोगों में बाँटने लगे जो उन्हें प्राप्त करने के लिए आगे बढ़े। वे सीमान्त द्वार से आगे बढ़ रहे थे और उनकी दोनों ओर युवक और युवतियों की भीड़ कीर्तन करती हुई चल रही थी ।

सामान लेने के काउंटर पर स्वामीजी एक क्षण रुके; उनकी दृष्टि चारों ओर खड़े लोगों का सर्वेक्षण कर रही थी। खुली हथेलियों को ऊपर उठाते हुए उन्होंने लोगों को उच्च स्वर में कीर्तन करने के लिए संकेत किया । एकत्रित समूह फिर से ऊँचे स्वर में कीर्तन करने लगा। प्रभुपाद उसके बीच में खड़े थे । वे हल्के-हल्के ताली बजा रहे थे और हरे कृष्ण का गान कर रहे थे। फिर उन्होंने । मनोहारी ढंग से अपनी बाहों को ऊपर उठाया और इस ओर से उस ओर झूमते हुए नाचने लगे ।

हवाई अड्डे के कार्यकर्त्ताओं और यात्रियों में से किसी को खीज हुई, किसी का मनोरंजन हुआ और किसी को अपार आनंद प्राप्त हुआ। प्रभुपाद का सामान मिलने तक स्वागत दल वहाँ रुका रहा। तब लोग उन्हें बाहर सूर्य के प्रकाश में ले गए और १९४९ माडल की एक कैडिलक फ्लीटवुड काली कार मैं बैठाया । मुकुंद और गिन्सबर्ग के साथ प्रभुपाद कार के पिछले भाग में बैठ गए। जब तक कि कार मोड़ से घूम नहीं गई प्रभुपाद, जो कृष्णभावनामृत को पश्चिम को देने के लिए आए थे और अभी तक मुस्करा रहे थे, उन सभी लोगों को पुष्पों का उपहार बाँटते रहे जो उनके स्वागत के लिए हवाई अड्डे आए थे ।

कैडिलक कार हार्वे कोहन की थी, जिसने, लगभग एक वर्ष पूर्व, प्रभुपाद को बोवरी की ऊपरी मंजिल ठहरने के लिए दी थी। हार्वे कार चला रहा था, लेकिन चूँकि वह शोफर (ड्राइवर) का हैट (जो उसने सालवेशन आर्मी के एक स्टोर से खरीद लिया था), और काला सूट पहने था और दाढ़ी रखे था, इसलिए प्रभुपाद ने उसे नहीं पहचाना।

" हार्वे कहाँ हैं ?” प्रभुपाद ने पूछा ।

" वे कार चला रहे हैं।” मुकुंद ने कहा ।

"ओह ! तुम्हीं हो, मैंने पहचाना नहीं । "

हार्वे मुस्कराया, "सैन फ्रांसिस्को में स्वागत है स्वामीजी । "

श्रील प्रभुपाद को प्रसन्नता थी कि वे अपने गुरु महाराज भक्तिसिद्धान्त सरस्वती और भगवान् चैतन्य की ओर से एक अन्य बड़े पाश्चात्य नगर में पहुँचे थे। भगवान् चैतन्य ने कहा था कि पश्चिम में जितना ही आगे बढ़ते जायँ लोग उतने ही अधिक भौतिकतावादी मिलेंगे। इतने पर भी, भगवान् चैतन्य का कहना था कि, कृष्णभावनामृत का प्रसार समस्त विश्व में होना चाहिए। प्रभुपाद के गुरुभाइयों को भगवान् चैतन्य के इस कथन पर प्रायः आश्चर्य होता था कि कृष्ण के नाम का गान हर कस्बे और गाँव में होगा। उन्होंने कहा, कदाचित् उनके कथन को एक प्रतीक के रूप में ग्रहण करना होगा; अन्यथा इसका क्या अर्थ हुआ कि — कृष्ण हर कस्बे में ? किन्तु श्रील प्रभुपाद को भगवान् चैतन्य की वाणी में और अपने गुरु महाराज के उपदेश में गहरा विश्वास था । वे सुदूर पश्चिम के सैन फ्रांसिस्को नगर में पहुँचे थे और लोगों ने पहले ही कीर्तन शुरू कर दिया था और उन्होंने कीर्तन के साथ, उनका स्वागत किया था । विश्व के अन्य नगर भी तो बहुत कुछ इसी जैसे थे ।

मुकुंद और उनके मित्रों ने जो मंदिर प्राप्त किया था वह हैट ऐशबरी डिस्ट्रिक्ट में फ्रेडरिक स्ट्रीट पर था। न्यू यार्क के २६ सेकंड एवन्यू के मंदिर की तरह यह मंदिर भी एक छोटे स्टोर के अगले हिस्से में था । उसमें एक प्रदर्शन खिड़की थी जिसके सामने सड़क थी। खिड़की के ऊपर संकेत अंकित था— श्री श्री राधाकृष्ण मंदिर । मुकुंद और उनके मित्रों ने पास की इमारत की तीसरी मंजिल पर स्वामीजी के लिए तीन कमरों का एक अपार्टमेण्ट किराए पर ले रखा था । यह एक छोटा-सा, बिना साज-सज्जा वाला, पुराना अपार्टमेण्ट था जिसके सामने सड़क थी ।

भक्तों और उत्सुक दर्शनार्थियों से भरी गाड़ियों से अनुगमित, श्रील प्रभुपाद ५१८ फ्रेडरिक स्ट्रीट में पहुँचे और स्टोरफ्रंट के मंदिर में प्रविष्ट हुए जिसकी दीवारें कुछ मद्रासी कपड़ों से सजाई गई थीं। एक गद्दी पर बैठ कर उन्होंने कीर्तन का नेतृत्व किया और तब हर एक को कृष्णभावनामृत को ग्रहण करने का आमंत्रण करते हुए प्रवचन दिया। प्रवचन के बाद वे स्टोरफ्रंट से निकले और निकट के दरवाजे से दो छतों तक सीढ़ियाँ चढ़ते हुए अपने अपार्टमेण्ट में पहुँच गए। जब वे अपने कमरा नंबर ३२ में पहुँचे तो उनके पीछे न केवल उनके अनुयायी और प्रशंसक थे वरन् सैन फ्रांसिस्को के प्रमुख समाचार-पत्रों दि क्रानिकिल और दि एक्जामिनार के संवाददाता भी थे। उनके अनुयायी उनका भोजन बनाने में लग गए जबकि रणछोड़ उनका सूटकेस खोल कर सामान रखने लगे। स्वामीजी संवाददाताओं से वार्ता करने लगे, जो फर्श पर बैठे अपने पैड पर नोट ले रहे थे।

संवाददाता : अभी नीचे आपने कहा है कि आप हर एक को कृष्णभावनामृत स्वीकार करने को आमंत्रित कर रहे हैं। क्या उस में हैट - ऐशबरी के जिप्सी और बीटनिक भी शामिल हैं ?

प्रभुपाद: हाँ, हर एक, जिसमें आप और अन्य हर कोई भी शामिल है। चाहे वह पुरुष या स्त्री उस कोटि का हो जिसे घोर नशेबाज (एल. एस. डी. का सेवनकर्त्ता ) कहा जाता हो, या वह हिप्पी हो या कुछ और हो । लेकिन एक बार जब वह प्रशिक्षण के लिए स्वीकार कर लिया जाता है तो वह पहले से बदल कर कुछ का कुछ हो जाता है ।

संवाददाता : आपके आंदोलन का सदस्य बनने के लिए क्या करना पड़ता है ?

प्रभुपाद: हमारे यहाँ चार पूर्वापेक्षाएँ हैं। मैं अपने शिक्षार्थियों को साथ में सहेलियाँ, या मित्र रूप में लड़कियाँ, नहीं रखने देता! मेरे यहाँ सभी प्रकार के मादक द्रव्य वर्जित हैं जिनमें काफी, चाय और सिगरेट सम्मिलित हैं। मैं मांसाहार का निषेध करता हूँ। और मैं अपने शिक्षार्थियों को जुआ खेलने से मना करता हूँ ।

संवाददाता : क्या निषिद्ध मादक द्रव्यों में एल. एस. डी., चरस - गाँजा और अन्य मादक द्रव्य भी सम्मिलित हैं ?

प्रभुपाद : मैं एल. एस. डी. को एक मादक द्रव्य मानता हूँ। मैं अपने शिक्षार्थियों को उसके या किसी भी अन्य मादक द्रव्य के सेवन की अनुमति नहीं देता । मैं अपने शिष्यों को प्रातः काल उठने की, यथाशीघ्र स्नान करने की और दिन में तीन बार प्रार्थना सभाओं में सम्मिलित होने का प्रशिक्षण देता हूँ। हमारा सम्प्रदाय संयम का सम्प्रदाय है । यह भगवद्-विज्ञान का सम्प्रदाय है ।

यद्यपि प्रभुपाद ने देखा कि संवाददाता उनके जीवन-दर्शन के बारे में प्राय: नहीं लिखते थे, तो भी कृष्णभावनामृत का प्रचार करने का अवसर वे नहीं चूकते थे। संवाददाता उनके दर्शन की गहराइयों में न भी पैठें तो भी उनके अनुयायी तो ऐसा करते ही थे । “आधुनिक सभ्यता की सबसे बड़ी भूल यह है, " प्रभुपाद ने कहना जारी रखा, “कि दूसरों की सम्पत्ति को इस प्रकार हथियाने की कोशिश की जाती है मानो वह अपनी ही हो। इससे अस्वाभाविक अशान्ति पैदा होती है। विश्व की हर वस्तु का एकमात्र स्वामी भगवान् है । जब लोगों को बोध हो जायगा कि भगवान् परम स्वामी हैं, वे ही हर जीवधारी के सबसे अच्छे मित्र और सभी आहुतियों और बलिदानों का अंतिम लक्ष्य हैं तो सर्वत्र शान्ति हो जायगी ।

संवाददाताओं ने उनका पूर्व इतिहास जानना चाहा और उन्होंने संक्षेप में बताया कि वे भारत से यहां पहुँचे थे और न्यू यार्क में अपना कार्य आरंभ कर चुके थे ।

संवाददाताओं के जाने के बाद, प्रभुपाद कमरे में उपस्थित नवयुवकों से बात करते रहे। मुकुंद ने जिसने सिर और दाढ़ी के बाल बढ़ा लिए थे, लेकिन जो गले में बड़े लाल मनकों वाली वह माला पहने हुए था जिसे दीक्षा के समय स्वामीजी ने उसे दिया था, अपने कुछ मित्रों का परिचय कराया और बताया कि वे सब एक साथ रह रहे थे और स्वामीजी की सहायता करना चाहते थे कि वे कृष्णभावनामृत को सैन फ्रान्सिसको के युवकों के सामने प्रस्तुत करें। मुकुंद की पत्नी जानकी ने स्वामीजी से उनकी हवाई यात्रा के बारे में पूछा। उन्होंने बताया कि यात्रा सुखद थी, सिवाय इसके कि कानों में उन्होंने कुछ दबाव अनुभव किया । " इमारतें दियासलाई की डिबियाँ मालूम होती थीं, ' उन्होंने कहा और अपने अँगूठे और उँगलियों से दियासलाई की डिबिया का आकार समझाया ।

वे दीवाल के सहारे बैठ गए और उन सभी मालाओं को उन्होंने गले में से निकाल दिया जो उस दिन उन्हें पहनाई गई थीं। अंत में उनके गले से केवल एक हार लटकता रह गया, जो साधारण सस्ते मनकों का बना था और जिसमें एक छोटी घंटी पिरोई थी । प्रभुपाद ने उसे हाथ में लिया, उसकी कारीगरी देखी और वे उस पर हाथ फेरने लगे। " यह एक विशेष हार है, ” उन्होंने सिर उठाते हुए कहा, “ क्योंकि इसका निर्माण भक्ति के साथ किया गया है । " वे हार को ध्यानपूर्वक देखते रहे, मानो उसको प्राप्त करना उनके लिए उस दिन की सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण घटना थी ।

जब उनका दोपहर का भोजन आया तो उन्होंने उसमें से थोड़ा-थोड़ा हर एक को दिया, और तब रणछोड़ ने तत्परतापूर्वक, यद्यपि कुछ बेढंगेपन के साथ, लोगों से वहां से चले जाने और स्वामीजी को भोजन तथा आराम करने देने को कहा ।

आवास के बाहर और नीचे स्टोरफ्रंट के इर्द-गिर्द बात केवल स्वामीजी के बारे में चल रही थी। किसी को भी उनसे निराशा नहीं हुई थी । मुकुंद उनके बारे में जो कुछ कहते रहे थे वह सब सच था । सब को स्वामीजी की यह बात बहुत अच्छी लगी थी कि हर वस्तु को कृष्णमय देखना चाहिए ।

स्वामीजी के सैन फ्रान्सिसको पहुँचने का समाचार उसी रात ११ बजे के टेलिविज़न समाचारों में प्रसारित किया गया और दूसरे दिन वह समाचार-पत्रों में प्रकाशित हुआ । दि एक्जामिनर ने उसे दूसरे पृष्ठ पर छापा – “हिप्पिओं को स्वामी का आमंत्रण" साथ में मंदिर का चित्र छपा जो अनुयायियों से भरा था। स्वामीजी के भी कुछ चित्र छपे जिनमें वे बहुत गंभीर दिखाई दे रहे थे । प्रभुपाद ने मुकुंद से समाचार ऊँची आवाज़ में पढ़वाया ।

" लम्बे और दुबले-पतले धर्म-गुरु,” मुकुंद ने पढ़ा, “जो घुटनों तक लम्बा और ढीला-ढाला कुर्ता पहने थे और एक विस्तृत चटाई पर पालथी मार कर बैठे थे – ”

स्वामीजी बीच में बोल उठे, "यह लैंकी शब्द क्या है ? "

मुकुंद ने बताया कि इस शब्द का मतलब लम्बा और दुबला-पतला है “मुझे मालूम नहीं कि उन्होंने ऐसा क्यों कहा” मुकुंद बोले, "हो सकता है कि चूँकि आप तन कर सीधे बैठते हैं, इसलिए उन्होंने समझा हो कि आप बहुत लम्बे हैं।” समाचार में वर्णन था कि हवाई अड्डे पर स्वागतकर्त्ताओं में बहुत-से " लम्बे बाल वाले, दाढ़ी रखे हुए और तिलक चंदन लगाए हुए लोग थे । "

सैन फ्रान्सिसको के सबसे बड़े पत्र दि क्रानिकिल ने भी एक लेख प्रकाशित किया, “हिप्पियों के देश में स्वामी - धर्मगुरु द्वारा एस.एफ. मंदिर का उद्घाटन ।' लेख का आरंभ इस प्रकार होता था, “भारत के एक धर्मिष्ठ पुरुष ने, जिसे उसके मित्र और बीट कवि एलेन गिंसबर्ग, उसके अपने धर्म के रूढ़िवादी नेताओं में से एक मानते हैं, सैन फ्रान्सिसको के हिप्पियों के गढ़ में कल एक सुसमाचार - उपक्रम का सूत्रपात किया । "

श्रील प्रभुपाद को रुढ़िवादी कहे जाने पर आपत्ति हुई। वे रुष्ट हुए, “कंजरवेटिव ? यह क्या है ?"

“ यौनाचार और मद - सेवन के मामलों में, ” – मुकुंद ने सुझाव दिया ।

" सचमुच, हम इन मामलों में रूढ़िवादी हैं, " प्रभुपाद ने कहा । " इसका तात्पर्य केवल यह है कि हम शास्त्रों का अनुगमन कर रहे हैं। हम भगवद्गीता से अलग नहीं हट सकते। लेकिन हम रूढ़िवादी नहीं हैं। चैतन्य महाप्रभु इतने दृढ़ थे कि वे किसी स्त्री पर दृष्टिपात भी नहीं कर सकते थे। लेकिन हम अपने आन्दोलन में सभी को स्वीकार कर रहे हैं, चाहे वह पुरुष हो या स्त्री, और चाहे वह जिस जाति का हो और उसका पद जैसा भी हो। हर एक आमंत्रित है कि वह आए और हरे कृष्ण का कीर्तन करे। यह महाप्रभु चैतन्य की वदान्यता है, उनकी उदारता है। नहीं, हम रूढ़िवादी नहीं हैं।'

***

श्रील प्रभुपाद बिस्तर से उठे और उन्होंने बत्ती जला दी। रात का एक बजा था। यद्यपि अलार्म नहीं बजा था और उन्हें जगाने कोई नहीं आया था, तो भी वे अपने आप उठ गए थे। कमरा ठंडा और शान्त था। अपनी चादर कंधो पर लपेटते हुए वे पाण्डुलिपियों से भरे बक्स को कामचलाऊ डेस्क बना कर उसके सामने बैठ गए और पूर्णतः ध्यानस्थ हो कर माला फेरते हुए हरे कृष्ण मंत्र जपने लगे ।

एक घंटे तक जप करने के बाद श्रील प्रभुपाद लिखने में लग गए । यद्यपि दो वर्ष बीत गए थे जब उन्होंने श्रीमद्भागवत के प्रथम स्कंध का तीसरा और अंतिम खण्ड प्रकाशित किया था, वे हर दिन कार्य करते रहते थे। कभी दूसरे स्कंध के अनुवाद और व्याख्या पर किन्तु अधिकतर भगवद्गीता पर । उन्नीस सौ, के चौथे दशक में उन्होंने पूरी भगवद्गीता का अनुवाद और टीका तैयार की थी, लेकिन उसकी एक ही प्रति थी और वह रहस्यमय ढंग से गायब हो गई थी । तब १९६५ ई. में, अमेरिका में कुछ महीने बिताने के बाद, उन्होंने फिर आरंभ किया, गीता की प्रस्तावना के साथ जो उन्होंने न्यू यार्क के ७२ वीं स्ट्रीट में अपने कमरे में रहते हुए लिखी । अब वह भगवद्गीता पूरी हो गई थी और पाण्डुलिपि के हजारों पृष्ठों से उनका बक्स भरा था । यदि उनके न्यू यार्क के शिष्य हयग्रीव, जो पहले अंग्रेजी के प्रोफेसर थे, उसका सम्पादन कर सकते और कुछ अन्य शिष्य उसे प्रकाशित करा सकते, तो यह एक बहुत बड़ी उपलब्धि होती ।

लेकिन अमेरिका में पुस्तकें प्रकाशित करना एक कठिन काम था — भारत से अधिक कठिन काम । यद्यपि भारत में वे अकेले थे, तो भी तीन वर्ष में वे तीन खंड प्रकाशित कराने में सफल हुए थे । यहाँ, अमेरिका में, उनके बहुत से अनुयायी थे, लेकिन बहुत से अनुयायियों का अर्थ था अधिक जिम्मेदारियाँ । और अभी तक अनुयायियों में से किसी की गंभीर रुझान टाइप, सम्पादन और अमेरिका के व्यवसायियों से सम्पर्क करने की ओर नहीं मालूम हो रही थी । तो भी, भगवद्गीता के प्रकाशन की आशा बहुत धुँधली होने पर भी, श्रील प्रभुपाद ने एक दूसरे ग्रंथ चैतन्य चरितामृत का अनुवाद आरंभ कर दिया था, जो भगवान् चैतन्य के जीवन और उपदेशों पर प्रमुख वैष्णव धर्म - ग्रंथ है।

पढ़ने का चश्मा लगाते हुए प्रभुपाद ने अपनी पुस्तकें खोली और टेप रेकर्डर को चालू कर दिया । बंगला और संस्कृत पुस्तकों से उन्होंने मूल पाठ का अध्ययन किया और टेप रेकर्डर के माइक्रोफोन को उठाया, रिकार्ड करने का बटन दबाया, छोटी लाल बत्ती जली और उन्होंने बोलना शुरू कर दिया " जब भगवान् चैतन्य 'हरे कृष्ण' गाते और नाचते हुए आगे बढ़ रहे थे... तब उनके पीछे सहस्रों लोग चल रहे थे । ( प्रभुपाद एक बार में केवल एक वाक्यांश बोलते थे, टेप रेकर्डर बंद कर देते थे, रुकते थे और फिर बोलने लगते थे )... उनके अनुगामियों में कुछ हँस रहे थे, कुछ नाच रहे थे... और कुछ गा रहे थे... कुछ धरती पर लेट कर उनके प्रति श्रद्धा प्रकट कर रहे थे।" इस प्रकार बोलते और रुकते हुए, कभी टेप रेकर्डर चलाते और कभी बंद करते हुए, प्रभुपाद सीधे तन कर बैठे रहे । शब्दों की अभिव्यक्ति में तेजी लाने के लिए कभी वे झूमने लगते और कभी सिर हिलाने लगते। या कभी वे अपनी पुस्तकों पर नीचे झुक कर चश्मे के द्वारा ध्यानपूर्वक उनका अध्ययन करने लगते ।

एक घंटा बीत गया और प्रभुपाद कार्य में लगे रहे। इमारत में अँधेरा था, सिवाय प्रभुपाद के लैंप के चारों ओर शान्ति थी, सिवाय प्रभुपाद की आवाज़ और टेप रेकर्डर के चलने और बंद होने की ध्वनि के । अपनी भूरी ऊनी चादर के नीचे उन्होंने एक पुरानी पीले रंग की बंद गले वाली जर्सी पहन रखी थी । चूँकि वे बिस्तर से अभी उठे थे, इसलिए उनकी केसरिया रंग की धोती में सिकुड़ने पड़ी थीं। बिना मुँह धोए या शौचादि से निवृत्त हुए, वे अपने कार्य में डूबे बैठे थे। ये ही कुछ विरल घंटे ऐसे थे जब कम-से-कम उनकी सड़क और राधाकृष्ण मंदिर में शान्ति होती थी ।

रात का अंधकार, शान्त परिसर और दिव्य साहित्य - सर्जन में लगे हुए स्वामी प्रभुपाद — यह परिस्थिति उससे कुछ अधिक भिन्न नहीं थी जब भारत में वृंदावन के राधा - दामोदर मंदिर में सवेरे के पहर वे बैठे होते थे। यह जरूर था कि वहाँ टेप रेकर्डर नहीं था लेकिन वहाँ भी वे उसी समय में और उसी ग्रंथ चैतन्य चरितामृत पर कार्य कर रहे थे। एक बार उन्होंने टीका के साथ श्लोक - दर - श्लोक अनुवाद आरंभ किया था और दूसरी बार उन्होंने ग्रंथ पर लेख लिखे थे। अब भगवान् चैतन्य की लीलाओं की भूमि भारत से इतनी दूर, संसार के इस कोने में पहुँच कर, वे चैतन्य चरितामृत के एक नए अँग्रजी संस्करण का पहला अध्याय आरंभ कर रहे थे। उन्होंने इसका नाम ' टीचिंग्स आफ लार्ड चैतन्य' ( भगवान चैतन्य की शिक्षाएँ) रखा ।

वे ऐसी दिनचर्या का अनुगमन कर रहे थे जो उनके जीवन में बहुत महत्त्वपूर्ण हो गई थी : बहुत सवेरे उठ जाना और कृष्णभावनामृत का पारम्परिक संदेश लिखना । अन्य सभी विचारों को छोड़ कर, वर्तमान परिस्थितियों की चिन्ता न करते हुए वे अपने को दिव्य ज्ञान के अनन्त संदेश में निमग्न कर देते थे । यह भक्तिसिद्धान्त सरस्वती की उनकी सबसे महत्त्वपूर्ण सेवा थी। अधिक से अधिक पुस्तकें तैयार करके उनका वितरण करना, एक ऐसा विचार था जो उन्हें हर रात उठ कर अनुवाद करने को प्रेरित करता था ।

प्रभुपाद प्रभात होने तक काम करते रहते थे। तब वे रुक जाते और प्रात: कालीन सभा के लिए नीचे मन्दिर में जाने के लिए तैयारी में लग जाते थे ।

***

यद्यपि उनके न्यू यार्क के कुछ शिष्यों ने आपत्ति की थी, फिर भी श्रील प्रभुपाद अवलोन बालरूम में होने वाले मंत्र - राक डांस में जाने को तैयार थे। उनके शिष्यों का कहना था कि सैन फ्रांसिस्को के अनुयायियों के लिए यह उचित नहीं होगा कि उनके गुरु महाराज ऐसे स्थान में जायँ । वह स्थान गिटारों के शोर-गुल, नगाड़ों की तुमुल ध्वनि, तीव्र आलोक-प्रदर्शनों और नशे में धुत सैंकड़ों हिप्पियों से भरा होगा। ऐसे स्थान में उनके दिव्य संदेश को भला कौन सुनेगा ?

किन्तु सैन फ्रांसिस्को में मुकुन्द और अन्य शिष्य महीनों से मंत्र - राक नृत्य की तैयारी में लगे थे। उससे आकृष्ट होकर हजारों युवा जब वहाँ एकत्र होंगे उससे सैन फ्रांसिस्को के राधाकृष्ण मंदिर को हजारों डालर की आय होगी। इसलिए, यद्यपि श्रील प्रभुपाद ने अपने न्यू यार्क के शिष्यों के बीच अनिश्चय व्यक्त किया था किन्तु सैन फ्रांसिस्को के अपने अनुयायियों का उत्साह कम करने के लिए उन्होंने कुछ नहीं कहा।

साम स्पीरस्ट्रा ने जो मुकुंद का मित्र और मंत्र - राक नृत्य का एक संयोजक था, हयग्रीव से, जो न्यू यार्क से अभी पहुँचा था, इस प्रस्ताव को स्पष्ट करते हुए कहा, "सैन फ्रांसिस्को में संगीत का एक बिल्कुल नया स्कूल उभर रहा है। ग्रेटफुल डेड अपना पहला रेकर्ड तैयार कर चुका है। नृत्य के लिए उनकी तत्परता हमारे लिए महान् प्रचार का स्त्रोत बनेगी, जिसकी इस समय हमें बड़ी जरूरत है।'

" लेकिन स्वामीजी कहते हैं कि रविशंकर भी माया है, " हयग्रीव ने कहा ।

'ओह ! सब की व्यवस्था हो चुकी है,” साम ने हयग्रीव को विश्वास दिलाया,

" सभी मंडलियाँ रंगमंच पर आएँगी और एलेन गिंसबर्ग सैन फ्रांसिस्कों के निवासियों से स्वामीजी का परिचय कराएँगे। स्वामीजी बोलेंगे और हरे कृष्ण का कीर्तन करेंगे, सभी मंडलियाँ उनकी संगत करेंगी। उसके बाद स्वामीजी चले जायँगे । अनुमान है कि कार्यक्रम में लगभग चार हजार लोग होने चाहिए ।'

श्रील प्रभुपाद जानते थे कि उन्हें अपने सिद्धान्तों का हनन नहीं करना था; उन्हें वहाँ जाना, कीर्तन करना और तत्पश्चात् उस स्थान को छोड़कर चले जाना था । उनके लिए महत्त्वपूर्ण कार्य हरे कृष्ण कीर्तन का प्रचार करना था । यदि राक - संगीत को सुनने के लिए एकत्र हजारों युवा - जनों को भगवान् के नाम के कीर्तन को सुनने और करने में लगाया जा सके तो इसमें हानि क्या है ? प्रभुपाद प्रचारक के रूप में, कृष्णभावनामृत के प्रसार के लिए, कहीं भी जाने को तैयार थे। चूँकि हरे कृष्ण का कीर्तन परम पूर्ण था, इसलिए कोई भी वह चाहे जहाँ का हो और जिस भी अवस्था में हो—–यदि वह कृष्ण का नाम श्रवण या कीर्तन करता था तो अगले जन्म में उसे निम्न योनि में उत्पन्न होने से बचाया जा सकता था। इन हिप्पियों को किसी आध्यात्मिक वस्तु की तलाश थी किन्तु उन्हें मार्ग दर्शन नहीं मिल रहा था। वे दिग्भ्रमित थे और मायामोह को आध्यात्मिक अन्तर्दृष्टि समझ रहे थे । परन्तु उन्हें वास्तविक आध्यात्मिक जीवन की तलाश थी, लोअर ईस्ट साइड के बहुत से युवा - जनों की भाँति । प्रभुपाद ने जाने का निश्चय किया, उनके शिष्य चाहते थे कि वे जायँ और वे उन शिष्यों और भगवान् चैतन्य के सेवक थे।

मुकुन्द, साम और हार्वे कोहेन रॉक के एक ठेकेदार चेट हेल्म्स से पहले ही मिल चुके थे, जो राजी हो चुका था कि वे उसके अवलान बालरूम को काम में ला सकते थे और यदि वे संगीत - मंडलियों को आने के लिए तैयार कर सकें तो उन मंडलियों, सुरक्षा-व्यवस्था तथा अन्य जरूरी बातों पर जो व्यय होगा उसे काटकर जो भी आमदनी होगी वह सैन फ्रांसिस्को के राधा-कृष्ण मंदिर की होगी। उसके बाद मुकुंद और साम संगीत - मंडलियों से मिले थे जिनमें से अधिकतर 'बे' क्षेत्र में रहती थीं और सैन फ्रांसिस्को की सभी नई राक - मंडलियाँ — ग्रेटफुल डेड, माबी ग्रेप, बिग ब्रदर एंड द होल्डिंग कंपनी, जेफर्सन एयर प्लेन, क्विकसिल्वर मेसेंजर सर्विस — एक के बाद एक स्वामी भक्तिवेदान्त के साथ कार्यक्रम में सम्मिलित होने को राजी हो गई। हर मंडली अपना सब से कम पारिश्रमिक २५० डालर स्वीकार करने को तैयार हो गई। और एलेन गिंसबर्ग भी राजी था। तैयारी हर तरह से पूरी थी ।

सैन फ्रांसिस्को की हर राक - मंडली का अपना एक कलात्मक पोस्टर था । इनमें से अधिकतर पोस्टर, माउस नामक मनोविज्ञान - विद् कलाकार द्वारा निर्मित थे । माउस के पोस्टरों की एक विशेषता यह थी कि यह बताना कठिन था कि पोस्टर में कहाँ लिखावट खत्म होती है और कहाँ पृष्ठभूमि शुरू होती है। वह अनमेल रंगों का प्रयोग करता था जिससे उसके पोस्टरों में रह-रह कर चमक पैदा होती थी। इस परम्परा का अनुसरण करते हुए हार्वे कोहेन ने एक अनुपम पोस्टर का निर्माण किया था—- कृष्णभावनामृत पश्चिम में पहुँचा । उस पोस्टर में उसने लाल और नीले रंग के समवृत्तों का इस्तेमाल किया था और टामकिंस स्कवायर पार्क में निर्भय, मुसकराते हुए स्वामीजी का चित्र दिखाया था। भक्तों ने सारे नगर में पोस्टर लगा दिए थे।

हयग्रीव और मुकुंद मंत्र - राक डांस के कार्यक्रम के बारे में बात करने के लिए एलेन गिंसबर्ग के पास गए। हरे कृष्ण मंत्र के समर्थक के रूप में एलेन की ख्याति चारों ओर पहले ही फैल चुकी थी । सचमुच, जब वह हैट स्ट्रीट में चलता था तो उसके परिचित 'हरे कृष्ण' कह कर उसका अभिवादन करने लगे थे। सब जानते थे कि वह राधा-कृष्ण मंदिर जाता था और दूसरों से वहाँ जाने के लिए कहता था । हयग्रीव को, जिसकी पूर्ण दाढ़ी और सिर के बाल एलेन के समान ही लम्बे थे, इस बात की चिंता थी कि जब वह स्वामीजी के साथ संकीर्तन करेगा तो किस लय में करेगा । उसने एलेन से कहा, "मेरा विचार हैं कि जिस लय का प्रयोग आप करते हैं वह अच्छे कीर्तन के लिए बहुत कठिन है । " " हो सकता है,” एलेन ने स्वीकार किया, “किन्तु यह वही राग है जिसे सर्वप्रथम मैने भारत में सुना था । एक अद्भुत साध्वी इसी राग में गा रही थी। मुझे इस राग का पूरा अभ्यास हो गया है और मैं पूरे विश्वास के साथ केवल इसी राग में गा सकता हूँ। मंत्र - राक डांस के कार्यक्रम को केवल कुछ दिन शेष रह गए तो एलेन एक दिन प्रातः कालीन कीर्तन के लिए मंदिर गया और बाद में श्रील प्रभुपाद के पास उनके ऊपर वाले कमरे में गया । जब एलेन द्वार पर पहुँचा तो प्रभुपाद के कुछ भक्त उनके पास बैठे भारतीय मिठाइयाँ खा रहे थे। वह और प्रभुपाद दोनों मुस्कराए और उन्होंने एक दूसरे को नमस्कार किया । प्रभुपाद ने उसे एक मिठाई दी और कहा कि तुम आज बहुत सवेरे उठ गए हो ।

“हाँ,” एलेन ने उत्तरं दिया, "जब से मैं सैन फ्रांसिस्को में आया हूँ फोन की घंटी बराबर बजती रहती है।

" किसी के ख्याति - लब्ध होने पर यही होता है,” प्रभुपाद ने कहा । महात्मा गाँधी के जीवन का भी यही दुखद पक्ष था। वे जहाँ भी जाते थे हजारों लोग 'महात्मा गाँधी की जय' 'महात्मा गांधी की जय' के नारे लगाते हुए उन्हें घेर लेते थे। वह भला आदमी सो भी नहीं सकता था । "

“ठीक है, कम-से-कम इसने मुझे आज सवेरे कीर्तन के लिए जगा दिया है ।" एलेन ने कहा ।

"हाँ, यह अच्छा है । "

फिर वार्तालाप अवलान बालरूम में होने वाले कार्यक्रम पर होने लगा । " क्या आप के विचार से इस बात की संभावना नहीं है कि ऐसे किसी राग में कीर्तन किया जाय जो पाश्चात्य श्रोताओं के लिए अधिक आकर्षक हो ?” एलेन ने पूछा ।

"कोई भी राग चल सकता है।” प्रभुपाद ने कहा, “ राग का उतना महत्त्व नहीं है। महत्त्वपूर्ण है हरे कृष्ण का कीर्तन । यह तुम्हारे देश के ही राग में हो सकता है। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता । "

प्रभुपाद और एलेन ने 'हिप्पी' शब्द के अर्थ के बारे में भी चर्चा की, और एलेन ने एल. एस. डी. के सेवन के बारे में कुछ कहा । प्रभुपाद ने उत्तर दिया कि एल. एस. डी. हमें गुलाम बनाता है और कृष्णभावनामृत में डूबे व्यक्ति के लिए यह आवश्यक नहीं है। " कृष्णभावनामृत में हर बात का समाधान है,” प्रभुपाद ने कहा, “उसके अतिरिक्त किसी वस्तु की आवश्यकता नहीं है । "

मंत्र-राक डांस उत्सव में इस कला में सबसे बड़े हस्ताक्षरकर्ताओं द्वारा बहु-आयामी आलोक-प्रदर्शन होने वाला था जैसे बेन वान मीटर और रोजर हिल यार्ड । एल. एस. डी. के नशे में जो दृश्य दिखाई देते हैं, बेन और रोजर को ऐसी सिद्धि प्राप्त थी कि वे प्रकाश के लट्टुओं, चित्र-पटों और स्लाइड्स के एक साथ प्रयोग से प्रेक्षागृह को वैसे ही आलोक दृश्यों से भर देते थे। मुकुंद ने कीर्तन के समय प्रयोग के लिए उन्हें कृष्ण के ऐसे बहुत से स्लाइड्स दिए थे। एक दिन सांयकाल, बेन और रोजर स्वामीजी से मिलने के लिए उनके कक्ष में आए ।

रोजर हिलयार्ड : वे महान् थे। मैं उनसे सचमुच प्रभावित हुआ। उनके रूप-रंग, उनके कार्य करने का ढंग या उनकी वेश-भूषा में कोई विशेषता हो, यह बात नहीं थी, वरन् उनका पूरा व्यक्तित्व प्रभावशाली था । स्वामीजी बहुत गंभीर और बहुत विनोदी थे, साथ ही, स्पष्ट था कि वे बहुत बुद्धिमान, संयत और ज्ञानी थे। वे विभिन्न प्रकार के लोगों से व्यवहार करने में सक्षम थे। मैं सोच रहा था, “इस व्यक्ति के लिए सचमुच यह बड़ी अजीब बात है – इसका संयुक्त राज्य में आना और हेट एशबरी के मध्य में एक स्टोरफ्रंट में आश्रम स्थापित करना और तरह-तरह के विचित्र लोगों के जमघट के मध्य अपने को घिरा पाना ।” और फिर भी वे पूर्णत: समंजित थे, हर व्यक्ति के साथ समंजित ।

मंत्र - राक डांस के उत्सव की रात में जबकि रंगमंच के कार्यकर्त्ता उपकरणों को लगा रहे थे और ध्वनि - विस्तारक व्यवस्था की परीक्षा कर रहे थे उस समय बेन और रोजर ऊपर के कक्ष में आलोक - प्रदर्शन की व्यवस्था कर रहे थे और मुकुंद और उनके अन्य साथी द्वार पर प्रवेश टिकट इकठ्ठा कर रहे थे। दर्शकों की भीड़ प्रेक्षागृह के आसपास सड़क में पंक्तिबद्ध खड़ी थी— ढाई डालर की टिकट प्राप्त करने की प्रतीक्षा में भीड़ बहुत थी, प्रेक्षागृह को भर देने के लिए। सभी विशिष्ट स्थानीय व्यक्ति आने वाले थे। एल. एस. डी. का प्रचारक टिमोथी लियरी आया और उसे रंगमंच के ऊपर विशेष स्थान दिया गया। स्वामी क्रियानंद एक तम्बूरा लेकर पहुँचे। एक व्यक्ति, जो टॉप हैट लगाए था और जिसके सूट पर बडे अक्षरों में सैन फ्रान्सिस्को अंकित एक रेशमी पट्टी लगी थी, यह दावा करता हुआ पहुँचा कि मैं मेयर हूँ। द्वार पर मुकुंद ने प्रतिष्ठित वेशभूषा वाले एक व्यक्ति को रोक दिया, क्योंकि उसके पास टिकट नहीं था। लेकिन तभी किसी व्यक्ति ने मुकुंद के कंधे पर थपकी दी: “उसे अंदर जाने दो । सब ठीक है । वह ओसले है ।” मुकुंद ने क्षमा मांगी और उसने आगस्टस ओसले स्टेनली द्वितीय को, जो जन नेता और एल. एस. डी. का प्रसिद्ध संयोजक था, बिना टिकट अंदर जाने दिया ।

लगभग हर एक जो वहाँ आया था, चमकीली और असामान्य वेशभूषा धारण किए था : कोई आदिम जातीय वेश-भूषा में था, कोई मैक्सिको का पहनावा धारण किए था, कोई भारतीय कुर्ता पहने था, कोई मोर पंख लगाए था और किसी के गले में माला थी। कुछ हिप्पी अपनी निजी बाँसुरी, वीणा, तूमड़ी, ढोल, झुनझुना, शृंगी और गिटार लाए थे। हेल्स एंजिल्स के कलाकार, जो गंदे बालों वाले थे, जीन्स, बूट और डैनिम जैकेट पहने थे, स्त्रियों के साथ प्रविष्ट हुए। अपनी मोटर साइकिलों के अतिरिक्त जिन्हें वे बाहर छोड़ आए थे, शेष सब कुछ, अपनी जंजीरें, सिगरेट, अपने वास्तविक चिह्न स्वरूप जर्मन टोप, अपने अलंकृत प्रतीक, आदि साथ लाए थे।

भक्तों ने रंगमंच पर, स्वामीजी द्वारा सिखाए गए नृत्य के साथ, प्रोत्साहन स्वरूप कीर्तन आरंभ किया। प्रेक्षागृह के कोनों और रंगमंच से धूप की सुगंध की लहरें उठने लगीं। यद्यपि दर्शकों में से अधिकतर नशें में धुत थे, पर वातावरण शान्त था; वहाँ सभी एक आध्यात्मिक अनुभव की खोज में आए थे। जब संगीतमय मधुर कीर्तन आरंभ हुआ तो कुछ संगीतज्ञ अपने वाद्य यंत्रों को बजाते हुए उसमें शामिल हो गए। आलोक-प्रदर्शन आरंभ हुआ : प्रकाश के लट्टू कौंधने लगे, संगीत-ध्वनि के साथ रंग-बिरंगे गेंद आगे-पीछे उछलने लगे; फर्श, छत और दीवालें रंगीले प्रकाश की गोलिकाओं से भर गईं।

आठ बजे के कुछ बाद मोबी ग्रेप रंगमंच पर आया । भारी विद्युत गिटारों, विद्युत संगीत और दो ढोलकियों के साथ उन्होंने अपना पहला प्रदर्शन आरंभ किया। बड़े-बड़े ध्वनि वर्धकों ने प्रेक्षागृह को अपनी लहरों से प्रकम्पित कर दिया और दर्शकों से प्रशंसा के तुमुल स्वर उठने लगे ।

लगभग साढ़े नौ बजे प्रभुपाद अपने फ्रेडरिक स्ट्रीट के कमरे से बाहर निकले और हार्वे की कैडिलक गाड़ी में पिछली सीट पर बैठ गए। वे हर दिन की तरह अपने गेरुए वस्त्र पहने थे और उनके गले में गार्डीनिया पुष्पों की माला पड़ी थी जिसकी मधुर सुगंध से मोटर कार भर रही थी । अवलान के मार्ग पर आगे बढ़ते हुए वे और अधिक केन्द्रों की स्थापना की आवश्यकता के बारे में बात करते रहे।

दस बजे प्रभुपाद, कीर्तनानंद और रणछोड़ के साथ, अवलान की सीढ़ियों से ऊपर चढ़े। जब वे प्रेक्षागृह में प्रविष्ट हुए तब भक्तों ने शंखनाद किया, किसी ने मृदंग बजाया और दर्शक मंडली ने बीच से मार्ग छोड़ दिया । इस तरह प्रवेश द्वार से रंगमंच तक प्रभुपाद के जाने के लिए मार्ग बन गया। सिर ऊँचा किए हुए प्रभुपाद जब उस विचित्र वातावरण में प्रेक्षागृह के फर्श पर से रंगमंच की ओर जा रहे थे तो ऐसा लग रहा था मानो वे प्रवाहित होते जा रहे हों।

अचानक आलोक-प्रदर्शन में बदलाव आ गया। कृष्ण और उनकी लीलाओं के चित्र दीवारों पर कौंधने लगे : किसी चित्र में कृष्ण अर्जुन के साथ उनके रथ पर सवार थे; किसी में कृष्ण मक्खन खा रहे थे; किसी में कृष्ण चक्रवात राक्षस का दमन कर रहे थे; किसी में कृष्ण बाँसुरी बजा रहे थे। जब प्रभुपाद दर्शकों के बीच से जा रहे थे तो हर दर्शक खड़ा हो गया था और तालियाँ बजाकर उनका अभिवादन कर रहा था। वे रंगमंच के ऊपर पहुँचे और एक खाली आसन पर धीरे से बैठ गए। जन-समूह शान्त हो गया ।

एलेन गिन्सबर्ग की ओर देखते हुए स्वामीजी ने कहा, “मंत्र के विषय मे तुम कुछ बोल सकते हो। "

एलेन ने हरे कृष्ण मंत्र के सम्बन्ध में अपनी जानकारी और अनुभव के बारे में बताना आरंभ किया। उसने बताया कि किस प्रकार स्वामीजी ने सेकंड एवन्यू में एक स्टोरफ्रंट के सामने वाले भाग में मंदिर स्थापित किया था और टाम्पकिंस स्केअर पार्क में हरे कृष्ण का कीर्तन किया था और हर एक को टामकिंस फ्रेडरिक स्ट्रीट मंदिर में आमंत्रित किया था । “मैं विशेष रूप से उन लोगों को प्रातः कालीन कीर्तन का परामर्श देता हूँ ।' उसने कहा, "जो एल. एस. डी. के सेवन से छुटकारा पाकर अपनी चेतना को आध्यात्मिकता पर केन्द्रित करना चाहते हैं । "

प्रभुपाद ने संक्षेप में मंत्र का इतिहास बताया। तब उन्होंने एलेन की ओर पुनः देखा और कहा, “तुम कीर्तन कर सकते हो।"

एलन हारमोनियम बजाते हुए माइक्रोफोन के सामने कीर्तन करने लगा । उसने कीर्तन में भारत से सीखी हुई लय का प्रयोग किया। दर्शकों में से एक-एक करके अधिकाधिक लोग उसका साथ देने लगे। कीर्तन चलता रहा और जन-समूह उसमें अधिकाधिक उत्साह दिखाने लगा। तब विभिन्न मंडलियों के संगीत कलाकार रंगमंच पर आ गए और कीर्तन में शामिल हो गए। रणछोड़ जो अच्छा ढोलक-वादक था, माबी ग्रेप के ढोलक बजाने लगा । अन्य संगीतज्ञ और गिटारवादक भक्तों का साथ देने लगे ज्योंहि हिप्पियों का एक बड़ा दल रंगमंच के ऊपर आ गया। रंगबिरंगी तेल की बत्तियाँ लहराने लगीं और दीवालों पर प्रक्षिप्त हरे कृष्ण, हरे कृष्ण, कृष्ण कृष्ण हरे हरे / हरे राम, हरे राम, राम राम, हरे हरे मंत्र की लय के साथ प्रकाश-कदुंक इधर से उधर उछलने लगे। जैसे-जैसे कीर्तन की ध्वनि हाल में फैलने लगी, कुछ हिप्पी खड़े हो गए और एक दूसरे के हाथ पकड़ कर नृत्य करने लगे ।

एलेन गिंसबर्ग : हम पूरी संध्या हरे कृष्ण गाते रहे। वह निर्विवाद रूप से एक महान् अनुभव था — बिल्कुल उन्मुक्त अनुभव। वह हैट ऐशबरी के आध्यात्मिक उत्साह का चरमबिन्दु था। सैन फ्रांसिस्को के लिए यह पहला अवसर था जब वहाँ ऐसा संगीतोत्सव हुआ था जिसमें हर व्यक्ति सम्मिलित हुआ था और उसमें तन्मय हो गया था। हर व्यक्ति, दूसरों को गाते और नाचते हुए देखने की अपेक्षा स्वयं गा रहा था और नाच रहा था ।

जानकी : लोग नहीं जानते थे कि वे किस लिए गा रहे हैं। लेकिन बहुत-से लोगों को गाते देख कर — यद्यपि उनमें से अधिकतर नशे में चूर थे— स्वामीजी बहुत प्रसन्न हुए। लोगों को हरे कृष्ण का गान करते हुए देखना उन्हें प्रिय था ।

हयग्रीवः नृत्य मंडलियों के सामने खड़े होने से मुझे कुछ भी नहीं सुनाई दे रहा था। लेकिन फिर भी इतना स्पष्ट था कि हरे कृष्ण का गान निरंतर उत्कर्ष की ओर बढ़ रहा था। पीछे की दीवाल पर मोरपंख से युक्त सुनहरा मुकुट धारण किए हुए और हाथ में बाँसुरी लिए कृष्ण का विशाल चित्र स्लाइड द्वारा प्रक्षिप्त हो रहा था ।

तब श्रील प्रभुपाद खड़े हुए, उन्होंने अपनी बाहें ऊपर उठाईं और नाचने लगे। उन्होंने हर एक को साथ देने के लिए इशारा किया, और जो लोग अभी तक बैठे थे वे खड़े हो गए और प्रभुपाद के मधुर नृत्य का अनुसरण करके सभी झूमते हुए नाचने और गाने लगे ।

रोजर सेगल : नृत्यशाला में नृत्य करने वाले ऐसे लग रहे थे मानो हवा में गेहूँ की बालियाँ लहरा रही हों। अवलान की नृत्यशाला के स्फूर्तिमय वातावरण के विपरीत वहाँ बहुत शान्ति थी । हरे कृष्ण का कीर्तन एक घंटे से अधिक समय तक चलता रहा। और अंत में हर व्यक्ति कूदने - फाँदने और चीखने लगा, यहाँ तक कि रोने और चिल्लाने तक लगा ।

किसी ने श्रील प्रभुपाद के सामने एक माइक्रोफोन रख दिया और उनकी आवाज उस शक्तिशाली ध्वनि-यंत्र से निकल कर गूँजने लगी । उत्साह बढ़ता गया। श्रील प्रभुपाद पसीने से तर थे। कीर्तनानन्द ने आग्रह किया कि कीर्तन बंद कर दिया जाय। उनका कहना था कि इतना परिश्रम स्वामीजी की अवस्था के लिए ठीक नहीं था; उन्हें हानि पहुँच सकती थी। लेकिन कीर्तन चलता रहा, वह तीव्र से तीव्रतर होता गया जब तक कि मंत्र के शब्द तुमुल संगीत और सहस्त्रों कंठों से निकले स्वरों की समवेत ध्वनि में अस्पष्ट नहीं हो गए।

तब अचानक कीर्तन बंद हो गया और केवल ध्वनि - वर्धक यंत्रों की ऊँची गूंज और श्रील प्रभुपाद की गूँजती हुई आवाज सुनाई पड़ी जिसमें वे अपने गुरु महाराज की प्रशस्ति गा रहे थे : “ ओऽम् विष्णुपाद परमहंस परिव्राजकाचार्य अष्टोत्तर शत श्री श्रीमद् भक्तिसिद्धान्त श्रीमद् भक्तिसिद्धान्त सरस्वती गोस्वामी महाराज की जय।... उपस्थित भक्तजनों का कल्याण हो ।"

श्रील प्रभुपाद गहरे धुएँ और भीड़ में से होते हुए सामने की सीढ़ियों से रंगमंच से नीचे उतरे । कीर्तनानन्द और रणछोड़ उनके ठीक पीछे चल रहे थे। एलेन ने अगली राक - मंडली की घोषणा की ।

जब स्वामीजी नृत्यशाला और प्रशंसक जन-समूह को पीछे छोड़ते हुए बाहर निकल रहे थे तब उन्होंने टिप्पणी की, "यह स्थान ब्रह्मचारी के लिए नहीं है ।"

दूसरे दिन सवेरे मंदिर में उन युवा - जनों की भीड़ लग गई, जिन्होंने स्वामीजी को अवलान में देखा था। उनमें से अधिकतर ने वहाँ पूरी रात बिताई थी। श्रील प्रभुपाद, अपना प्रातः कालीन नित्यकर्म पूरा करने के बाद, सात बजे नीचे उतरे। उन्होंने कीर्तन कराया और सवेरे का प्रवचन दिया ।

बाद में उसी प्रातः, कीर्तनानन्द और हयग्रीव के साथ सागर तट की ओर कार में जाते हुए स्वामीजी ने पूछा कि पिछली रात कीर्तन में कितने लोग शामिल हुए थे। उनके बताने पर उन्होंने पूछा कि कितना धन संग्रह हुआ। उन दोनों ने कहा कि निश्चित नहीं, लेकिन लगभग पन्द्रह सौ डालर इकठ्ठे हुए होंगे।

कार के पिछले भाग में बैठे वे मंद स्वर में हरे कृष्ण मंत्र जपते रहे। वे बालक जैसी सरल और शान्त मुद्रा में खिड़की से बाहर देख रहे थे । उनसे इस बात का बिल्कुल आभास नहीं हो रहा था कि गत रात जब वे प्रकाश- कंदुको से आलोकित और विद्युत बास ड्रमों तथा नगाड़ों के धमाकों से गुंजित अवलान नृत्यशाला के रंगमंच की ओर विजय - मुद्रा में बढ़ रहे थे तब हजारों हिप्पियों ने हर्ष ध्वनियों के मध्य उनकी अभ्यर्थना की थी और वे उनके मार्ग की दोनों ओर बराबर खड़े रहे थे। पिछली रात की तमाम तड़क-भड़क के बावजूद वे बिल्कुल शान्त थे; उनका निजी व्यवहार हर दिन जैसा सामान्य था; वे निर्लिप्त, निरपराध और विनीत थे; साथ ही वे बहुत सौम्य और पुरातन लग रहे थे। जैसा कि कीर्तनानन्द और हयग्रीव को मालूम था स्वामीजी इस दुनिया के नहीं थे। वे जानते थे कि, उन दोनों के विपरीत, वे हमेशा कृष्ण के बारे में सोचा करते थे ।

वे उन दोनों के साथ समुद्र तट पर चलते रहे जहाँ ठंडी हवा बह रही थी और ऊँची लहरे उठ रही थीं । कीर्तनानन्द ने प्रभुपाद के कंधों पर चादर डाल दी । " बंगाली में एक सुंदर कविता है, " प्रभुपाद ने मौन भंग करते हुए कहा, “सागर - पार से वह कैसा स्वर सुनाई दे रहा है, पुकारता हुआ: यहाँ आओ, यहाँ आओ..." बहुत कम बोलते हुए स्वामीजी अपने दोनों मित्रों के साथ चलते रहे । प्रायः वे समुद्र और आकाश की ओर देखते जाते थे। चलते-चलते उन्होंने मंद स्वर में एक मंत्र गाया जिसे कीर्तनानन्द और हयग्रीव ने पहले कभी नहीं सुना था : “गोविन्द जय जय, गोपाल जय जय, राधा रमण हरि, गोविन्द जय जय ।" वे इस सागर तट पर चलते हुए इस मंत्र को धीरे धीरे, गंभीर स्वर में गाते रहे। उन्होंने प्रशान्त महासागर पर दृष्टि निक्षेप करते हुए कहा, “क्योंकि यह महान् है, यह प्रशान्त है ।

" 'महासागर शाश्वत लगता है । " हयग्रीव ने साहस करके कहा ।

"नहीं, " महाप्रभु ने उत्तर दिया, “इस भौतिक जगत में शाश्वत कुछ भी नहीं है। "

***

चूँकि न्यू यार्क में मंदिर में बहुत कम महिलाएँ उपस्थित थीं, इसलिए लोगों ने जिज्ञासा की थी कि क्या यह संभव था कि महिलाएँ कृष्णभावनामृत-आंदोलन में भाग ले सकें। लेकिन सैन फ्रांसिस्को में यह प्रश्न कभी उठा ही नहीं। वहाँ अधिकतर लोग, जो स्वामीजी के पास आए थे, अपनी महिला मित्रों के साथ आए थे। प्रभुपाद के लिए वे लड़के और लड़कियाँ, जो कृष्ण के बारे में जानने और उनका कीर्तन करने के इच्छुक थे, विश्वास की उन चिनगारियों की तरह थे जिन्हें भक्तिमय जीवन की धधकती अग्नि के रूप में प्रज्ज्वलित करना था। प्रभुपाद के लिए यह प्रश्न ही नहीं था कि वे उन लड़के-लड़कियों से अपने महिला या पुरुष मित्रों का त्याग करने को कहें। किन्तु उन्होंने दृढ़ स्वर में " अवैध यौनाचार " का निषेध किया । नर-नारियों के ऐसे युग्मों का एक ही समाधान था कि उन्हें कृष्णभावनामृत में विवाह बद्ध किया जाय ।

लेकिन चूँकि परम्परा यह रही है कि कोई संन्यासी न तो विवाह बैठा सकता है, न विवाह रचा सकता है, इसलिए भारतीय नियमों के अनुसार प्रभुपाद की आलोचना हो सकती थी कि उन्होंने स्त्री-पुरुषों को परस्पर संयोग की अनुमति दी । किन्तु प्रभुपाद कृष्णभावनामृत के प्रचार को प्राथमिकता दे रहे थे। अन्य किस भारतीय ने, चाहे वह कितना भी आलोचक रहा हो, कभी भी इस तरह भारत की आध्यात्मिक संस्कृति को पाश्चात्य संस्कृति में प्रत्यारोपित करने का प्रयत्न किया था ? प्रभुपाद को मालूम हो गया था कि अमरीका की सामाजिक परम्परा को एकदम बदल देना और पुरुषों को स्त्रियों से अलग कर देना संभव नहीं था। लेकिन अवैध यौनाचार के निषेध के उनके सिद्धान्त में ढिलाई भी संभव नहीं थी । अतः शिष्य बनने के इच्छुक उनके नए अनुयायियों के लिए सर्वोत्तम व्यवस्था यह थी कि वे कृष्णभावनामृत में विवाह - बद्ध होकर गृहस्थ आश्रम स्वीकार करें। कृष्णभावनामृत में पति-पत्नी साथ रह सकते थे और एक-दूसरे की आध्यात्मिक प्रगति में सहायता प्रदान कर सकते थे। किसी स्त्री और पुरुष में परस्पर संयोग के में लिए यह अधिकृत व्यवस्था थी । आध्यात्मिक गुरु के रूप प्रभुपाद को यदि आवश्यक प्रतीत हुआ कि वे किसी स्त्री पुरुष का एक दूसरे से विवाह कराएँ, तो वे ऐसा कर सकते थे। किन्तु उसके पूर्व, ऐसे स्त्री-पुरुष का कृष्णभावनामृत की ओर आकृष्ट होना आवश्यक था ।

जोन कैम्पानेला ओरीगान के पोर्टलैंड उपनगर में एक सम्पन्न परिवार में पल कर बड़ी हुई थी। उसके पिता निगम-संबंधी टेक्स के मुख्तार थे । जोन और उसकी बहिन के पास अपनी अलग-अलग स्र्पोट्र्स कारें और आसवेगो झील पर घूमने के लिए अलग-अलग नौकाएँ थी। ओरीगान विश्वविद्यालय के बहन- संघ जीवन से ऊब कर जोन ने पहले ही सत्र में उसे छोड़ दिया था और रीड कालेज में दाखिला ले लिया था जहाँ उसने मृत्तिका - शिल्प, बुनाई और सुलेखन का अध्ययन किया था। सन् १९६३ ई. में वह सैन फ्रांसिस्को आ गई जहाँ वह एक मृत्तिका - शिल्प दूकान में भागीदार बन गई । यद्यपि तब तक शौकीन दूकानदारों, लोकगायकों और नर्तकों में से उसके बहुत-से मित्र बन गए थे, किन्तु वह सबसे निर्लिप्त और आत्म विश्लेषी बनी रही । जोन की श्रील प्रभुपाद से पहली भेंट उसकी बहिन जान के माध्यम से हुई। जान अपने मित्र माइकेल ग्रांट के साथ न्यू यार्क नगर में रहने के लिए गई थी, जहाँ माइकेल संगीत संयोजक का कार्य कर चुका था । सन् १९६५ ई. में उनकी भेंट स्वामीजी से हुई थी, जब वे बोवरी में अकेले रह रहे थे। वे दोनों मुकुंद और जानकी नाम से उनके दीक्षित शिष्य बन गए थे। स्वामीजी ने उनसे विवाह कर लेने को कहा था। उन दोनों ने जोन को अपने विवाहोत्सव में सम्मिलित होने को आमंत्रित किया था । तब एक दिन के अतिथि के रूप मे जोन को स्वामीजी के अलौकिक संसार २६ सेकंड एवन्यू में प्रवेश होने का संक्षिप्त अवसर मिला था और उन्होंने उसे विवाह के भोज के लिए आटा गूंदने और कचौड़ियाँ बनाने में सारा दिन व्यस्त रखा था। जोन एक अलग कमरे में अपने काम में लगी रही और स्वामीजी रसोई घर में कार्यरत थे, यद्यपि वे बार-बार जोन के कमरे में जाते रहे और कचौड़ियाँ ठीक बनाने में उसका मार्ग-दर्शन करते रहे। उन्होंने उससे कहा था कि कचौड़ियाँ पकाते समय वह अपने वस्त्रों या शरीर का स्पर्श न करे और सिगरेट न पिए, क्योंकि भोजन भगवान् श्रीकृष्ण को अर्पित होना था और इसलिए उसे शुद्धता के साथ तैयार करना था। इस संक्षिप्त संसर्ग से जोन को विश्वास हो गया था कि स्वामीजी एक महान् आध्यात्मिक गुरु थे, लेकिन कृष्णभावनामृत का और आगे अवगाहन किए बिना ही वह सैन फ्रांसिस्को लौट गई थी।

कुछ महीने बाद मुकुंद और जानकी कार द्वारा वेस्ट कोस्ट गए थे। उनकी योजना शीघ्र भारत जाने की थी । लेकिन स्वामीजी का पत्र मिला कि वे कैलिफोर्निया में कृष्णभावनामृत का प्रसार करने के लिए मंदिर की स्थापना करें, इसलिए उन्होंने योजना बदल दी थी। मुकुंद ने स्वामीजी के सम्बन्ध में जोन और अन्य लोगों से बात की थी और उसने पाया था कि बहुत सारे युवकों और युवतियों की अभिरुचि उनके प्रति थी । तदन्तर जोन मुकुंद, जानकी और रोजर सेगल नामक एक युवक के साथ ओरीगान के जंगलों में गई थी जहाँ वे सब साम और मजोरी के पास गए थे जो इन सब के समान मित्र थे । साम और मजोरी एक टावर में रहते थे जहाँ से जंगल दिखाई देता था ।

मुकुंद कृष्णभावनामृत के विषय में जो कुछ जानता था उसकी व्याख्या उसने उन लोगों से की थी और वे छहों साथ साथ हरे कृष्ण कीर्तन करने लगे थे। उनकी विशेष रुचि स्वामीजी की इस शिक्षा में थी कि मादक द्रव्यों के बिना ही चेतना का विकास किया जा सकता है। मुकुंद ने सोत्साह बताया था कि स्वामीजी ने उससे कैलिफोर्निया में एक मंदिर की स्थापना के लिए कहा था । शीघ्र ही मुकुंद, उसकी पत्नी जानकी, साम और उसकी मित्र मजोरी, रोजर और जोन, जिन सब में अब घनिष्ठ मित्रता हो गई थी, सैन फ्रांसिस्को पहुँच गये थे और एक अपार्टमेण्ट लेकर रहने लगे थे। उनका उद्देश्य कोई स्टोरफ्रंट या दूकान के सामने का भाग प्राप्त करना और स्वामीजी के कार्य का शुभारम्भ करना था ।

स्वामीजी के पहुँचने के बाद जोन ने मंदिर के कीर्तन में उपस्थित रहना शुरू कर दिया था । उसे स्वामीजी और कीर्तन के प्रति आकर्षण हुआ था । उसे यह बात विशेष पसंद आई थी कि वह जब चाहती थी, स्वामीजी के पास जा सकती थी । स्वामीजी अपनी घूमने वाली कुर्सी में बैठ जाते थे। उनका हाथ माला की थैली में होता था। वे पवित्र नामों का जप करते रहते थे। और जोन माला के अंदर उनकी घूमती हुई उंगलियों को देखती हुई भाव-विमुग्ध बैठी रहती थी ।

एक दिन, जब स्वामीजी, मिलने के निर्धारित समय के दौरान, अपनी घूमने वाली कुर्सी में आसीन थे और जोन और अन्य लोग उनके पैरों के निकट बैठे थे, तब जानकी की बिल्ली बड़े कमरे के दरवाजे से प्रविष्ट हुई, और धीरे धीरे आगे बढ़ती हुई स्वामीजी के पैरों के निकट पहुँच गई। वह वहाँ बैठ गई और स्वामीजी को ध्यानपूर्वक देखती हुई म्याँउ - म्याँउ करने लगी। भक्तों में से कोई नहीं जानता था कि स्वामीजी क्या करेंगे। स्वामीजी अपने पैर से बिल्ली की पीठ सहलाने लगे और बोले, “हरे कृष्ण, हरे कृष्ण । क्या इसे प्रसाद का दूध दिया जा रहा है ?”

जोन : मैं स्वामीजी के कार्यों और उनकी उदारता से बहुत द्रवित हुई—वे बिल्लियों के प्रति भी उदार थे। मेरे मन में उनसे और अधिक संपर्क की इच्छा जाग्रत हुई ।

जोन की समझ में यह बात आ गई कि स्वामीजी की सेवा करना एक गंभीर कार्य है। लेकिन जब तक उसके बारे में उसे पूर्ण निश्चय न हो जाय वह दीक्षा ग्रहण करने की जल्दबाजी नहीं करना चाहती थी। कभी कभी वह हर्षोन्माद में रुदन करने लगती थी और कभी स्वामीजी के भाषण के बीच वह सो जाती थी। अतः वह हिचकती रही और शंकालु बनी रही। उसके मन में प्रश्न उठता, “मैं स्वामीजी की शिक्षाओं को अपने जीवन में ठीक-ठीक कैसे उतार सकती हूँ?”

एक दिन संध्या समय स्वामीजी ने उससे पूछा, "तुम दीक्षा कब ले रही हो ?" जोन ने उत्तर दिया कि वह नहीं जानती, लेकिन स्वामीजी की पुस्तकों को पढ़ने में और हरे कृष्ण कीर्तन में उसे आनन्द मिलता था । उसने बताया कि चूँकि पर्वतों और उच्च आध्यात्मिक चेतना के प्रति उसके मन में आकर्षण था, इसलिए वह तिब्बत की यात्रा करना चाहती थी ।

अपनी घूमने वाली कुर्सी में बैठे हुए स्वामीजी ने अपने पैरों के पास बैठी जोन पर दृष्टिपात किया। जोन ने अनुभव किया कि वे उसका तन-मन, सब कुछ, देख रहे हैं। "मैं तुम्हें तिब्बत से अधिक ऊँचाई पर ले जा सकता हूँ,” उन्होंने कहा, "जरा देखो।"

जोन को अचानक अनुभव हुआ कि स्वामीजी उसके बारे में हर चीज जानते हैं और उसको बोध हुआ, "ओह, मुझे स्वामीजी की दृष्टि से देखना है कि कृष्णभावनामृत क्या है ।" उससे वे वादा कर रहे थे कि वे उसे किसी बहुत उच्च राज्य में ले जायँगे, पर देखना उसे होगा। तब जोन ने स्वामीजी की शिष्या बनने का निश्चय किया ।

जब इस विषय में उसने अपने मित्र रोजर को बताया तो वह स्तंभित रह गया। रोजर और जोन दोनों साथ साथ कीर्तनों और भाषणों में शामिल हो रहे थे, लेकिन रोजर के मन में अभी भी संदेह बना हुआ था। उसे लगा कि हो सकता है कि उनका आपस में विवाह कर लेना ठीक हो, पर दीक्षित होना ठीक न हो। किन्तु जोन अधिक दृढ़ निश्चय थी। उसने रोजर को समझाया कि स्वामीजी केवल विवाह रचाने के लिए वहाँ नहीं आए थे : विवाह के पहले दीक्षा लेना आवश्यक था।

रोजर सेगल का पालनपोषण न्यू यार्क में हुआ था। वह एक हठयोग गुरु का अनुयायी था; उसने मनोतरंग - रासायनिकों में प्रयोग किया था और नागरिक अधिकारों के समर्थक के रूप में सुदूर दक्षिण की यात्रा की थी और अश्वेतों के साथ स्वातन्त्र्य - यात्राओं में भाग लिया था । स्थूल- काय, मिलनसार, स्पष्टवादी रोजर के सैन फ्रांसिस्को में बहुत सारे मित्र थे। उसने स्वामीजी को पहली बार हवाई अड्डे पर हैट - ऐशबरी के, प्रसन्नता में डूबे, जन-समूह के साथ देखा था और वह उनके शाही व्यक्तित्व से प्रभावित हुआ था । अवतार की धारणा के बारे में वह प्रायः सोचा करता था; किन्तु स्वामीजी के कतिपय भाषणों और आत्मा के देहान्तरण विषय में उनकी व्याख्या सुन कर उसे लगा कि उसने एक ऐसा व्यक्ति पा लिया है जो मृत्योपरान्त जीवन के बारे में उठने वाले किसी भी प्रश्न का उत्तर निश्चयपूर्वक जानता है।

एक दिन, रात में मंदिर के कार्यक्रम में सम्मिलित होने के पश्चात्, रोजर अपने अपार्टमेंट में लौटा और स्वामीजी ने जो कुछ कहा था उस पर विचार करने के लिए अग्नि-बचाव सीढ़ी पर बैठ गया । उन्होंने कहा था कि जगत् मिथ्या है। " लेकिन मुझे यह वास्तविक लगता है," रोजर ने सोचा । “यदि मैं अपनी बाँह में कोई चीज चुभोता हूँ तो मुझे पीड़ा होती है। तो यह मिथ्या कैसे हुआ ? अग्नि - बचाव सीढ़ी वास्तविक है, नहीं तो मैं अन्तरिक्ष में गिर पहूँ। यह अन्तरिक्ष भी वास्तविक है। क्या नहीं है?"

रोजर का निष्कर्ष था कि वह नहीं जानता कि मिथ्या या माया से स्वामीजी का क्या तात्पर्य है । “यदि मैं दीवाल के आर-पार जाना चाहूँ, उसने सोचा, "तो क्या वास्तविक होगा या नहीं ? हो सकता है कि दीवाल की वास्तविकता केवल मेरे मन में हो।" माया की परीक्षा लेने के लिए वह अपने कमरे के अंदर गया, मन को स्थिर किया और 'दीवाल में' जाने लगा — नतीजा हुआ दीवाल से टक्कर। वह फिर बैठ गया और सोचने लगा, " स्वामीजी का तात्पर्य क्या है, जब जब वे कहते हैं कि जगत मिथ्या है ?” उसने निश्चय किया कि अगली भेंट में वह यह प्रश्न पूछेगा ।

उसने पूछा। और श्रील प्रभुपाद ने उसे बताया कि वास्तव में जगत वास्तविक है, क्योंकि वह भगवान् द्वारा सृजित है जो परम सत्य है। किन्तु यह इस अर्थ में मिथ्या है कि हर वस्तु अस्थायी है। जब कोई व्यक्ति अस्थायी संसार को स्थायी मान लेता है तो वह मिथ्या से ग्रसित हो जाता है । स्वामीजी ने समझाया कि केवल आध्यात्मिक संसार ही शाश्वत है और इसलिए वास्तविक है।

स्वामीजी के उत्तर से रोजर को संतोष हुआ। लेकिन उसके सामने दूसरी कठिनाइयाँ थीं : उसकी समझ में स्वामीजी बहुत अधिक रूढ़िवादी थे । स्वामीजी का यह कहना रोजर को पसन्द नहीं था कि लोग अपने कुत्तों को मंदिर से बाहर रखें। बहुत से दर्शनार्थी अपने पालतू कुत्ते मन्दिर में साथ लाते थे और मंदिर की इमारत के सामने बाँधने का एक खंभा था जहाँ इन पालतू जानवरों को पट्टे के साथ बाँधा जा सकता था। लेकिन स्वामीजी किसी भी पालतू जानवर को मंदिर के अंदर नहीं जाने देते थे । "यह दर्शन मनुष्यों के लिए है, ” उन्होंने कहा, “कुत्ता या बिल्ली इसे नहीं समझ सकते, यद्यपि, यदि वे हरे कृष्ण का कीर्तन सुनें तो भविष्य में उन्हें उच्च योनि में जन्म मिल सकता है।

और भी ऐसे विवाद के बिन्दु थे जिन के संदर्भ में रोजर स्वामीजी के दर्शन को रूढ़िवादी मानता था । स्वामीजी बार-बार धूम्रपान जैसी अनियंत्रित आदतों के विरुद्ध चर्चा करते रहते थे; लेकिन रोजर ऐसी चीजों को छोड़ने की कल्पना भी नहीं कर सकता था । और विशेषकर यौनाचार को सीमित करने के आदेशों से उसे बड़ी परेशानी थी। तो भी, स्वामीजी के आदेशों का कड़ाई से पालन न करने पर भी, रोजर को लगा कि उसके मन में स्वामीजी और कृष्ण के लिए प्रेम बढ़ रहा है। उसे ऐसी अनुभूति हुई कि स्वामीजी के पास उसे सिखाने के लिए बहुत कुछ है और स्वामीजी उसे अपने निश्चित तरीके और निश्चित क्रम में कर रहे थे। रोजर जानता था कि स्वामीजी उसे आध्यात्मिक जीवन में एक शिशु मानते थे जिसका पोषण चम्मच से खिलाकर करना होता है। वह जानता था कि उसे आज्ञाकारी होना है और जो कुछ स्वामीजी दें उसे स्वीकार करना हे ।

साम स्पियरस्ट्रा लम्बा, दुबला-पतला और सुनहरे घुँघराले बालों वाला था। वह खिलाड़ी था ( उसने ओलम्पिक में भाग लेने के लिए स्कीटिंग अर्थात् बरफ पर फिसलने का प्रशिक्षण प्राप्त किया था ) फिर भी वह कलाकार था ( वह लेखक और लकड़ी का शिल्पकार था ) । उसने ओरीगान के रीड कालेज से स्नातक परीक्षा पास की थी और फुलब्राइट छात्रवृत्ति पर वह स्विटजरलैंड के एक छोटे-से कालेज में प्रविष्ट हुआ था जहाँ से उसने दर्शन शास्त्र में एम.ए. की डिग्री ली थी । मुकुंद के शब्दों में वह 'अक्खड़ व्यक्तिवादी के प्रतीक' के रूप में विख्यात था ।

जब मुकुन्द साम के पर्वत निकट के टावर में उस से मिला था और उसे स्वामीजी और कृष्णभावनामृत के बारे में बताया था तब उसके मन में इन नए विचारों के प्रति बड़ी उत्सुकता हुई थी । साम का जीवन निःशेष- प्राय था, लेकिन मुकुंद और जानकी स्वामीजी के बारे में जो कुछ कहते आ रहे थे उसमें उसे आशा की झलक मिली थी। मुकुंद के साथ कुछ दिन रह लेने के बाद साम सैन फ्रांसिस्को में कृष्णभावनामृत का मंदिर स्थापित करने में उसकी सहायता करने को इच्छुक हो गया था ।

साम अकेला व्यक्ति था जो स्थानीय राक कलाकारों को जानता था और उसने उनको स्वामी भक्तिवेदान्त के साथ, जिनसे उनकी कभी भेंट नहीं हुई थी, उनके अवलान के कार्यक्रम में सम्मिलित होने को तैयार कर किया था । साम ने स्वामीजी को पहली बार तब देखा था जब वे सैन फ्रांसिस्को के हवाई अड्डे पर उतरे थे। बाद में उसने आग्रहपूर्वक कहा था कि उसने स्वामीजी के शरीर से एक ज्योती निकलती हुई देखी थी ।

साम को पहले कुछ कहते डर लगा था; वह जानता भी नहीं था कि वह क्या कहे ——– प्रभुपाद उसके लिए बिल्कुल नए थे और वे बहुत ऊँचे लगते थे। लेकिन अवलान के कार्यक्रम के दूसरे दिन जब मुकुंद ने प्रभुपाद को बताया कि नृत्य का आयोजन साम ने किया था, तब प्रभुपाद ने साम को बुलवाया और पूछा कि कितना धन संग्रह हुआ है। प्रभुपाद अपनी छोटी डेस्क के पीछे बैठे थे। साम उनके सामने बैठ गया और बताया कि लगभग पन्द्रह सौ डालर का लाभ हुआ है। "अच्छा, ” प्रभुपाद बोले, “ तो तुम कोषाधिकारी होगे ।” उसके बाद श्रील प्रभुपाद ने पूछा, "परमात्मा के सम्बन्ध में तुम्हारा क्या विचार है ?"

" परमात्मा एक है।” साम ने उत्तर दिया ।

प्रभुपाद ने पूछा, " परमात्मा की आराधना का उद्देश्य क्या है ?"

साम ने जवाब दिया, “परमात्मा से एकाकार होना।"

" नहीं, " प्रभुपाद ने कहा, “तुम परमात्मा से एकाकार नहीं हो सकते। परमात्मा और तुम दो भिन्न इकाइयां हैं। लेकिन उसकी रुचि में तुम एकाकार हो सकते हो ।" और तब उन्होंने साम को कृष्ण के बारे में बताया । वार्तालाप के बाद प्रभुपाद ने बताया, “तुम हर दिन आ सकते हो और मैं तुम्हें सिखाऊँगा कि हिसाब कैसे रखा जाता है।" इसलिए साम हिसाब-किताब रखना सीखने के लिए हर दिन आधा घंटा स्वामीजी के पास बैठने लगा ।

साम : मुझे हिसाब-किताब रखना नहीं आता था और न उसमें मेरी रुचि थी। लेकिन स्वामीजी से हर दिन मिलने का यह एक अच्छा बहाना था। वे मुझे फटकार बताते थे, यदि मैं ज्यादा धन खर्च करता या हिसाब किताब ठीक नहीं बैठता था । मुझे यह चीज बेहद पसंद थी कि वे इतने व्यावहारिक थे कि उन्हें हिसाब-किताब रखने का ऐसा ज्ञान था। शुरू से ही वे मुझे मित्र सरीखे जँचे, न कि जीवन के किसी अन्य क्षेत्र से आए हुए आदर्श की मूर्ति, एक व्यक्ति, की तरह। मैं अपने सभी प्रश्न उनके पास ले जाता था। स्वामीजी हर दिन की समस्याओं का हमेशा जिस तरह समाधान देते थे उसी ढंग से अपनी समस्याओं का उत्तर स्वयं ढूँढ लेना मैने सीख लिया । और उन्होंने जो पहली चीज मुझसे कराई, वह थी अपनी मित्र लड़की से विवाह कर लेना ।

मुकुंद और उसकी पत्नी, जानकी, श्रील प्रभुपाद के कमरे के ठीक नीचे वाले कमरे में रहते थे। अब तक केवल वे ही ऐसे दम्पत्ति थे जिन्हें दीक्षित बना कर श्रील प्रभुपाद ने विवाह करा दिया था। मुकुंद जब से सैन फ्रांसिस्को आया वह अपने गले में प्राय: बड़े लाल मनकों की दुहरी लड़ियों वाली लम्बी माला पहने रहता था । उसने सिर के बाल लम्बे कर रखे थे और छोटी, घनी, काली दाढ़ी बढ़ा ली थी। वह हैट ऐशबरी के वातावरण में घुल-मिल गया था और वहाँ की अनेक विख्यात हस्तियों से परिचित हो गया था। यद्यपि कभी-कभी गाने-बजाने से वह पैसे कमा लेता था, परन्तु उसका अधिकांश समय प्रभुपाद के उद्देश्यों की पूर्ति में लगता, विशेष कर लोगों से मिलने और अवलान की तरह के शानदार कार्यक्रमों के आयोजन में। प्रभुपाद की सहायता के लिए लोगों को जुटाने में वह नेता का कार्य करता, यद्यपि अभी तक उसमें प्रतिबद्धता का स्थायी भाव नहीं पैदा हुआ था। वह सहायता इसलिए कर रहा था, क्योंकि उसे मजा आ रहा था । सैन फ्रांसिस्को के अपने बहुत से मित्रों से भिन्न दिखने की उसमें तनिक भी इच्छा न होने के कारण, वह प्रभुपाद के नियमित आध्यात्मिक जीवन के सिद्धान्तों का कड़ाई से पालन नहीं करता था ।

श्रील प्रभुपाद के साथ विचार-विनिमय करते समय मुकुंद को उनके प्रति बराबरी का भाव प्रदर्शित करना पसन्द था, न कि किसी प्रकार की दासता का;और प्रभुपाद भी यह बात पसंद करते थे। लेकिन कभी कभी शिक्षक के रूप में प्रभुपाद अपनी बात पर अड़ जाते थे। एक बार जब प्रभुपाद मुकुंद के कमरे में गए तो, उन्होंने दीवार पर एक पोस्टर देखा जिसमें एक लंबा कोट पहने और तलवार लिए हुए एक वृषभहंता एक सांड़ का पीछा कर रहा था । " यह भयावह चित्र है, 'यह भयावह चित्र है, ” श्रील प्रभुपाद ने कहा । उनके चेहरे से अप्रसन्नता टपक रही थी । मुकुंद ने पोस्टर पर दृष्टि डाली। उसे पहली बार उसके आशय का बोध हुआ । “हाँ, यह भयावह है, ” उसने कहा, और चित्र को दीवाल से नोच कर फेंक दिया।

श्रील प्रभुपाद कीर्तनों में कोई मृदंग बजाने वाला चाहते थे और संगीतज्ञ मुकुंद इस कार्य के लिए उपयुक्त व्यक्ति हो सकता था ।

मुकुंद : जिस दिन मृदंग आया, मैंने स्वामीजी से पूछा कि क्या मैं उसे बजाना सीख सकता हूँ और स्वामीजी ने कहा कि हाँ । मैने पूछा कि कब, और उन्होंने कहा कि, “तुम कब चाहते हो ?” मैंने कहा कि, “अभी, उन्होंने कहा, “हाँ।” ऐसी शीघ्र नियुक्ति से मुझे थोड़ा आश्चर्य हुआ। लेकिन मैं मृदंग उनके कमरे में ले गया और वे मुझे मूल ताल सिखाने लगे। पहले गी ता ता, गीता ता, गीता ता की धुन बजाई। फिर कुछ अधिक जटिल धुन गीता ता, गी ता ता, गीता ता, ग्रीडता ।

जब मैने ताल बजानी शुरू की तो मैं उसे तेज करता गया और वे मुझे धीरे बजाने को कहते रहे। उन्होंने काफी समय लगाया, केवल मुझे

यह बताने में कि मृदंग के सिरों पर ताल कैसे देनी चाहिए । तब मुझे ताल देना कुछ-कुछ आने लगा। किन्तु वे मुझे बराबर धीरे बजाने को और बजाते समय गीता ता बोलने को कहते रहे। उनका कहना था कि गी ता ता और मृदंग की ध्वनि एक जैसी निकलनी चाहिए। मुझे मृदंग पर थाप और मुख से गी ता ता का उच्चारण एक जैसा करना चाहिए ।

मैं दृढ़ निश्चय था और बहुत समय तक मैं बहुत धीरे-धीरे अभ्यास करता रहा। मैं बहुत दत्त - चित्त होकर सीख रहा था। तब अचानक मैंने देखा कि स्वामीजी स्थिर भाव से मेरी बगल में खड़े हैं। पता नहीं, वे वहाँ इस तरह बिना कुछ बोले कब तक खड़े रहेंगे, और मुझे घबराहट - सी होने लगी । लेकिन मैं मृदंग बजाता रहा। जब मुझ में साहस आया और मैंने नजर उठा कर उनके चेहरे की ओर देखा तो मुझे आश्चर्य हुआ कि आँखे बंद किए हुए वे सहमति प्रकट करते हुए अपना सिर आगे-पीछे हिला रहे थे। मेरे वादन में उन्हें आनन्द आता लग रहा था। इससे मुझे आश्चर्य हुआ । यद्यपि मैंने संगीत में शिक्षा ली थी और पियानो सीखने में कई वर्ष लगाए थे, लेकिन मुझे कोई ऐसा उदाहरण स्मरण नहीं है जबकि मेरे शिक्षक को मेरे वादन में सचमुच आनन्द आता प्रतीत हुआ हो। मुझे यह देख कर आश्चर्य हुआ कि एक ऐसा भी शिक्षक है जो इतना पारंगत है कि जो कुछ वह सिखा रहा है उसमें उसे इतना आनन्द आ रहा है, इसलिए नहीं कि यह उनका सिखाया हुआ या उनका व्यक्तिगत तरीका है, वरन् इसलिए कि वे कृष्ण की ऊर्जा को मेरे जैसे प्रतिबन्धित व्यक्ति की आत्मा से गुजरते हुए देख रहे हैं और इसमें उन्हें, अतीव आनन्द आ रहा है। मुझे और भी गहरी अनुभूति हुई कि स्वामीजी एक सच्चे शिक्षक थे, यद्यपि मुझे इसकी कोई धारणा नहीं थी कि एक आध्यात्मिक गुरु सचमुच क्या होता है।

मुकुंद की पत्नी, जानकी, के लिए कृष्णभावनामृत का अर्थ स्वामीजी से व्यक्तिगत स्तर पर व्यवहार करना था। जब तक वे आसपास रहते, वह बिल्कुल ठीक होती। उनसे प्रश्न करने में, उनकी सेवा करने में, उनसे भोजन बनाना सीखने में उसे आनन्द आता । उसे कृष्णभावनामृत का दर्शन सीखने की बहुत चिन्ता नहीं थी, किन्तु स्वामीजी के प्रति शीघ्र ही उसमें गहरा आकर्षण पैदा हो गया था ।

जानकी: हम कई लोग स्वामीजी के कमरे में उनके पास बैठे थे। मैंने पूछा कि क्या स्वामीजी के बच्चे हैं। उन्होंने मेरी ओर देखा मानों मैंने कोई अद्भुत बात कह दी हो, और उन्होंने कहा, “क्या तुम मेरी बच्ची नहीं हो ?” मैने कहा, "अच्छा, हूँ।” और वे बोले, “क्या ये सभी मेरे बच्चे नहीं हैं?" और उन्होंने तत्क्षण उत्तर दिया जिससे मुझे संदेह नहीं रहा कि वे जो कुछ कह गए थे वह मन से कहा गया था ।"

हर दिन सवेरे प्रभुपाद कई घंटे जानकी, जोन और दूसरों को भोजन बनाना सिखाते थे। एक दिन उन्होंने रसोई घर में एक तरह का बदर फल देखा जैसा उन्होंने पहले कभी नहीं देखा था । उन्होंने जानकी से पूछा कि यह क्या है। उसने बताया की यह स्ट्रोबेरी का फल है। उन्होंने तुरन्त एक अपने मुँह में डाल लिया और बोले - "यह तो बहुत स्वादिष्ट है।" और वे एक के बाद एक खाते गए, यह कहते हुए कि, “बहुत स्वादिष्ट है। "

एक दिन जानकी मक्खन मथ रही थी । प्रभुपाद कमरे में आए और पूछा, "यह क्या है ?"

उसने उत्तर दिया – “यह मथा हुआ मक्खन है।'

" मथा हुआ मक्खन क्या होता ?" उन्होंने पूछा ।

"यह मक्खन है" उसने उत्तर दिया, 'जब इसे मथ देते हैं तो यह फूल कर अधिक ठोस बन जाता है ।"

यद्यपि स्वामीजी रसोई-घर के नियमों के सम्बन्ध में बहुत दृढ़ थे ( जिनमें एक नियम यह था कि रसोई घर में कोई खाएगा नहीं) तब भी उन्होंने तुरन्त अपनी एक उंगली मक्खन में डुबोई और उसे चखा । " यह दही है । " उन्होंने कहा ।

हल्के मन से और स्वामीजी को डाँटते हुए, जिसमें उसे बहुत मजा आता था, जानकी ने उत्तर दिया, "नहीं, स्वामीजी, यह मथा हुआ मक्खन है। " स्वामीजी ने उसका संशोधन करते हुए कहा, "नहीं, यह दही है।" और उन्होंने फिर अपनी उंगली उसमें डुबोई और उसे चखा, यह कहते हुए कि, "ओह, इसका स्वाद बहुत अच्छा है । "

"स्वामीजी, ” जानकी ने उन पर अभियोग लगाया, 'आप रसोई घर में खा रहे हैं ! " श्रील प्रभुपाद केवल मुस्कराए और आगे-पीछे सिर हिलाया, यह कहते हुए, “ठीक है । "

जानकी : एक बार मैंने उनसे कहा, “स्वामीजी, मैने एक बहुत उत्तेजक स्वप्न देखा है। मैने देखा कि हम अपने एक निजी लोक में हैं और पृथ्वी- लोक से सभी लोग वहाँ आए हैं। वे सभी सच्चे भक्त बन गए हैं और सभी भजन कर रहे हैं। आप पृथ्वी तल से ऊँचाई पर एक विशेष कुर्सी पर बैठे हैं और सारी पृथ्वी के लोग तालियाँ बजा रहे हैं और हरे कृष्ण का कीर्तन कर रहे हैं।” स्वामीजी मुस्कराए और बोले, "ओह, यह कितना सुंदर स्वप्न है । "

१९ वर्षीया बोनी मैकडोनाल्ड अपने मित्र २० वर्षीय गेरी मैकएलराय के साथ आस्टिन से, जहाँ वे टेक्सास विश्वविद्यालय में पढ़ते थे और एक साथ रहते थे, सैन फ्रांसिस्को आई थी । बोनी कृश-काय, गोरी-चिट्टी और दक्षिणी लहजे में मंदोच्चार वाली लड़की थी । उसका जन्म और लालन-पालन दक्षिण पूर्व टेक्सास के एक बैपटिस्ट परिवार में हुआ था। हाईस्कूल में पढ़ते समय वह नास्तिक बन गई थी, लेकिन बाद में जब योरप की यात्रा करते हुए उसने वहाँ की धार्मिक कला और बड़े-बड़े गिरजाघरों के स्थापत्य का अध्ययन किया तब वह इस निष्कर्ष पर पहुँची थी कि ये सारे के सारे महान् कलाकार बिल्कुल गलत नहीं हो सकते ।

गेरी एक अमरीकी वायु सेना अधिकारी का पुत्र था। वह जर्मनी में ओकीनावा और दुनिया के अन्य स्थानों में पल कर बड़ा हुआ था, और उसके बाद उसका परिवार स्थायी रूप से टेक्सास में रहने लगा था। अपने काले बालों और घनी बरौनियों से वह हमेशा त्योरी चढ़ाए लगता था, सिवाय उस समय के जबकि वह मुस्करा रहा हो। लम्बे बाल रखने और मनोतरंगी नशा सेवन करने वाले टेक्सास विश्वविद्यालय के सर्वप्रथम छात्रों में वह एक था। एल. एस. डी का सेवन करते हुए बोनी और गेरी को आध्यात्मिक खोज के मार्ग पर जाने की धुन हो गई थी और अपने माँ-बाप या स्कूल को बताये बिना ही वे, "किसी ऐसे व्यक्ति की खोज में जो हमें आध्यात्मिक जीवन के बारे में सिखा सके” वेस्टकोस्ट जा पहुँचे थे।

आध्यात्मिक पुस्तकों और हैट ऐशबरी के आध्यात्मिक दलों में आध्यात्मिकता की खोज करते हुए उन्होंने कई निराशापूर्ण महीने गुजार दिए थे। वे शाकाहारी बन गए थे। गेरी ने स्वयं को विद्युत गिटार सिखाना आरंभ कर दिया था, जबकि बोनी अपने ही प्रकार के हठयोग ध्यान के लिए प्रतिदिन गोल्डन गेट पार्क जाने लगी थी। लेकिन धीरे-धीरे उन्हें निराशा ही हुई थी और वे अनुभव करने लगे थे कि नशा सेवन से उनका पतन होता जा रहा है।

उन्होंने पढ़ा था कि जब शिष्य तैयार होगा तब गुरु प्रकट होंगे; और वे उस दिन की प्रतीक्षा उत्सुकता से कर रहे थे जबकि उनके गुरु आएँगे । यद्यपि बोनी ने अपना अधिकांश समय सैन फ्रांसिस्को के पार्कों में घूमते हुए बिताया था, पर एक दिन ऐसा हुआ कि वह हैट एशबरी की एक बड़ी दूकान में मेज पर पड़ी पत्रिकाओं का ढेर उलट-पलट रही थी कि उसे बैक टु गाडहेड की एक प्रति मिली जो न्यू यार्क में श्रील प्रभुपाद के शिष्यों द्वारा अनुलिपि पद्धति से निकाली जा रही थी । वह उसमें स्वामीजी के सम्बन्ध में लिखे गए हयग्रीव के लेख से विशेष रूप से आकृष्ट हुई थी । स्वामीजी की मुस्कराहट, उनकी चमकीली आँखों, उनके नुकीले जूतों और उन सभी बातों के वर्णनों से, जो उन्होंने कही थीं, उसके मन में यह भावना उत्पन्न हुई थी कि यह वही गुरु हो सकते हैं जिनकी उसे खोज थी । और जब उसे इस बात का पता लगा कि उसी स्वामीजी ने हैट ऐशबरी में एक आश्रम स्थापित किया है, तो उसने तुरन्त अपने आसपास उनकी खोज आरंभ कर दी थी, जब तक कि फ्रेडरिक स्ट्रीट में उसने मंदिर नहीं पा लिया था ।

स्वामीजी से मिलने के पहले बोनी और गेरी दोनों दुखी थे । गेरी को इस बात की चिन्ता थी कि उसे सेना में भरती होना पड़ेगा, और वे दोनों इसलिए निराश थे कि सैन फ्रांसिस्को में जिस सत्य की खोज में वे आए थे वह उन्हें नहीं मिला था। इसलिए जब वे श्रील प्रभुपाद से उनके कमरे में मिले तब वे अपनी परिस्थिति का वर्णन करने लगे ।

बोनी : वे अपने छोटे से कमरे में चारों ओर घूमने वाली कुर्सी पर बैठे थे, और हम लोगों को इस तरह देख रहे थे मानों हम पागल हों—क्योंकि हम सचमुच थे। फिर वे बोले – “तुम लोग मेरी कक्षा में प्रातः तथा सांयकाल आओ और सब कुछ ठीक हो जायगा ।" यह हम लोगों को अविश्वसनीय रोगोपचार लगा, किन्तु हम लोग घबराए हुए थे, इसलिए हम राजी हो गए।

मैंने उन्हें बताया कि मैं सारे योरप का भ्रमण कर चुकी हूँ, और उन्होंने कहा,“ ओह ! तुमने इतना अधिक भ्रमण किया है। ” और मैने उनसे कहा, “हाँ, मैं इतना अधिक भ्रमण कर चुकी हूँ, मैने बहुत सारे कार्य किए हैं, लेकिन उनमें से कोई भी मुझे प्रसन्नता नहीं दे सका।" वे मेरे कथन से खुश हुए। उन्होंने कहा, “हाँ, यही समस्या है। '

हम उनके सवेरे के व्याख्यान में जाने लगे। हमारे लिए सवेरे ७ बजे वहाँ पहुँचना बहुत दूर पड़ता था, लेकिन हम पहुँच जाते थे, इस विश्वास के साथ कि उन्होंने ऐसा करने को कहा है और हम उसे करेंगे। तब एक दिन उन्होंने पूछा, “तुम क्या करते हो ?” जब हमने उन्हें बताया कि हम कालेज में चित्रकला के छात्र और छात्रा हैं तो उन्होंने हमें कृष्ण का चित्र बनाने को कहा । उसके कुछ समय बाद हमने दीक्षित किए जाने की प्रार्थना की।

जोन और रोजर शीघ्र ही दीक्षित हो गए । वे यमुना और गुरुदास के नाम से सम्बोधित होने लगे। और दूसरे ही दिन उनका विवाह हो गया । विवाह-संस्कार स्वामीजी ने सम्पन्न कराया; वे पत्तियों और पहाड़ी पुष्प - विशेष की भारी माला पहने थे। वे मंदिर के फर्श पर एक आसन पर बैठे थे । उनके चारों ओर उनके अनुयायी थे, और हवन की सामग्री थी । उनके सामने मिट्टी की छोटी-सी वेदी थी जिस पर बाद में उन्हें अग्नि प्रज्वलित करनी थी। उन्होंने कृष्णभावनामृत से अनुप्राणित विवाह का तात्पर्य समझाया और बताया कि पति-पत्नी को किस प्रकार एक-दूसरे की सहायता और कृष्ण को केन्द्र में रखते हुए उनकी सेवा करनी चाहिए । स्वामीजी ने कहा था कि उन्हें पाश्चात्य महिलाओं की वेश-भूषा पसंद नहीं थी और उनके अनुरोध पर यमुना को साड़ी पहनाई गई थी ।

हवन - सामग्रियों में, यद्यपि स्वामीजी ने घी की माँग की थी, लेकिन उनके भक्तों ने घी को बहुत मंहगा समझ कर उसके स्थान पर पिघली हुई मारजरीन रखी थी। उन्होंने समिधा की भी माँग की थी, लेकिन उनके भक्तों ने संतरे की पेटी के टुकड़े प्रस्तुत किए। जब यमुना और गुरुदास उनके सामने वेदी के दोनों ओर आमने-सामने बैठ गए तब उन्होंने पेटी के एक टुकड़े को लेकर तथाकथित घी में डुबाया और अग्नि प्रज्जवलित करने के लिए उसे मोमबत्ती की लौ में लगाया। टुकड़ा जल उठा, चरचराया और बुझ गया। उन्होंने एक दूसरा टुकड़ा उठाया और पिघली हुई मारजरीन में उसे भिगोया, लेकिन जब वे उसे लौ के ऊपर ले गए तो स्विट - स्विट करके चरचरा कर वह भी बुझ गया। चार या पाँच बार इस प्रकार असफल प्रयत्न करने के बाद स्वामीजी बोले – “ इस विवाह की गति बहुत मंद रहेगी । " यह सुन कर यमुना रोने लगी ।

बोनी और गेरी स्वामीजी से मिलने के केवल दो सप्ताह बाद दीक्षित हो गए थे। बोनी का दीक्षित नाम गोविन्ददासी था और गेरी का गौरसुंदर दीक्षा ग्रहण के समय भी यद्यपि वे थे और जो कुछ हो रहा था उससे नीले रंग का जीन धारण किए हुए अनभिज्ञ से लगते थे, परन्तु स्वामीजी में उनका विश्वास था । वे जानते थे कि मादक द्रव्य सेवन से उनके दिमागों में उलझनें थीं, लेकिन अपनी दीक्षा को उन्होंने गंभीरता से ग्रहण किया और वे स्वामीजी के निष्ठावान् अनुयायी बन गए। गौरसुंदर के पास जितनी चरस बची थी उसने फेंक दी और वह और गोविन्ददासी केवल वह भोजन ग्रहण करने लगे जो वे भगवान् कृष्ण को चढ़ाते थे। उनकी दीक्षा के दो सप्ताह बाद स्वामीजी ने उनका विवाह कराया ।

गोविन्ददासी की विवाह - संध्या में उसके पिता टेक्सास से आए, यद्यपि कृष्णभावनामृत को अमरीकनों के बिल्कुल विरुद्ध मान कर वे उसके विरोधी थे। मंदिर में श्रील प्रभुपाद के आसन के पास जाकर गोविन्ददासी के पिता ने पूछा, “आपको मेरी लड़की का नाम क्यों बदलना पड़ा ? उसे एक भारतीय नाम क्यों रखना पड़ा ?"

प्रभुपाद ने उनकी ओर देखा, तब उन्होंने एक शरारत भरी दृष्टि मिस्टर पटेल पर डाली जो एक भारतीय मेहमान के रूप में अपने परिवार के साथ पास में ही खड़े थे । " आप भारतीयों को पसंद नहीं करते ?” उन्होंने पूछा ।

जिसने स्वामीजी की बात सुनी वह हँस पड़ा, सिवाये गोविन्ददासी के पिता के, जिन्होंने उत्तर दिया, “हाँ, वे बहुत अच्छे हैं। लेकिन बोनी को एक भिन्न नाम रखने की आवश्यकता क्यों हुई ?"

"क्योंकि उसने मुझसे एक नया नाम रखने को कहा है।" श्रील प्रभुपाद ने उत्तर दिया । " यदि आप उसे प्यार करते हैं तो आपको उन सारी चीजों से प्यार होगा जिन्हें वह पसंद करती है। आपकी लड़की प्रसन्न है। आपको आपत्ति क्यों है ?" विवाद वहीं समाप्त हो गया, और गोविन्ददासी के पिता शिष्ट बने रहे। बाद में अपनी लड़की और दामाद के साथ प्रसाद ग्रहण करने में उन्हें आनन्द आया ।

गोविन्ददासी : गौरसुंदर और मैने स्वामीजी के श्रीमद्भागवतम् के तीनों खंडो का पाठ आरंभ किया। साथ ही, स्वामीजी ने मुझ से राधा-कृष्ण और एक गाय का बड़ा चित्र बनाने को कहा। इसलिए हर दिन मैं दिन-भर चित्र बनाती रहती और गौरसुंदर श्रीमद्भागवतम् पढ़ कर मुझे सुनाया करता -- एक खंड के बाद दूसरा खंड चलता रहा। लगातार दो महीने हमने यह क्रम चलाया। इसी बीच स्वामीजी ने मुझसे अपना भी एक ऐसा चित्र बनाने को कहा जिसमें वे खड़े हों और जिसकी पृष्ठभूमि में भगवान् चैतन्य नृत्य कर रहे हों। स्वामीजी ऐसा चित्र चाहते थे जिसमें भगवान् चैतन्य का चरण उनके सिर का स्पर्श कर रहा हो। मैने प्रयत्न किया। चित्र काफी विकराल था, फिर भी उससे वे प्रसन्न थे ।

प्रभुपाद के विचारशील अनुयायियों की धारणा थी कि दीक्षा के आकांक्षी कुछ अभ्यर्थियों का इरादा अपने गुरु के प्रति जीवनपर्यन्त एकान्त प्रतिबद्धता निभाने का नहीं था। वे कहते, “स्वामीजी, कुछ लोग केवल दीक्षा के लिए आते हैं। हमने उन्हें पहले कभी नहीं देखा और दीक्षा के बाद हम उन्हें फिर कभी नहीं देखते।” प्रभुपाद ने उत्तर दिया कि ऐसा खतरा तो लेना ही होगा। एक दिन मंदिर में एक व्याख्यान में उन्होंने बताया कि यद्यपि एक शिष्य के पिछले पापों के फल दीक्षा के समय समाप्त हो जाते हैं लेकिन दीक्षा- गुरु का दायित्व तब तक बना रहता है जब तक शिष्य को भौतिक संसार से मुक्ति नहीं मिल जाती। इसीलिए, उन्होंने कहा कि भगवान् चैतन्य ने चेतावनी दी है कि किसी गुरु को बहुत-से शिष्य स्वीकार नहीं करने चाहिए।

एक रात को जब मंदिर में प्रश्नोत्तर - सत्र चल रहा था, एक भारी-भरकम दाढ़ी वाले व्यक्ति ने अपना हाथ उठाया और प्रभुपाद से पूछा, 'क्या मैं दीक्षा ग्रहण कर सकता हूँ ?"

उसकी इस धृष्ट खुलेआम प्रार्थना पर प्रभुपाद के कुछ भक्तों को खीज हुई, पर प्रभुपाद शांत - गंभीर बने रहे । “हाँ,” उन्होंने उत्तर दिया, “लेकिन पहले तुम दो प्रश्नों के उत्तर दो। कृष्ण कौन हैं ? "

लड़के ने कुछ देर सोचा और कहा, “कृष्ण भगवान् हैं।"

“हाँ,” प्रभुपाद ने उत्तर दिया, "और तुम कौन हो ?"

लड़के ने फिर कुछ देर सोचा और तब उत्तर दिया, “मैं भगवान् का सेवक हूँ ।"

"बहुत अच्छा," प्रभुपाद ने कहा, “तुम कल दीक्षित हो सकते हो। " प्रभुपाद जानते थे कि उनके पाश्चात्य शिष्यों के लिए कृष्णभावनामृत में अटल रहना और विशुद्ध भक्ति का लक्ष्य प्राप्त करना कठिन होगा । जीवन-भर उन्हें खराब से खराब प्रशिक्षण मिलता आया था और उनकी नाममात्र की ईसाइयत और दार्शनिक जिज्ञासा के बावजूद उनमें से अधिकतर को ईश्वरीय ज्ञान के बारे में कुछ भी पता नहीं था। उन्हें इसका भी बोध नहीं था कि अवैध यौनाचार और मांस भक्षण ठीक नहीं, यद्यपि जब प्रभुपाद ने उन्हें बताया तो जो कुछ कहा गया, उन्होंने वह सब स्वीकार कर लिया। और वे मुक्त-भाव से हरे कृष्ण का जप करने लगे। तो वे उन्हें कैसे मना कर सकते थे ?

अस्तु, वे माया के आकर्षणों के बावजूद कृष्णभावनामृत में अनुरक्त बने रह सकेंगे या नहीं, यह तो समय ही बताएगा। कुछ का पतन हो जायगा — यह मानव स्वभाव है। कुछ का नहीं होगा। कम-से-कम वे अवश्य सफल होंगे, जो मन से हरे कृष्ण के जप संबंधी प्रभुपाद के आदेशों का पालन करेंगे और पाप पूर्ण कार्यकलापों से बचेंगे। उन्होंने, उदाहरण दिया कि एक व्यक्ति कह सकता है कि आज का ताजा भोजन, यदि उसका ठीक से उपयोग न हुआ तो, कुछ दिनों में खराब हो जायगा। लेकिन यदि वह इस समय ताजा है तो यह कहना कि भविष्य में इसका दुरुपयोग होगा और इसलिए वह खराब हो जायगा, केवल अनुमान की बात है। हाँ, भविष्य में किसी का भी पतन हो सकता है। परन्तु प्रभुपाद ने तो अपने ऊपर यह दायित्व लिया कि वे अपने शिष्यों को अभी सद्कार्यों में लगाएँगे। और वे उन्हें ऐसी विधियाँ बता रहे थे जिनके अनुगमन से वे पतन की राह जाने से हमेशा बचे रहेंगे।

वैदिक मानदंडों को अलग भी रख दें, तो स्वामीजी के न्यू यार्क के शिष्यों के मानदंड से भी सैन फ्रांसिस्को के भक्त नियम-पालन में कठोर नहीं थे। उनमें से कुछ मालपुए की दुकान पर जाते रहते, कुछ कृष्ण को अर्पित किए बिना भोजन कर लेते और कुछ चाकलेट और बाजारु आइसक्रीम जैसी निषिद्ध, वस्तुएँ खाया करते। कुछ शिष्य कीर्तन के बाद, मंदिर के द्वार के बाहर ही, सिगरेट पीने लगते। कुछ ठीक-ठीक यह जाने बिना ही कि उन्हें कैसा आचरण करना होगा दीक्षा ग्रहण कर लेते।

कीर्तनानन्द : सैन फ्रांसिस्को में लोगों की मनोवृत्ति अधिक शिथिल थी । भक्त कोने की दुकान पर जाते और काफी पी आते तथा मालपुआ खा आते। लेकिन प्रभुपाद को लोगों का इस प्रकार (उनकी ओर) आना प्रिय लग रहा था। और एवलान बालरूम का कार्यक्रम भी उन्हें पसंद था। किन्तु, उसके दो पक्ष थे : कुछ तो ऐसे लोग थे जो विधि-विधानों का दृढ़ता से पालन करते थे और शुद्धता पर बल देते थे और अन्य कुछ ऐसे थे जो दृढ़ता की इतनी चिन्ता न करते, किन्तु कृष्णभावनामृत का प्रसार यथासंभव दूर-दूर तक करना चाहते थे। स्वामीजी इतने महान् थे कि वे दोनों तरह के लोगों का स्वागत करते थे।

इक्कीस वर्षीय माइकेल राइट मेरी नकोर से हाल ही में छूटा था और अठ्ठारह वर्षीया नांसी ग्रिंडल हाईस्कूल पास करके अभी-अभी निकली थी। वे लास एंजलेस में कालेज में मिले थे। हताश होकर और किसी ऐसी ठोस वस्तु की आवश्यकता का अनुभव करते हुए जिसे वे अपना जीवन अर्पित कर सकें, वे हिप्पियों के दल में सम्मिलित होने के लिए सैन फ्रांसिस्को आए थे। पर शीघ्र ही उन्हें बोध हुआ कि उनके और हैट एशबरी के हिप्पियों में, जिन्हें उन्होंने गंदा, निरुद्देश्य, अनुत्पादक और अपने व्यष्टित्व की खोज में खोया हुआ पाया, बहुत अल्प समानता थी, इसलिए नांसी ने टेलिफोन कंपनी में सेक्रेटरी की नौकरी कर ली और माइकेल बिजली कम्पनी में, लाइनमैन बन गया। तब उन्होंने हैट ऐशबरी में स्वामी के बारे में सुना और मंदिर जाने का निश्चय किया ।

संध्या का कीर्तन चल रहा था और अदम्य हिप्पी अपने अंगों को हिला - डुला और मरोड़ रहे थे। माइकेल और नांसी एक किनारे फर्श पर बैठ गए। वे कीर्तन की अपेक्षा स्वामीजी की उपस्थिति से अधिक प्रभावित थे । कीर्तन के बाद प्रभुपाद ने व्याख्यान दिया, लेकिन उन्हें उनका लहजा भारी लगा । वे उन्हें समझना चाहते थे— उनके अन्तर्मन में यह भावना थी कि वे कोई बहुमूल्य चीज बता रहे हैं— और फिर भी उसका सारा रहस्य स्वामीजी के भारी लहजे के पीछे और एक दूसरी भाषा में लिखी पुस्तक के अंदर छिपा प्रतीत हुआ। उन्होंने दूसरे दिन प्रातःकाल फिर से आने और प्रयत्न करने का निश्चय किया ।

सवेरे के कार्यक्रम में उन्हें लोगों की संख्या कम मिली। जप के लिए गले में माला पहने हुए एक दर्जन भक्त थे और कुछ लोग सड़कों से आ गए थे। कीर्तन मधुर और अधिक स्निग्ध था, और माइकेल और नांसी ने भक्तों के साथ कीर्तन और नृत्य किया। उसके बाद प्रभुपाद का व्याख्यान हुआ और इस बार उनके कुछ विचार दोनों की समझ में आए। वे नाश्ते के लिए रुके रहे और मुकुंद तथा जानकी, सैम तथा मारजोरी (जो अब श्यामसुंदर और मालती कहलाने लगे थे), यमुना तथा गुरुदास एवं गोविन्ददासी तथा गौरसुंदर से उनकी मित्रता हो गई। ये भक्त उन्हें पसंद आए और उन्होंने उस शाम को फिर आने का वादा किया। शीघ्र ही वे नियमित रूप से सवेरे और शाम के कार्यक्रमों में आने लगे, और अन्य महिलाओं के साथ नांसी, प्रभुपाद की भोजन बनाना सिखाने की सप्ताहांत कक्षा में भी जाने लगी।

प्रभुपाद के विचार माइकेल की समझ में आते थे, लेकिन किसी आध्यात्मिक सत्ता के सामने समर्पण की आवश्यकता को स्वीकार करने में उसे कठिनाई थी। उसमें अधिकार की अवहेलना की प्रवृत्ति थी। लेकिन जितना ही वह सोचता उतना ही उसे लगता कि प्रभुपाद ठीक थे—उसे उनका अधिकार मानना चाहिए। उसने अपने से तर्क किया, "लालबत्ती पर हर बार मैं रुकता हूँ, यह अधिकार स्वीकार करना ही तो हुआ।" और अंत में वह इसी निष्कर्ष पर पहुँचा कि आध्यात्मिक ज्ञान के लिए किसी आध्यात्मिक सत्ता को स्वीकार करना होगा। फिर भी चूँकि वह उसे स्वीकार नहीं करना चाहता था, इसलिए वह द्विविधा में था । अंत में, दो सप्ताह तक प्रभुपाद के व्याख्यान सुनने के बाद, उसने उनके अधिकार के सामने समर्पण और कृष्ण-भक्त बनने का निर्णय किया।

माइकेल : नांसी और मैने विवाह करने और स्वामीजी के शिष्य और उनकी सोसाइटी के सदस्य बनने का निर्णय किया। हमने कुछ भक्तों से कहा, "हम स्वामीजी से मिलना चाहते हैं।” उन्होंने कहा, “हाँ, अभी ऊपर चले जाओ। वे तीसरी मंजिल पर हैं।" हमें यह देख कर आश्चर्य हुआ कि वहाँ कोई औपचारिकताएँ नहीं थीं। जब हम दरवाजे पर पहुँचे तो उनके सेवक रणछोड़ ने हमें अंदर जाने दिया। हम जूते पहने ही अंदर चले गए, अतएव रणछोड़ को हम से जूते निकाल देने के लिए कहना पड़ा।

मैं ठीक-ठीक नहीं समझ पा रहा था कि स्वामीजी से क्या कहना है-वार्तालाप आरंभ करने के लिए मैं अपनी भावी पत्नी पर निर्भर था— किन्तु अंत में मैं ही बोला — “हम आए हैं, क्योंकि हम आपके कृष्णभावनामृत संघ के सदस्य बनना चाहते हैं।” उन्होंने कहा कि यह बहुत अच्छा होगा । तब मैंने कहा कि हमारे यहां आने का मुख्य कारण यह था कि हम विवाह करना चाहते थे। हम जानते थे कि वे विवाह-संस्कार सम्पन्न कराते थे और संघ का यह एक नियम था कि साथ रहने के पहले स्त्री-पुरुष के जोड़ों को विवाहित होना पड़ता था। स्वामीजी ने पूछा कि क्या इस दर्शन में मेरी रुचि थी और क्या मेरे पास कोई धंधा था। दोनों प्रश्नों के उत्तर मैंने, हाँ, में दिए। उन्होंने बताया कि सबसे पहले हमें दीक्षित होना पड़ेगा और तब अगले महीने हम एक दूसरे के साथ विवाह कर सकते थे।

दीक्षित होने पर माइकेल दयानन्द कहलाया और नांसी का नाम नन्दराणी हुआ। शीघ्र ही प्रभुपाद ने उनका विवाह करा दिया।

नन्दराणी: हम जानते थे कि यह एक बड़ा विवाहोत्सव होगा। हैट ऐशबरी में जब भी स्वामीजी कोई विवाह सम्पन्न कराते थे तो सैंकड़ों लोग जमा हो जाते थे और मंदिर भर जाता था। मेरे मां-बाप आ रहे थे और दयानंद के मां-बाप भी आ रहे थे।

स्वामीजी ने कहा कि यह उचित होगा कि मैं भोजन बनाऊँ। उन्होंने कहा कि विवाह के दिन सवेरे मैं उनके कमरे में पहुँच जाऊँ और विवाहोत्सव में परोसे जाने वाले भोजन को तैयार करने में वे मेरी सहायता करेंगे। इसलिए उस दिन प्रात:काल मैने अपनी सबसे अच्छी जीन, शर्ट और बूट पहने और स्वामीजी के कमरे में पहुँची। जब मैं ऊपर गई तो स्वामीजी के कमरे में बूट पहने घुस गई। वहाँ स्वामीजी अपनी रॉकिंग चेयर में बैठे थे। वे मुझे देख कर मुसकराए और बोले— “ओह, तुम भोजन बनाने के लिए आ गई ?” मैंने कहा, “हाँ,” वे बैठे रहे और मुझे देखते रहे—बहुत देर तक चुपचाप दृष्टि गड़ा कर। तब वे बोले-पहले बूट निकाल दो।

मेरे बूट और चमड़े का जैकेट उतार देने के बाद स्वामीजी उठे और पाकशाला में गए। उन्होंने एक बड़ा बर्तन उठायां जिसका पेंदा इतना जल गया था कि उसकी धातु दिखाई ही नहीं देती थी। उन्होंने उसे मुझे दिया और कहा कि, “हम इस बर्तन में दूध उबालना चाहते हैं। इसे धोना है।"

स्वामीजी की पाकशाला में कोई सिंक नहीं था, केवल एक छोटी-सी गोल हौदी थी। इसलिए मैं स्नान-घर में गई और मैंने बर्तन को नहाने के टब में रखा और उसे साफ कर दिया। मैने मान लिया कि स्वामीजी पेंदे की कालिख नहीं छुड़वाना चाहते थे, क्योंकि वह तो जल ही चुका था। इसलिए मैं बर्तन उनके पास वापस ले गई। वे बोले, "ओह! यह तो बहुत साफ हो गया। लेकिन पेंदे की यह कालिख भी छुड़ा दो ।'

मैंने कहा, ठीक है। मैने एक चाकू लिया और बर्तन के साथ टब में घुस गई और चाकू से उसकी कालिख खुरचने लगी। मैं लगी रही और लगी रही, खुरचती रही और खुरचती रही। कालिख मेरी कोहनी तक फैल गई, सब गड़बड़ हो गया। करीब आधी कालिख छूट गई, शेष आधी पेंदे का अभिन्न भाग बन गई मालूम होती थी। इसलिए मैं बर्तन स्वामीजी के पास वापस ले गई और बोली- मैं अधिक से अधिक इतना कर सकती हूँ। यह सब इतना जल गया है।" वे बोले—हाँ, हाँ, तुमने बहुत अच्छा साफ किया है। यह थोड़ी-सी जो कालिख रह गई है उसे भी छुड़ा दो ।'

सो, मैं बाथटब में गई और बर्तन को लगातार खुरचती रही, खुरचती रही। करीब दोपहर हो गई जब मैं बर्तन की पेंदी से सारी कालिख छुड़ाकर बाथटब से बाहर आई। जब बर्तन को स्वामीजी के पास ले गई तो बहुत प्रसन्न हुए। वह चमक रहा था। स्वामीजी का चेहरा मुसकान से भरा था और उन्होंने कहा : ओह ! यह बिल्कुल ठीक हो गया।" मैं थक कर चूर थी।

तब स्वामीजी मुझे अपनी पाकशाला में ले गए और मुझे रसगुल्ला बनाना सिखाया। हमने दूध उबाला, उसे फाड़ कर छेना बनाया और तब मैं बैठ गई और छेने की छोटी-छोटी गोलियाँ बनाकर ट्रे में रखती गई। जब मैं गोलियाँ बना रही थी तो उन्हें ट्रे में पंक्ति-बद्ध रख रही थी। हर गोली को दूसरे के समान होना था । यदि कोई गोली दूसरों के समान न होती तो स्वामीजी अपने अंगूठे और पहली तथा दूसरी उंगलियों से उसे पंक्ति से बाहर कर देते थे। और मुझे उन्हें फिर से बनाना पड़ता, जब तक कि उनका आकार औरों के समान न हो जाता। यह चलता रहा जब तक कि समान आकार की गोलियों से ट्रे भर नहीं गई।

तब स्वामीजी ने मुझे दिखाया कि छेने की गोलियों को शीरे में कैसे उबाला जाता है। मालती, जानकी और मैं पाकशाला में भोजन बना रही थीं और स्वामीजी गा रहे थे।

एक बार स्वामीजी ने गाना बंद कर दिया और मुझ से पूछा, "क्या तुम जानती हो कि तुम्हारे नाम का क्या मतलब है ?" मुझे यह भी स्मरण नहीं था कि मेरा नाम क्या था। दीक्षा के समय उन्होंने मेरा नाम बताया था, किन्तु हम में से कोई भक्त - नाम का प्रयोग नहीं करता था, इसलिए मुझे याद नहीं था कि मेरा नाम क्या था। मैंने कहा, "नहीं, स्वामीजी; मेरे नाम का मतलब क्या है ?” उन्होंने कहा, "इसका अर्थ है कि तुम कृष्ण की मां हो।" और वे जोर से हंसने लगे और रसगुल्लों को हिलाने के लिए वापस चले गए। मैं समझ नहीं सकी कि कृष्ण कौन थे, इस संसार में उनकी माँ कौन हो सकती थी और उससे मेरा क्या सम्बन्ध हो सकता था। किन्तु मुझे संतोष हुआ कि स्वामीजी मुझे कुछ होने लायक समझते हैं।

चार बजे के आसपास मैंने भोजन बनाना समाप्त किया और तब विवाह के लिए तैयार होने को मैं घर चली गई । यद्यपि मैने कभी भी जीन और पुराने कपड़ों के अतिरिक्त कुछ नहीं पहना था, स्वामीजी ने अन्य महिलाओं को संकेत कर रखा था कि विवाह के लिए वे मुझे किसी तरह साड़ी पहनाने का उपाय निकालें। इसलिए हमने साड़ी के लिए सिल्क का एक टुकड़ा खरीदा। मैं मालती के घर गई। उसे मुझे साड़ी पहनाने की विधि बताने में सहायता करनी थी। मैं साड़ी संभाल नहीं सकी, इसलिए उसने मुझ पर उसकी सिलाई कर दी। तब उन्होंने फूलों से मेरा श्रृंगार किया और मुझे स्वामीजी के पास ले जाकर दिखाया। वे बहुत प्रसन्न हुए । बोले— “हमारी महिलाओं को इसी तरह दिखना चाहिए। जीन और उस तरह की वेश-भूषा नहीं चाहिए। महिलाओं को हमेशा साड़ी पहननी चाहिए।"

सचमुच, मैं घबरा रही थी— मैं गिर गिर पड़ती, और साड़ी को मेरे ऊपर बार-बार सीना पड़ता। पर स्वामीजी समझ रहे थे कि यह आश्चर्यजनक दिखती है। पूरी साड़ी एक रंग की थी, इसलिए स्वामीजी ने कहा, “दूसरी बार ऐसी साड़ी खरीदना जिसके नीचे दूसरे रंग की किनारी हो, इस तरह साड़ी में दो रंग होंगे। मुझे दोहरे रंग वाली साड़ियाँ अधिक पसंद हैं।"

जब हम विवाह के लिए नीचे उतरे तो स्वामीजी मेरे सम्बन्धियों से मिले। उन्होंने उनसे बड़ी नरमी से बात की। मेरी माँ विवाह-संस्कार के बीच खूब रोती रहीं। मुझे संतोष था कि स्वामीजी से मिल कर उन्होंने उनका आशीर्वाद प्राप्त कर लिया था ।

बीस वर्षीय स्टीव बोहलर्ट न्यू यार्क में पैदा और बड़ा हुआ था और अब वह सैन फ्रांसिस्को में हिप्पी का जीवन बिता रहा था। उसने ओरेकल समाचार पत्र में स्वामी भक्तिवेदान्त के सैन फ्रांसिस्को आने के बारे में पढ़ा था। एक भारतीय स्वामी से मिलने का विचार उसे रुचिकर लगा था। हैट स्ट्रीट में चिपकाई गई सूचना पढ़ कर वह कैरोलिन गोल्ड नामक महिला के साथ, जिसके संग वह रह रहा था, स्वामी भक्तिवेदान्त से मिलने हवाई अड्डे पर गया था। उसे और कैरोलिन दोनों को हरे कृष्ण का जप करने से और प्रभुपाद के दर्शनों से आनन्ददायक स्फूर्ति मिली थी, और उन्होंने नियमित रूप से मंदिर में व्याख्यान और कीर्तन में उपस्थित रहना आरंभ किया। स्टीव ने निश्चय किया कि वह स्वामीजी के समान बनेगा, इसलिए वह और कैरोलिन दोनों प्रभुपाद से मिलने और दीक्षा के लिए प्रार्थना करने गए। प्रभुपाद से उनके कमरे में एकान्त में वार्तालाप करते हुए, उन्होंने आध्यात्मिक गुरु के प्रति आज्ञाकारिता और शाकाहारी बनने पर विचार-विनिमय किया । जब प्रभुपाद ने उनसे कहा कि या तो वे एक-दूसरे से अलग रहें या आपस में विवाह कर लें तो उन्होंने उत्तर दिया कि वे आपस में विवाह करना चाहेंगे। दीक्षा-संस्कार के लिए एक तिथि निश्चित कर दी गई।

प्रभुपाद ने स्टीव से सिर और दाढ़ी के बाल मुंड़ा देने को कहा । "आप मेरे सिर के बाल क्यों मुंड़वाना चाहते हैं ?" स्टीव ने आपत्ति की, "कृष्ण लम्बे बाल रखते थे, राम के बाल लम्बे थे; भगवान् चैतन्य के बाल लम्बे थे; और ईसा मसीह के बाल लम्बे थे। मैं अपने सिर के बाल क्यों मुंड़वा दूँ?"

प्रभुपाद मुसकराए और बोले— “क्योंकि अब तुम मेरे अनुयायी हो रहे हो,” दीवाल पर सूरदास का एक चित्र टंगा था। सूरदास वैष्णव थे। "तुम्हें अपना सिर उस तरह मुंड़वा लेना चाहिए।” प्रभुपाद ने सूरदास के चित्र की ओर संकेत करते हुए कहा ।

“मैं नहीं समझता कि अभी मैं यह करने को तैयार हूँ।” स्टीव ने कहा।

"बहुत अच्छा, तुम अभी एक युवक हो। अभी भी समय है। लेकिन कम-से-कम तुम्हें अपनी दाढ़ी मुंड़वा लेनी चाहिए और सिर के बाल एक आदमी की तरह छोटे करा लेने चाहिए।'

दीक्षा के दिन स्टीव ने अपनी दाढ़ी मुंड़वा दी और कानों के पास के बाल छोटे करवा दिए। इस प्रकार उसके सामने के बाल छोटे हो गए, लेकिन सिर के पीछे वे लम्बे बने रहे।

"यह कैसा रहा?" उसने पूछा ।

"तुम्हें पीछे के बाल भी कटवा लेने चाहिए,” प्रभुपाद ने उत्तर दिया । स्टीव राजी हो गया।

स्टीव का नाम प्रभुपाद ने सुबल रखा और कैरोलिन को उन्होंने कृष्णादेवी नाम दिया। थोड़े दिनों के बाद, उन्होंने उनका विवाह करा दिया।

चूँकि हर उत्सव कीर्तन और प्रसाद वितरण का एक और अवसर होता था, इसलिए उधर देखने वाले आकृष्ट होते गए। और हर उत्सव के साथ ज्यों-ज्यों आध्यात्मिक नामों और विवाहित युगमों की संख्या में वृद्धि होती गई, प्रभुपाद का आध्यात्मिक परिवार बढ़ता गया । उसका सौहार्द्रपूर्ण वातावरण एक छोटे, प्रिय परिवार जैसा था और प्रभुपाद अपने शिष्यों के साथ अपनत्वपूर्ण व्यवहार करते थे। उसमें संस्थागत औपचारिकताएँ न थीं या छोटे-बड़े का विचार नहीं था।

शिष्य प्रभुपाद के पास विभिन्न कारणों से जाया करते थे। वे उनके छोटे-से कमरे में प्रवेश कर उनसे एकान्त में वार्तालाप करते, जबकि स्वामीजी एक कामचलाऊ डेस्क के सामने सूर्य के प्रातःकालीन प्रकाश में चटाई पर बैठे होते। मुकुंद, गुरुदास और श्याम सुंदर जैसे शिष्यों के लिए तो वे मित्र के समान थे। जानकी और गोविन्ददासी से वे, उनके शरारती पुत्र की भाँति झिड़की खाने को तैयार रहते। या भोजन बनाना सिखाने वाले अध्यापक के रूप में वे वयोवृद्ध उनसे पाकविद्या के विधानों और स्वच्छता के नियमों का पालन कराते। और उन सभी के लिए वे भगवान् कृष्ण के अथाहपूर्ण भक्त थे, जिन्हें सभी वैदिक शास्त्रों के चरम निष्कर्षों का ज्ञान था और जो निस्सन्देह रूप से पुनर्जन्म की सत्यता से अभिज्ञ थे। वे सभी प्रश्नों के उत्तर दे सकते थे। वे उन्हें भौतिक जीवन से उबार कर आगे ले जा सकते थे, ऐशबरी के हिप्पी-संसार से आगे कृष्ण के आध्यात्मिक लोक विस्क में ।

***

सात बजे थे और संध्या का समय था । केसरिया रंग की धोती, कार्डीगन स्वेटर के नीचे ऊँचे गले की पुरानी जर्सी पहने और गर्दन के चारों ओर चादर लपेटे प्रभुपाद ने मंदिर में प्रवेश किया। कमरे के पिछले भाग में स्थित मंच पर पहुँच कर वे बैठ गए। मंच जमीन से दो फुट की ऊँचाई पर बना था और लकड़ी के दो पायों पर टिका था । लाल लकड़ी के तखतों पर एक गद्दी रखी थी। मंच के सामने कपड़े से आच्छादित एक पाठ-मंच था जिसकी दोनों ओर एक बाल्टी में कटे हुए फूल रखे थे। कपड़े से ढँकी थी जिस मंच के पीछे की दीवाल विशेष प्रकार के मद्रासी पर हरिदास द्वारा बनाया गया, कीर्तन करते हुए भगवान् चैतन्य का, चित्र टंगा था।

श्रील प्रभुपाद ने अपने मंजीरे उठा लिए, कपड़े के फीते तर्जनी उंगलियों में लपेट लिए और अपने युवा अनुयायियों की ओर देखा जो पालथी मार कर गलीचे पर बैठे थे। सभी दाढ़ी रखे थे और लगभग सभी के बाल लम्बे थे। सभी मालाएँ, विचित्र कपड़े और छल्ले पहने थे। भीतरी छत से लटकते बल्ब जापानी कागज से बनी लालटेनों में से मंद प्रकाश विकीर्ण कर रहे थे और उनकी रस्सियों से 'नवहो' (ईश्वर-नेत्र) चिह्न झूल रहे थे। प्रभुपाद ने एक-दो-तीन ताल बजाना शुरु किया और श्यामसुंदर हारमोनियम में हवा भरने लगा । यद्यपि हारमोनियम छोटे पिआनो की प्रकार का एक बहुत सरल वाद्य यंत्र है जिसका की-बोर्ड दाहिने हाथ से बजाया जाता है और बाएं हाथ से धौंकनी द्वारा उसमें हवा भरी जाती है, लेकिन फ्रेडरिक स्ट्रीट स्टोफ्रंट में उसे बजाना कोई नहीं जानता था, इसलिए वह 'मात्र भिनभिनाहट' होकर रह जाता था। भारत से लाया गया एक दूसरा महत्त्वपूर्ण कीर्तन वाद्य यंत्र दो सिरों वाला मृदंग था। उससे संगीत की पेचीदा लय निकाली जाती थी । किन्तु मुकुंद भी उसका बहुत साधारण प्रयोग प्रभुपाद के मंजीरों के एक-दो-तीन का साथ देने में कर सकता था।

मंदिर में कुछ और भी वाद्य यंत्र प्राप्त थे; जैसे ताशा या नक्कारा (जिस पर मंदिर को गर्व था), हयग्रीव का पुराना नगाड़ा, कुछ शंख और एक तुरही जिसे हयग्रीव ने समुद्र तट पर मिले लकड़ी के एक टुकड़े से बनाया था। कुछ अतिथि अपने निजी यंत्र, जैसे बांसुरी, मुरली, बोंगो आदि लाए थे। लेकिन इस समय सभी बाजे बंद थे; सभी प्रभुपाद की सांध्य - वंदना में निकलती लय के साथ तालियाँ बजा रहे थे।

प्रभुपाद की संस्कृत प्रार्थना में वैष्णव गुरुओं की प्रशस्ति गायी गई। शिष्य परम्परा के हर महान् गुरु के लिए उन्होंने विशिष्ट प्रशस्ति गाई । सर्वप्रथम, उन्होंने श्रील भक्तिसिद्धान्त सरस्वती के दिव्य गुणों का काव्यमय गान किया; तब एक एक करके गौर किशोरदास बाबाजी, और भक्तिविनोद ठाकुर की वंदना की। एक प्रार्थना में श्रील भक्तिसिद्धान्त को " पतित आत्माओं का उद्धारकर्ता” बताया गया। दूसरी प्रार्थना में गौरकिशोरदास बाबाजी का बखान उन्हें " त्याग - मूर्ति और कृष्ण के वियोग और गहरे प्रेम में भावविभोर” कह कर किया गया। प्रभुपाद ने गौरवर्णीय भगवान् चैतन्य का गुणगान किया जो कृष्ण के निर्मल प्रेम का वितरण करते थें। और उन्होंने भगवान् कृष्ण की वंदना की जो करुणा के सागर, दुखीजनों के सखा और सृष्टि के स्त्रोत हैं। प्रभुपाद जब भजन में निमग्न हो गए तब उनका शरीर आह्लाद से आंदोलित होने लगा। फर्श पर बैठा भक्त - समुदाय इस ओर से उस ओर झूमने लगा। वह देख रहा था कि प्रभुपाद के नेत्र ध्यान में बंद थे, और उनकी कोमल अभ्यस्त उंगलियाँ निपुणतापूर्वक मंजीरे बजा रही थीं। उन्हें उनके हृदय से निकली हुई वाणी की ऐसी सूक्ष्म तरंगे और ध्वनियाँ सुनाई दीं जो उन्होंने पहले कभी नहीं सुनी थी ।

तब भक्तिवेदान्त सुपरिचित मंत्र का जप करने लगे जिसे सुनने वे आए थे — हरे कृष्ण, हरे कृष्ण, कृष्ण कृष्ण, हरे हरे—और वे तुरन्त उनका साथ देने लगे । तुरही और नगाड़े बजने लगे, और शीघ्र ही अन्य वाद्य यंत्रों के वादक भी शामिल हो गए। धीरे-धीरे एक-दो करके श्रोता खड़े होते गए और नाचने लगे । प्रभुपाद के शिष्य खड़े हुए और प्रभुपाद के बताने के अनुसार पद-न्यास दिखाने लगे। कभी-कभी वे अपने हाथ हवा में ऊपर उठा देते। अन्य लोग अपनी मर्जी के मुताबिक नाच रहे थे। प्रभुपाद जम कर बैठे रहे, कभी-कभी वे अपनी आँख खोलते और चारों ओर देख लेते। वे जप में लगे थे, यद्यपि उनका सिर और शरीर हिल रहे थे ।

बीस मिनट के बाद बहुत से युवा नर्तक उछलने-कूदने लगे और पसीने से भीग गए। प्रभुपाद हरे कृष्ण गाते रहे और करताल बजाकर नर्तकों का मार्ग-दर्शन करते रहे। उनके नेत्र बंद थे, तब भी जोर से करताल बजा कर वे सारी उद्धाम भक्त - मंडली को नियंत्रित कर रहे थे। जप और नृत्य चलता रहा, और प्रभुपाद उनका अनुमोदन करते रहे।

इन हिप्पियों का कीर्तन भारतीय ब्राह्मणों के जप से भिन्न था, पर प्रभुपाद को इसकी चिन्ता नहीं थी— वे भक्ति को ही मान दण्ड बना कर चल रहे थे। अपने राधा-कृष्ण मंदिर में वे जो कुछ स्वीकार कर लेते वह कृष्ण को स्वीकार होता; अपने आध्यात्मिक गुरु भक्तिसिद्धान्त सरस्वती के माध्यम से उन की कृष्ण को यही भेंट थी। प्रभुपाद को अपने पर पूरा विश्वास था । यदि उनके युवा भक्तों को हारमोनियम या मृदंग बजाना ठीक से न भी आता हो, यदि वे न भी जानते हों कि सामूहिक कीर्तन एक जैसे सुर-ताल में नहीं होता, वरन् भावानुसार होता है, और यदि वे न भी जानते हों कि गुरु का सम्मान कैसे किया जाता है, तो चूँकि वे कीर्तन और नृत्य कर रहे थे, इसलिए प्रभुपाद उन्हें उत्साहित कर रहे थे और सिर हिला रहे थे कि, “हाँ, ठीक है।"

वहाँ बिगड़े हुए लोग भी थे— ऐसे लोग जिनके दिमाग और इरादे नशा सेवन से उत्पन्न व्यामोह की दुनिया में भटक रहे थे। तब भी मंदिर के वातावरण पर प्रभुपाद के भक्तों का आधिपत्य था। वे अपने हाथ उठा कर नृत्य कर रहे थे और अपने गुरु के संकेतों का सावधानी से पालन कर रहे थे। यद्यपि बहुत-सी बातों में वे भी हिप्पियों की तरह थे, लेकिन वे स्वामीजी के शिष्य थे और वे उन्हें प्रसन्न रखना और उनके आदेशों का पालन करना चाहते थे। कृष्णभावनामृत प्राप्त करना चाहते थे। तुरही और नक्कारों की भिन्न-भिन्न ध्वनियों के बावजूद कीर्तन मधुर बना रहा। हयग्रीव तो अपनी तुरही से सुर के अनुकूल संगत दे रहा था, किन्तु केवल हर दूसरे मंत्र के दौरान ।

श्रील प्रभुपाद जानते थे कि कीर्तन की कुछ बातें गलत या स्तर से नीचे थीं; लेकिन उन्होंने यह उपहार स्वीकार किया—किसी भद्दे ढंग से नहीं, वरन् प्यार से। वे इन अमरीकी लड़कों और लड़कियों से केवल जप कराना चाहते थे। उनकी वेश-भूषा अटपटी थी, वे बहुत अधिक उछल-कूद करते थे, या उनके विचार गलत थे—इसकी प्रभुपाद को अधिक चिन्ता नहीं थी। वे युवा लड़के और लड़कियाँ हरे कृष्ण का जप कर रहे थे; इसलिए कम-से-कम उस समय वे पवित्र थे । हिप्पियों को भी इस बात का पता था। और उससे उन्हें प्रेम था ।

जैसा कि जानकी ने स्वप्न में देखा था, श्रील प्रभुपाद की भी प्रसन्नता इसी बात में थी कि वे सारे संसार को कीर्तन करते देखें। वे कहते थे कि किसी भी तरह लोगों को कृष्णभावनामृत में डुबोना है। और भगवान् चैतन्य के मुख्य अनुयायी, रूप गोस्वामी, का भी आदेश यही था; उन्होंने लिखा है, "तस्मात् केनापि उपायेन कृष्णे निवेशयत्... किसी भी तरह मन को कृष्ण में लगाओ, विधि-विधान बाद में लागू होंगे।"

श्रील प्रभुपाद और श्रील रूप गोस्वामी के इस विचार में, श्रीकृष्ण के पवित्र नाम की शोधक शक्ति विषयक दृढ़ विश्वास, अन्तर्निहित है। हरे कृष्ण का जप करने से पतित से पतित व्यक्ति भी धीरे धीरे साधु-स्वभाव भक्त बन सकता है। श्रील प्रभुपाद श्रीमद्भागवत के एक श्लोक को प्रायः उद्धृत करते थे कि पापपूर्ण कार्यों में डूबे हुए व्यक्ति भी भगवान् के भक्तों की शरण में जाकर शुद्ध हो सकते हैं। वे जानते थे कि हैट ऐशबरी का हर हिप्पी पवित्र कृष्ण - नाम की कृपा पाने के योग्य है और वे इसे अपने आध्यात्मिक गुरु के प्रति अपना कर्तव्य समझते थे कि कृष्णभावनामृत का उपहार वे उन्मुक्त भाव से हर एक को दें और किसी को मना न करें। तो भी, इन म्लेच्छों के बीच रहते हुए, उन्हें आचरण का एक स्तर बनाए रखना था और कृष्णभावनामृत संघ की पवित्रता बनाए रखने के लिए वे कृत-संकल्प थे ।

उदाहरण के लिए, यदि उन्हें जनता को निःशुल्क भोजन वितरित करना था तो वह सामान्य भोजन नहीं होगा; वरन् कृष्ण को अर्पित भोजन होगा, प्रसाद होगा। भूखे लोगों को भोजन देना व्यर्थ था, जब तक कि उन्हें प्रसाद और आवागमन से मुक्ति का अवसर न दिया जाय। और कीर्तन में यद्यपि वे अभिव्यक्ति की पूरी स्वतंत्रता और खुली छूट देते थे और लोगों को अनियमित रूप से भाग लेने का अवसर मिलता था, किन्तु भगवान् कृष्ण के पवित्र नाम की दिव्य ध्वनि की प्रधानता सर्वमान्य थी। वे कीर्तन को कभी इतना विकृत नहीं होने देते थे कि वह नगाड़ों के शोर-शराबे मात्र में डूब जाय या लोग किन्हीं पुराने शब्दों की रट लगाने लगें; न ही एकत्रित मंडली में कोई इतना उन्मत्त प्रलाप कर सकता था कि अन्य लोग न कुछ सुन सकें या न सामूहिक कीर्तन में भाग ले सकें।

इन युवा लोगों को 'येन केन प्रकारेण' हरे कृष्ण के जप में लगाने के प्रयत्न में प्रभुपाद सहज ही जानते थे कि उन्हें क्या करने देना है और क्या नहीं करने देना है। वे गुरु थे और उनके नए शिष्य उनका अनुगमन करते थे, चाहे वे किसी अहंमन्य, ऐन्द्रयिक नर्तक को मंदिर के चारों ओर उछलने-कूदने देने का अवसर हो या प्रश्नोत्तर - सत्र में किसी नशे के वशीभूत पागल से तर्क-वितर्क का। जब कोई व्यक्ति अधिक उत्पाती हो जाता था तो प्रभुपाद उसे रोकने से डरते नहीं थे। लेकिन रोकने के अवसर विरले थे; मुख्य चीज तो उन्हें (कृष्णभावनामृत का उपहार) देना था।

कीर्तन एक घण्टे से अधिक चला, क्योंकि कीर्तन करने वाले एक दूसरे के हाथ पकड़ कर कमरे के चारों ओर नाच रहे थे और सामने के द्वार से धूप की सुगंध आ रही थी ।

***

सुबह और शाम के कीर्तनों से राधा-कृष्ण मंदिर हैट ऐशबरी में लोकप्रिय हो चुका था, किन्तु जब भक्तों ने दोपहर का भोजन निःशुल्क परोसना शुरू किया तो मन्दिर, समुदाय का अभिन्न अंग बन गया। प्रभुपाद ने अपने शिष्यों से कहा कि वे केवल भोजन बनाएँ और प्रसाद वितरण करें—दिन में उनका केवल यही कार्य होगा। सवेरे के समय शिष्य भोजन बनाते और दोपहर में उन सबको खिलाते जो वहाँ आते थे—कभी-कभी हैट ऐशबरी की सड़कों से वहाँ १५० या २०० हिप्पी इकठ्ठे हो जाते थे ।

सवेरे के कीर्तन से पहले ही लड़कियाँ स्टोव पर जई चढ़ा देतीं और नाश्ते के समय तक कमरा हिप्पियों से भर जाता जिनमें से अधिकतर रात-भर जगे होते। कुछ को अन्न और फल का ठोस भोजन कई दिनों के बाद मिलता ।

परन्तु मुख्य कार्यक्रम दोपहर के भोजन का होता। मालती बाहर जाती और आटा, दालें, चावल और आलू, गाजर, शलगम, चुकंदर आदि जो भी सब्जियाँ सस्ती या मुफ्त मिल जातीं, खरीद कर लाती। जहाँ कहीं संभव होता, वह अनुदान भी ले लेती। तब हर दिन रसोइए मसालेदार आलू का भरता, मक्खन लगी चपातियाँ, दाल और एक सब्जी, दो सौ लोगों के लिए तैयार करते । दोपहर के खाने का कार्यक्रम इसलिए संभव होता था कि व्यववसायी वर्ग के बहुत से लोग हिप्पियों को खिलाने के लिए अनुदान देने को इच्छुक थे ।

हर्षराणी : दोपहर के भोजन का कार्यक्रम हिप्पी हिल की बहुत सारी भीड़ को आकृष्ट करता था जो सचमुच भोजन चाहती थी। हिप्पी सचमुच भूखे होते । अन्य लोग भी थे जो आया करते थे, ऐसे लोग जो मंदिर में काम करते थे, किन्तु दीक्षित नहीं थे। रिकार्ड प्लेयर पर स्वामीजी का रिकार्ड बजता रहता। अच्छा पारिवारिक वातावरण बन जाता था ।

हरिदास : भोजन बाहर भी ले जाया जाता था, स्टोरफ्रंट के बाहर भी। लेकिन मुख्य भोजन अंदर ही परोसा जाता। सब कुछ बहुत विस्मयजनक लगता। लोग एक दूसरे के साथ सिकुड़ कर बैठते, और हमें उन्हें एक सिरे से दूसरे सिरे तक पंक्ति में बैठाना पड़ता। बहुत सारे लोग भोजन करते और चले जाते थे। हैट ऐशबरी के अन्य स्टोरों में माला से लेकर राक-डांस के रेकार्ड तक बिकते थे, लेकिन हमारा स्टोर उनसे भिन्न था, क्योंकि हम कोई चीज बेचते नहीं थे, हम उन्हें निःशुल्क देते थे।

और हम हर एक का स्वागत करते थे। हम सर्वत्र व्याप्त कोलाहल और पागलपन से लोगों को एक प्रकार का संरक्षण दे रहे थे। उस अर्थ में हमारा संघ एक अस्पताल था, और मेरी समझ में उसने बहुतों की सहायता की और बहुतों का उद्धार भी किया। मेरा तात्पर्य केवल उनकी आत्मा के उद्धार से नहीं है—प्रत्युत उनके दिमाग और शरीर की भी रक्षा हुई; क्योंकि बाहर सड़कों पर जो कुछ हो रहा था उससे बचना उनके बूते के बाहर था। मैं उन लोगों के बारे में बात कर रहा हूँ जो नशीले पदार्थों के अधिक सेवन से अपना जीवन नष्ट-सा कर चुके थे और जिन्हें सांत्वना चाहिए थी और जो भटकते हुए, संयोग से, हमारे मंदिर में आ जाते थे।

उनमें से कुछ हमारे पास रुक गए और भक्त बन गए, और कुछ केवल प्रसाद लेकर चले गए। हर दिन असामान्य घटनाएँ होतीं, और स्वामीजी उन्हें देखते और उनमें भाग लेते। दोपहर के भोजन का कार्यक्रम उन्हीं के विचार का प्रतिफल था ।

मुकुंद : एक दिन सालवेशन आर्मी के लोग भोजन के लिए आए। एक ट्रक भर कर लोग एकबारगी आ धमके—उनकी संख्या तीस या चालीस रही होगी।

लारी शिपेन : कुछ स्वच्छंद लोग हमारे निःशुल्क भोजन का लाभ, हम में दोष दर्शाते हुए, लेते थे। स्वामीजी उन्हें पसंद नहीं थे, क्योंकि उनका कहना था कि वे अपने ढंग के एक रूढ़िवादी धार्मिक पुरुष थे और उनकी रुचि रूढ़ि-मुक्त या स्वच्छन्द रहने में अधिक थी। वे खासे दोषदर्शी थे।

जिन लोगों की (स्वामीजी के विचारों में) अभिरुचि अधिक थी और जिनके पास पूछने के लिए प्रश्न थे— जो आध्यात्मिक शोधकर्ता थे—वे स्वामीजी से उनके कमरे में मिलते। बहुत से तो चिन्ताओं से भरे आते; उनकी चिन्ता वियतनाम युद्ध को या जो कुछ घट रहा था, उसे लेकर होती, या देश के कानून को लेकर, नशीले पदार्थों के बारे में खराब अनुभवों को लेकर, स्कूली व्यवस्था से या परिवार से हुए झगड़े को लेकर।

पब्लिक इस बात से बड़ी चिन्तित थी कि सैन फ्रांसिस्को में युवा वर्ग बहुत बड़ी संख्या में आ रहा था; यह एक ऐसी स्थिति थी जिसमें लगभग अनियंत्रणीय सामाजिक समस्या उत्पन्न हो रही थी। पुलिस और सामाजिक कल्याण. कार्यकर्ता स्वास्थ्य और आवास की अपर्याप्त व्यवस्था से विशेषकर हैट ऐशबरी की व्यवस्था से—परेशान थे। मध्यम वर्ग के कुछ लोगों को यह भय होने लगा था कि सैन फ्रांसिस्को बिल्कुल हिप्पियों का नगर हो जायगा । स्थानीय अधिकारियों ने स्वामी भक्तिवेदान्त के मंदिर द्वारा की जाने वाली सेवा का स्वागत किया, और जब हैट ऐशबरी के शहरी नेताओं में इस आपात स्थिति से निबटने के लिए एक समिति बनाने की बात चली तो, उन्होंने भक्तिवेदान्त स्वामी से उसमें भाग लेने की प्रार्थना की। वे राजी हो गए, लेकिन पहली बैठक के बाद उनकी रुचि जाती रही। उनके द्वारा प्रस्तुत समाधान को गंभीरतापूर्वक सुनने को कोई तैयार नहीं था ।

मास्टर सुब्रमनिया: सैन फ्रांसिस्को के बहुत-से जिम्मेदार लोगों को बहुत प्रसन्नता थी कि स्वामी भक्तिवेदान्त युवावर्ग के लोगों के बीच कार्य कर रहे थे। उस समय युवावर्ग के लोगों को उच्च प्रतिभा वाले एक ऐसे व्यक्ति की आवश्यकता थी और वे उसकी खोज में थे जिनकी उनमें रुचि हो और जो उनसे कह सके, “तुम्हें यह करना चाहिए, और तुम्हें वह नहीं करना चाहिए,”। अधिकतर लोगों की राय थी कि युवावर्ग के लोगों से कोई यह नहीं कह सकता था कि उन्हें क्या करना है, क्योंकि नशीले पदार्थों के सेवन तथा अन्य कारणों से वे सब काबू से बाहर थे। किन्तु स्वामीजी उनसे कहते थे कि उन्हें क्या करना है और वे करते थे। और हर एक स्वामीजी के कार्य की प्रशंसा करता था, विशेष कर युवावर्ग के लोग।

हर्षराणी : उपचार की दृष्टि से भी डाक्टर नहीं जानते थे कि एल. एस. डी. के सेवनकर्ताओं से कैसे निबटा जाये। उनकी संख्या इतनी अधिक थी कि स्थानीय पुलिस और निःशुल्क औषधालय उनसे निबट नहीं पा रहे थे। पुलिस ने स्वामीजी को एक निश्चित शरण-स्थल के रूप में देखा ।

माइकेल बोएन : भक्तिवेदान्त में लोगों को भक्ति के माध्यम से नशीले पदार्थों की— विशेष कर स्पीड, अफीम और एल. एस. डी. की आदत छुड़ाने की अद्भुत योग्यता थी ।

हरिदास: पुलिस बड़े सवेरे धान की गाड़ियां लेकर पार्क में आती और जो भगोड़े किशोर पार्क में सोते होते, उन्हें पकड़ कर उनके घर भेजने की कोशिश करती। हिप्पियों को यथासंभव हर सहायता की जरूरत थी, और वे इसे जानते थे। और राधा-कृष्ण मंदिर उनके लिए निश्चय ही एक प्रकार का आध्यात्मिक आश्रयस्थल था। किशोरों को इसका आभास हो गया था। वे अपने घरों से भाग रहे थे, सड़कों में रह रहे थे। उनके लिए कोई स्थान नहीं था जहाँ वे जा सकते थे, जहाँ वे विश्राम कर सकते थे, जहाँ कोई उन्हें क्षति नहीं पहुँचा सकता था। बहुत सारे किशोर वास्तव में मंदिर में आ टपकते थे। मैं समझता हूँ, मंदिर ने बहुतों की जान बचाई; यदि हरे कृष्ण आंदोलन न होता तो कहीं अधिक दुर्घटनाएँ होतीं। यह ऐसा ही था मानो युद्धस्थल में मंदिर खुल गया हो। मंदिर के लिए सैन फ्रांसिस्को सबसे कठिन स्थल था, लेकिन यह ऐसा स्थल था जहाँ मंदिर की सबसे अधिक आवश्यकता थी। यद्यपि ऐसी स्थिति से निपटने के लिए स्वामीजी के सामने कोई पूर्व-दृष्टान्त नहीं था, किन्तु उन्होंने हरे कृष्ण के जप का प्रयोग आश्चर्यजनक परिणामों के साथ किया। जप अद्भुत था। वह सफल रहा।

श्रील प्रभुपाद जानते थे कि केवल कृष्णभावनामृत सहायक हो सकता है। औरों के पास भी उनके उपाय थे, किन्तु प्रभुपाद उन्हें जोड़-जाड़ समझते थे । वे जानते थे कि अज्ञानवश आत्मा को शरीर समझना ही दुख का असली कारण है। दूसरों की तो बात ही क्या, कोई अपनी सहायता कैसे कर सकता यदि उसे यही मालूम न हो कि वह कौन है या यदि वह यह नहीं जानता कि शरीर वास्तविक आत्मा का केवल परिधान है, जो केवल अपने प्राकृत रूप में अर्थात् कृष्ण के शाश्वत सेवक के रूप में, ही सुखी रह सकता है ?

यह समझते हुए कि भगवान् कृष्ण हर एक को, जो उनकी शरण में जाता है, सच्चरित्र मानते हैं और उसकी अल्प भक्ति-सेवा भी व्यर्थ नहीं जाती और मृत्यु के समय उसे बचा सकती है, प्रभुपाद ने अपना दरवाजा हर एक के लिए, यहाँ तक कि सबसे अधम भगोड़े के लिए भी खोल दिया था। परन्तु किसी पतित आत्मा को कृष्णभावनामृत का लेप पूरी मात्रा में प्राप्त हो, इसके लिए जरूरी था कि वह व्यक्ति मंदिर में कुछ समय तक रहे और हरे कृष्ण का जप करे, जिज्ञासु बने, सुने और अनुगमन करे ।

जैसा कि एलेन गिंसबर्ग ने एवलान में पाँच हजार हिप्पियों को बताया था, मंदिर का प्रात:काल का कीर्तन उन लोगों के लिए महत्त्वपूर्ण सामुदायिक सेवा प्रदान करता था जो एल. एस. डी. छोड़ रहे थे और “पुनः प्रवेश के लिए अपनी चेतना में स्थायित्व" लाना चाहते थे। एलन स्वयं भी कभी-कभी, अपने परिचितों सहित जिनके साथ वह रात-भर रहा होता, मंदिर में सवेरे टपक पड़ता ।

एलेन गिंसबर्ग : सवेरे साढ़े छह बजे हम स्वामी भक्तिवेदान्त के अन्तरिक्ष प्रयोगशाला में कीर्तन करने और कुछ कृष्णभावनामृत प्राप्त करने के लिए गए। वहाँ कोई तीस-चालीस लोग थे। सभी लोग नए सुर में, जिसे उन्होंने सवेरे की प्रार्थना के लिए विकसित किया था, हरे कृष्ण कीर्तन कर रहे थे। वहाँ का दृश्य देख कर एक छोकरा थोड़ी देर के लिए सनक में आया, लेकिन फिर वह ढीला पड़ गया और बाद में उसने मुझ से कहा :- आप जानते हैं, पहले तो मैने सोचा यह क्या है ? परन्तु अचानक मैने अनुभव किया कि मैं वहाँ ही चक्कर नहीं लगा रहा हूँ जहाँ पहले था। मैं वहाँ नहीं रह गया था, जहाँ मैं पहले था ।"

कभी - कभी ऐसा भी होता कि “ पुनः प्रवेशार्थी" आधी रात को भागते मंदिर में बलपूर्वक घुसने के लिए आ जाते। एक रात दो बजे, स्टोरफ्रंट में हुए सोये हुए लड़के दरवाजे पर खटखट के कारण जग गए, इसलिए कि उन्हें चीखना - चिल्लाना सुनाई दिया और पुलिस की लाइट दिखाई दी। जब उन्होंने दरवाजा खोला तो बिखरे हुए लाल बालों और दाढ़ी वाला एक हिप्पी अंदर लुढ़क पड़ा; वह चिल्ला रहा था, “ओ, कृष्ण, कृष्ण ! ओह सहायता करो। मुझे उनके हाथ न पड़ने दो। ओह, भगवान् के लिए मेरी सहायता करो। "

एक सिपाही ने सिर दरवाजे के अंदर किया और मुसकराया, “हमने इसे यहीं लाने का निर्णय किया था, " वह बोला, “क्योंकि हमने सोचा शायद आप लोग इसकी सहायता कर सकें। "

"मैं इस शरीर में सुखी नहीं हूँ,” सिपाहियों के दरवाजा बंद करने पर, लड़के ने कहा । वह जोर-जोर से जप करने लगा; उसका रंग सफेद पड़ गया; डर के मारे वह पसीने से तर हो गया। स्वामीजी के शिष्यों ने शेष प्रातः कालीन समय उसे सान्त्वना देने और उसके साथ जप करने में बिताया, जब तक कि स्वामीजी कीर्तन और कक्षा लेने के लिए नीचे नहीं आए ।

स्वामीजी के भक्त, दुखी युवा लोगों को उनकी समस्याओं के साथ प्राय: स्वामीजी के पास भेज देते। और वे प्राय: हर एक को स्वामीजी से मिलने और उनका बहुमूल्य समय लेने की अनुमति दे देते थे । सैन फ्रांसिस्को में घूमते हुए रवीन्द्र स्वरूप की भेंट एक ऐसे आदमी से हुई जिसका दावा था कि जब वह वियतनाम में नियुक्त था तब एक दिन अपने खेमे में उसने मंगलग्रह से आए लोगों को देखा था। उस आदमी ने, जो सैनिक अस्पताल से अभी छूट कर आया था, बताया कि मंगलग्रह के लोगों ने उससे बात की थी। रवीन्द्र स्वरूप ने उसे स्वामीजी की पुस्तक “ईजी जर्नी टू अदर प्लैनिट्स" के बारे में बताया। उस पुस्तक से अन्य ग्रहों पर जीवन होने के विचार की पुष्टि होती थी। उन्होंने कहा कि हो सकता है कि मंगलग्रह के लागों के बारे में स्वामीजी उसे और अधिक बता सकें। इसलिए वह व्यक्ति स्वामीजी से उनके कमरे में मिला। “हाँ,” स्वामीजी ने कहा, "मंगलग्रह पर प्राणी रहते हैं । "

धीरे-धीरे, प्रभुपाद के अनुयायी अपने आध्यात्मिक गुरु के विषय में अधिक सावधान हो गए और ऐसे व्यक्तियों से उन्हें बचाने लगे जिन्हें वे अवांछनीय समझते थे। ऐसा ही अवांछनीय एक व्यक्ति रैबिट था, जो हेट ऐशबरी में कदाचित् सबसे गंदा हिप्पी था। उसके बाल हमेशा बिखरे रहते थे, गंदे थे और यहाँ तक कि वे जुओं से भरे थे । उसके कपड़े चिथड़ों जैसे और गंदे थे और गंदगी से भरे उसके शरीर से बदबू आती थी । रैबिट प्रभुपाद से मिलना चाहता था, किन्तु उनके भक्तों ने मना कर दिया। वे नहीं चाहते थे कि रैबिट की घिनौनी और दुर्गंधमय उपस्थिति से प्रभुपाद का कमरा गंदा बने। लेकिन एक रात को प्रवचन के बाद रैबिट मंदिर के दरवाजे के बाहर इंतजार करता रहा । जब प्रभुपाद पास से निकले तो रैबिट बोल उठा, “क्या मैं ऊपर आकर आपसे मिल सकता हूँ ।" प्रभुपाद राजी हो गए।

जहाँ तक प्रभुपाद को चुनौती देने वालों का सम्बन्ध है, उनमें से कोई न कोई हर रात उनसे वाद-विवाद करने के लिए आ धमकता । एक व्यक्ति नियमित रूप से आने लगा । वह दर्शन - शास्त्र की एक पुस्तक से अपने तर्क तैयार करके आता और उन्हें जोर से पढ़ कर सुनाता । प्रभुपाद उसे पराजित कर देते, वह व्यक्ति घर लौट जाता, दूसरा तर्क तैयार करता और पुस्तक के साथ फिर आता । एक रात को जब वह व्यक्ति अपना तर्क प्रस्तुत कर चुका तब प्रभुपाद, उत्तर देने की चिन्ता किए बिना, उसकी ओर देखने लगे। प्रभुपाद की यह उपेक्षा उस व्यक्ति की एक और पराजय थी । वह उठा और चला गया ।

रैबिट की तरह का हैट ऐशबरी का एक दूसरा प्रसिद्ध व्यक्ति था इसरायल । उसने लम्बी चोटी रखी थी और कीर्तन के समय वह प्रायः तुरही बजाता था । एक दिन प्रभुपाद के संध्याकालीन व्याख्यान के बाद, इसरायल ने चुनौती दी, "यह जप अच्छा हो सकता है, किन्तु संसार को इससे क्या मिलेगा ? मानवता के लिए यह क्या करेगा ?"

प्रभुपाद ने उत्तर दिया, “क्या, तुम इस संसार में नहीं हो ? यदि यह तुम्हें पसंद है तो दूसरे पसंद क्यों नहीं करेंगे ? इसलिए और जोर से जप करो। "

एक मूँछ वाला आदमी, जो कमरे के पिछले भाग में खड़ा था, बोला, " क्या आप एलेन गिंसबर्ग के गुरु हैं ?" भक्तों में से बहुत से जानते थे कि प्रश्न कूट से भरा था और उसका हाँ या न में उत्तर देना कठिन होगा।

श्रील प्रभुपाद ने उत्तर दिया – “मैं किसी का गुरु नहीं हूँ। मैं हर एक का सेवक हूँ ।" भक्तों के लिए, स्वामीजी के इस उत्तर से, सारा वाद-विवाद आध्यात्मिक बन गया। स्वामीजी ने न केवल चातुर्यपूर्ण उत्तर दिया प्रत्युत यह उत्तर उनकी गहरी, सहज विनयशीलता से उद्भूत था ।

एक प्रातः एक दम्पति व्याख्यान सुनने आया । महिला एक बच्चा लिए थी और पुरुष की पीठ पर एक थैला था। प्रश्नोत्तर - काल में पुरुष ने पूछा, "मेरे दिमाग के बारे में आपका क्या कहना है ?" प्रभुपाद ने उसे दार्शनिक उत्तर दिए, लेकिन वह व्यक्ति पूछता ही रहा, “मेरे दिमाग के बारे में आपका क्या कहना है ?"

दया- भरी तर्कपूर्ण दृष्टि से उसे देख कर प्रभुपाद ने कहा, "मेरे पास अन्य कोई ओषधि नहीं है। हरे कृष्ण का जप करो। मेरे पास अन्य कोई व्याख्या नहीं है, अन्य कोई उत्तर नहीं है । '

लेकिन वह व्यक्ति अपने दिमाग के बारे में बात करता ही रहा। अंत में एक भक्त महिला ने हस्तक्षेप करते हुए कहा, “ वे जो कुछ कह रहे उसे करो । कोशिश करके देखो।" और प्रभुपाद ने अपने मंजीरे उठा लिए और वे कीर्तन करने लगे ।

एक दिन शाम को एक लड़का व्याख्यान के बीच टूट पड़ा और चिल्लाया कि हैट स्ट्रीट में दंगा होने वाला है। उसने कहा कि स्वामीजी को तुरन्त वहाँ जाना चाहिए, भीड़ को सम्बोधित करना चाहिए और हर एक को शांत करना चाहिए। मुकुंद ने स्पष्ट करते हुए बताया कि स्वामीजी के लिए वहाँ जाना आवश्यक नहीं है; अन्य लोग सहायता कर सकते हैं। लड़का प्रभुपाद को घूर रहा था मानो उन्हें अल्टीमेटम दे रहा हो कि : यदि स्वामीजी वहाँ तुरन्त नहीं पहुँचते, तो दंगा हो जायगा और इसका दोष स्वामीजी पर होगा । प्रभुपाद इस तरह बोले मानो वे लड़का जो चाहता था उसे करने की तैयारी कर रहे हों, “हाँ, मैं तैयार हूँ।” किन्तु वहाँ कोई नहीं गया और कोई दंगा नहीं हुआ ।

कीर्तन के बीच एक नर्तक आमतौर से आत्मरति और अहंमन्यता प्रदर्शित करता और इतना कामुक बन जाता कि स्वामीजी को उसे रोक देना पड़ता । एक दिन संध्या - समय श्रील प्रभुपाद के अपने कमरे से नीचे आने के पहले मिनी स्कर्ट पहने हुए एक लड़की कीर्तन के बीच अपने शरीर को तोड़ते-मरोड़ते हुए चक्कर लगाने लगी। जब एक भक्त ऊपर गया और प्रभुपाद को बताया तो उन्होंने जवाब दिया, “ठीक है, उसे अपनी ऊर्जा का इस्तेमाल कृष्ण के लिए करने दो। मैं अभी आ रहा हूँ, तब स्वयं देखूँगा ।" जब प्रभुपाद आए और दूसरा कीर्तन शुरू किया तो वह लड़की, जो बहुत दुबली-पतली थी, फिर उसी तरह करने लगी, प्रभुपाद ने अपने नेत्र खोले और उसे देखा । वे क्रोधित हो उठे और अपनी अप्रसन्नता प्रकट करते हुए अपने कुछ शिष्यों की ओर देखा । लड़की को अलग ले जाकर एक महिला ने उसे बाहर कर दिया ।

कुछ देर के बाद लड़की वापस आई; तब वह ढीला पाजामा पहने थी, और कुछ अधिक गंभीर शैली में नृत्य करने लगी ।

प्रभुपाद अपने मंच पर बैठे हुए, भरे सदन को सम्बोधित कर रहे थे। तभी एक मोटी लड़की जो, खिड़की के निकट वाली सीट पर बैठी थी, उठ खड़ी हुई और चिल्ला कर बोली, “क्या आप वहाँ बैठे ही रहेंगे ?” फिर चिल्लाई, " अब आप क्या करने जा रहे हैं ? बताइए । क्या आप कुछ कहने जा रहे हैं? आप क्या करना चाहते हैं ? आप कौन हैं ?” उसका रवैया इतना आकस्मिकतापूर्ण और आवाज इतनी तीखी थी कि मंदिर में किसी ने उसको उत्तर नहीं दिया । प्रभुपाद, बिना किसी आवेश के, शान्त बैठे रहे। वे दुखी लग रहे थे। जो भक्त उनके बिल्कुल पास बैठे थे, उन्होंने उन्हें मंद आवाज में, मानो स्वयं से, कहते हुए सुना, "यह निमिरतम अंधकार है। "

एक अन्य रात, जब प्रभुपाद व्याख्यान दे रहे थे, एक लड़का मंच पर पहुँचा और उनकी बगल में बैठ गया। लड़का श्रोताओं की ओर मुँह करके हस्तक्षेपपूर्वक बोला - " मैं अभी कुछ कहना चाहता हूँ ।"

प्रभुपाद ने नम्रता से कहा, " व्याख्यान के अंत तक रुक जाओ। उसके बाद प्रश्नोत्तर होते हैं । "

लड़का मंच पर बैठा हुआ कुछ देर इंतजार करता रहा। प्रभुपाद व्याख्यान देते रहे। तब लड़के ने फिर हस्तक्षेप किया, “मुझे कुछ कहना है। मुझे जो कुछ कहना है उसे मैं अभी कहना चाहता हूँ।” सभा में बैठे भक्त आश्चर्य से भर कर देखते रहे। वे सोच रहे थे कि प्रभुपाद स्थिति सँभाल लेंगे। वे स्वयं बोल कर गड़बड़ी नहीं पैदा करना चाहते थे। उनमें से किसी ने कुछ नहीं किया। वे केवल बैठे रहे, जबकि लड़का असम्बद्ध शैली में बोलने लगा ।

प्रभुपाद ने अपने मंजीरे उठा लिए। “ठीक है, हम लोग कीर्तन करें। " कीर्तन के दौरान लड़का उसी स्थान पर बैठा रहा । सनकी जैसा वह लड़का कभी-कभी प्रभुपाद पर धमकी - भरी दृष्टि डालता रहा। आधे घंटे के बाद कीर्तन समाप्त हो गया।

प्रभुपाद ने एक सेब के कई टुकड़े किए, जैसा कि उनका नियम था । तब उन्होंने फल काटने के चाकू और सेब के एक टुकड़े को अपने दाहिने हाथ में रखा और उसे लड़के की ओर बढ़ाया। लड़के ने प्रभुपाद को देखा, फिर चाकू को और उस सेब के टुकड़े को । कमरे में शान्ति हो गई। प्रभुपाद बिना हिलेडुले बैठे थे, लड़के पर मंद मुसकाते हुए। लम्बे, तनावपूर्ण क्षणों के बाद लड़के ने हाथ बढ़ाया। सभा ने शान्ति की सांस ली, जब लड़के ने स्वामीजी के खुले हाथ से सेब का एक टुकड़ा उठाया ।

हरिदास: मैं देखा करता था कि स्वामीजी घटनाओं को कैसे संभाला करते थे। यह आसान काम नहीं था। मेरे लिए यह उनकी शक्ति और समझ की असली परीक्षा थी कि लोगों से कैसे निपटा जाय जिससे कोई खिन्न न हो, नाराज ना हो या उत्पात करने पर उतारू न हो जाय। वे उनकी ऊर्जा को दूसरी ओर इस तरह मोड़ देते थे कि जब तक उन्हें इसका पता लगे वे शांत हो जाते थे; जैसे एक बच्चे की पीठ थपथपाने से उसका सेना बंद हो जाता है। स्वामीजी का अपना ढंग था। वे अपने शब्दों से, अपनी आवाज़ से धैर्य से काम लेकर लोगों को कुछ समय तक जैसा वे चाहते थे, करने देते थे । इस बीच उनका आवेश ठंडा पड़ जाता था। मेरी समझ में वे अनुभव करते थे कि उनके भक्तों में लोगों से यह कहने का साहस नहीं था कि, "जब आप मंदिर में आते हैं तो (शांतिपूर्वक) सुनिए; आप इस तरह का आचरण नहीं कर सकते।” वहाँ की स्थिति नाजुक थी।

प्राय: कोई न कोई कहता रहता, "मैं ईश्वर हूँ।” नशीले पदार्थों के सेवन से वे अन्तर्दृष्टि प्राप्त करने का दावा करते या माया-संसार में विचरते । वे लोक- प्रसिद्धि प्राप्त करने की कोशिश करते। वे चाहते थे कि लोग उन्हें सुने । स्वामीजी के विरुद्ध ऐसे ही लोगों के मन में क्रोध होता था । कभी-कभी थोड़ी देर के लिए वे प्रेरणापूर्ण और काव्यमय भाषा में बात करते, लेकिन बहुत देर तक वे ऐसा न कर पाते और आगे अनापशनाप बकने लगते। और स्वामीजी का काम केवल लोगों को शांत करना नहीं था। वे केवल लाड़-प्यार करना नहीं जानते थे । वे कहते, “तुम्हारा तात्पर्य क्या है ? यदि तुम ईश्वर हो तो तुम्हें सर्वज्ञ होना होगा। तुम्हें अपने में ईश्वर के लक्षण रखने होंगे। क्या तुम सर्वज्ञ हो, सर्वशक्तिशाली हो ?" इसके बाद वे उन सभी विशेषताओं को बताते जो अवतार या ईश्वर कहलाने के लिए किसी में होनी चाहिए। इस तरह तर्क द्वारा वे ईश्वर होने का दावा करने वाले व्यक्ति को गलत सिद्ध कर देते। उनके पास श्रेष्ठ ज्ञान था और तर्क द्वारा वे लोगों को समझा देते थे, यदि तुम ईश्वर हो तो क्या तुम यह कर सकते हो ? क्या तुम में यह शक्ति है? "

कभी कभी लोग इसे चुनौती मान लेते और स्वामीजी से वाग्युद्ध करने की कोशिश करते। तब उपस्थित लोगों का ध्यान उस व्यक्ति पर जाता जो गड़बड़ पैदा करने और इस प्रकार प्रसिद्धि प्राप्त करने में लगा होता । कभी कभी बड़ी कठिन स्थिति बन जाती। मैं वहाँ बैठा होता और आश्चर्य करता, “स्वामीजी इस व्यक्ति से कैसे निबटेंगे ? यह सचमुच एक समस्या बन गया है। किन्तु स्वामीजी हार नहीं मानते थे । यदि वे उस व्यक्ति को संतुष्ट नहीं कर पाते थे तो सभा में बैठे अन्य लोगों को संतुष्ट कर लेते थे। इससे परिणाम यह होता था कि अन्य लोगों की शक्ति उस व्यक्ति को शान्त करने में लग जाती थी । स्वामीजी सभा को अपने वश में यह सिद्ध करके कर लेते थे कि उस व्यक्ति को मालूम नहीं कि वह क्या बात कर रहा है। और वह व्यक्ति जान जाता था कि कमरे की हवा बदल गई है; लोग उसकी बात नहीं सुन रहे हैं, या उसमें उन्हें विश्वास नहीं है। और इसलिए वह चुप हो जाता ।

इस तरह स्वामीजी किसी व्यक्ति को नहीं, पूरी श्रोता - मंडली को अपने वश में कर लेते थे । वे किसी व्यक्ति को पराजित करके ऐसा नहीं करते थे । वे अपनी श्रेष्ठ बुद्धि से ऐसा करते थे, पर उस बुद्धि के साथ उनकी सहानुभूति भी मिली होती थी। जब मैं उन्हें यह करते देखता तो मुझे अनुभूति होती कि वे एक महान् शिक्षक हैं और एक महान् मानव । उनमें ऐसी संवेदना थी कि वे न तो किसी व्यक्ति को शारीरिक कष्ट पहुँचाते थे और न उसे मन से दुखी बनाते थे। इसलिए जब वह व्यक्ति बैठ जाता था और चुप हो जाता था तो ऐसा वह हार मान कर या क्रोध में नहीं करता था; वह दुखी नहीं अनुभव करता था । केवल वह स्वामीजी से मात खा गया होता था।

श्रील प्रभुपाद जब अपने कमरे में एकान्तमें बैठे अनुवाद - कार्य में लगे होते थे, उस समय भी गड़बड़ियों से उनके कार्य में बाधा पड़ती रहती थी । एक बार बगल की इमारत में स्थित डिगर स्टोर में हेल एंजेल्स ने लड़ाई शुरू कर दी, तो पुलिस और ऐम्बुलेंस की गाड़ियाँ भोंपू बजाती और बत्तियाँ चमकाती हुई स्वामीजी की खिड़की के नीचे आकर खड़ी हो गईं ।

एक दूसरे अवसर पर, रात में डेढ़ बजे, जब स्वामीजी 'टीचिंग्स आफ लार्ड चैतन्य' लिखा रहे थे एक लड़की बार-बार उनका दरवाजा खटखटा रही थी और उन्हें बुला रही थी। पहले तो उन्होंने इस अवरोध की अवहेलना की । सैन फ्रांसिस्को में पहुँचने के बाद से उन्होंने इस महत्त्वपूर्ण पुस्तक के कई पृष्ठ पूरे कर दिए थे। रूप गोस्वामी और सनातन गोस्वामी, रामानन्द राय और अन्यों के साथ भगवान् चैतन्य के विचार-विनिमय से कृष्ण - चेतना के बहुत से ऐसे प्रकरणों की पूरी छानबीन हो गई थी जिनका भगवत्गीता में केवल संक्षिप्त उल्लेख है। पाश्चात्य देशों में भगवान् चैतन्य की इन शिक्षाओं के बारे में प्राय: कोई नहीं जानता था, और अब श्रील प्रभुपाद का इरादा था कि इन शिक्षाओं का संग्रह एक ग्रंथ में कर दिया जाय, जिससे भक्ति योग पर अंग्रेजी में पूरी सामग्री प्राप्त हो जाय जो पहले कभी नहीं हुई थी । ऐसे ग्रंथ से कृष्णभावनामृत-आंदोलन को बड़ा बल मिलेगा । किन्तु उनकी एकान्त एकाग्रता में एक स्त्री के उनका दरवाजा खटखटाने और उन्हें बुलाने से बाधा पड़ रही थी ।

अपने डेस्क से उठ कर प्रभुपाद सामने के कमरे में गए, परन्तु उन्होंने दरवाजा नहीं खोला - "कौन है ?"

एक युवती ने उत्तर दिया, “मैं आप से बात करना चाहती हूँ ।"

" बाद में सवेरे आओ।” – प्रभुपाद ने उससे कहा ।

वे जानते थे कि न्यू यार्क की तरह ही सैन फ्रांसिस्को में भी वे हमेशा शान्तिपूर्वक लिखने नहीं पाएँगे । अमेरिका में प्रचार करने का मतलब था कि ऐसे व्यवधानों को बर्दाश्त किया जाय - आधी रात में ऐसी सनक - भरी गुहारों को सुना जाय जिनसे भगवान् चैतन्य की लीलाओं में केन्द्रित आनन्दपूर्ण एकाग्रता भंग हो जाय । हैट ऐशबरी की पतित आत्माएँ धर्म ग्रंथों के अनुवाद और व्याख्या के उनके मिशन से उनका ध्यान हटा देती थीं—- ऐसी पतित आत्माएँ जिन्हें अपने ज्ञान का भ्रम था, जो सहायता के लिए रुदन करती थीं और दंभपूर्ण चुनौतियाँ लेकर प्रभुपाद के सामने उपस्थित होती थीं। इस समय अपने कमरे में अकेले खड़े स्वामीजी, बंद दरवाजे से, उस बिन बुलाये आने वाली लड़की से कह रहे थे कि उन्हें कार्य करना है और वह चली जाय। उन्होंने वादा किया कि वे बाद में, दिन में, उससे मिलेंगे।

वे हिप्पियों से दिन-भर मिलने को तैयार थे, लेकिन सवेरे का समय साहित्यिक कार्य के लिए उनका विशेष समय था । बद्ध- आत्माओं को आमने-सामने उपदेश देना महत्त्वपूर्ण था; वे यहाँ प्रचार करने के लिए ही आए थे। किन्तु उन्होंने सवेरे की इन घड़ियों को, अपनी पुस्तकों के माध्यम से, बिना किसी बाधा के, सारे संसार से अंतरंग बात करने के लिए अलग कर रखा था ।

परन्तु वह लड़की दरवाजे पर दस्तक देती रही, और बुलाती रही। अंत में प्रभुपाद को दरवाजा खोलना पड़ा। गलियारे में खड़े हुए उन्होंने एक युवती हिप्पी को देखा, उसकी आँखें कांच सदृश थीं और वेश - विन्यास अस्तव्यस्त था। उन्होंने पूछा कि वह क्या चाहती थी । तनाव भरी वह मौन बनी रही । " बोलो,” उन्होंने कहा । वह उनके कमरे में घुस गई। उन्होंने देखा कि वह असहाय है— माया के सागर में फँसी हुई। उन्होंने उससे बार-बार पूछा कि वह क्या चाहती थी। अंत में लड़की ने आंखें फाड़ कर उन्हें घूर कर देखा और चिल्लाई — " लूक! महा उला !"

प्रभुपाद ने मुकुंद को जगाने का निश्चय किया, जो हाल के नीचे वाले कमरे में रहता था । वे नंगे पैर गलियारे में आए। लड़की उनके पीछे चल रही थी; उसने अपना दरवाजा बंद कर दिया जिसमें ताला अपने-आप लग जाता था। अब प्रभुपाद अपने कमरे से बाहर बंद थे। लड़की अवज्ञापूर्वक उन्हें घूर रही थी— रात के एक बजे, उस खाली अजनबी गलियारे में जिसकी दोनों ओर ताले पड़े थे ।

यही कारण था कि वृन्दावन के बाबा लोग भगवान् का पवित्र नाम जपते हुए अधार्मिकों से होने वाली परेशानियों से बचने के लिए अपनी छोटी कुटियों में रहते थे। ( बाबा लोग स्वप्न भी नहीं देख सकते थे कि सैन फ्रांसिस्को के विचित्र विक्षिप्तों जैसे लोगों की घुसपैठ का उन्हें रात के समय सामना करना पड़ेगा । )

मुकुंद के दरवाजे को प्रभुपाद जोर से पीटने लगे और उसे बुलाने लगे, "मुकुंद, मुकुंद !” मुकुंद जग गया और उसने दरवाजा खोला। उसे आश्चर्य हुआ कि उसके गुरु महाराज नंगे पैर गलियारे में खड़े हैं और विस्फारित नेत्रों वाली एक लड़की उन से कुछ फुट पीछे खड़ी है। तब भी प्रभुपाद गंभीर और निस्संग बने रहे। " यह लड़की मेरे दरवाजे पर आई,” उन्होंने कहा। फिर उन्होंने जो कुछ हुआ था और अब जो करना चाहिए, उसे बताया । वे लड़की से कुद्ध या परेशान नहीं लग रहे थे और उन्होंने कहा कि मुकुंद को उसके साथ दया का बर्ताव करना चाहिए ।

मुकुंद को याद आया जब प्रभुपाद को न्यू यार्क बोवरी लाफ्ट से उनके सहवासी डेविड एलेन ने, जो एल. एस. डी. के कारण पागल हो गया था, निकाल दिया था। तब भी प्रभुपाद शान्तचित्त बने रहे थे, यद्यपि वे उस समय बहुत खतरनाक और बेढंगी परिस्थिति में पड़ गए थे। मुकुंद नीचे गए और हयग्रीव को जगाया जिसके पास प्रभुपाद के कमरे की कुंजी थी । तब श्रील प्रभुपाद अपने कमरे में लौट गए और 'टीचिंग्स आफ लार्ड चैतन्य' लिखने लगे।

मुकुंद लड़की को नीचे ले जाकर सड़क पर छोड़ आया और उसे ताड़ना दी कि स्वामीजी जैसे एक वयोवृद्ध सज्जन को ऐसे समय में परेशान नहीं करना चाहिए। मुकुंद को घूरती हुई वह बोली, “तुम तैयार नहीं हो, ” और चली गई।

जब सात बजे सवेरे प्रभुपाद प्रात: कक्षा के लिए नीचे मंदिर में आए तो वह लड़की श्रोता - मंडली के बीच वहाँ शान्तचित्त बैठी थी । उसने क्षमा-याचना की। बाद में दिन में प्रभुपाद ने विनोदपूर्वक उसकी कहानी को दुहराया, और बताया कि किस प्रकार उन्होंने बार-बार उससे बोलने को कहा था । उसकी मुद्रा का अनुकरण करते हुए, उन्होंने अपनी आँखें विस्फारित की और कहा, "लूक! महा उला !" और हँस पड़े।

***

" हम साढ़े छह बजे घूमने जायँगे।” एक दिन सवेरे श्रील प्रभुपाद ने कहा, “तुम मुझे पार्क तक गाड़ी में ले जा सकते हो। "

कई भक्त गोल्डन गेट पार्क की स्टोव झील तक उनके साथ गए । वे उस पार्क से अच्छी तरह परिचित थे और श्रील प्रभुपाद और श्रील प्रभुपाद को सुंदर झील की चारों ओर घुमाते हुए, पुल के ऊपर से जंगल से घिरे हुए मार्गों से होते हुए, एक छोटी नदी के उस पार तक ले गए। उन्हें आशा थी कि प्रभुपाद प्रकृत्ति के सौन्दर्य - दर्शन से प्रसन्न होंगे।

जब वे तेजी से चल रहे थे तो बीच बीच में किसी वृक्ष की ओर संकेत करने या किसी फूल का परीक्षण करने के लिए वे रुक जाते थे । " यह कौन - सा पेड़ है ?" वे पूछते, "यह कौन - सा फूल है ? ” यद्यपि उनके शिष्यों के पास प्रायः इन प्रश्नों के उत्तर न थे । “जब चैतन्य महाप्रभु वृन्दावन के जंगल में से होकर निकलते, ” उन्होंने कहा, " तो सभी पौधे, वृक्ष और लताएँ उन्हें देख कर प्रसन्न हो जाते और उनकी उपस्थिति से आनन्द - विह्वल हो उठते । वहाँ पेड़-पौधों का जीवन भी आध्यात्मिक आकाश जैसा ही था — पूर्ण चेतन ।

" और ये वृक्ष, स्वामीजी — ये कितने चेतन हैं ? "

"ओह, जीवात्मा यहाँ भी है।" प्रभुपाद ने कहा, “किन्तु चेतना अस्थायी रूप से अवरुद्ध है। बोध अधिक सीमित है । '

प्रभुपाद जिस चीज पर भी दृष्टिपात करते थे उसे शास्त्र की दृष्टि से देखते थे और सर्व साधारण चीजों पर उनकी टिप्पणी दिव्य शिक्षा से पूर्ण होती थी । चलते-चलते उन्होंने ऊँचे स्वर में चिन्तन किया, "जो लोग ईश्वर को देखना चाहते हैं उन्हें पहले ईश्वर को देखने के गुण अपने में विकसित करने चाहिए। उनका परिष्कार होना जरूरी है। जैसे अभी बादल सूर्य को आच्छादित किए है। वे कहते हैं, “ओह ! सूर्य नहीं निकला है। " किन्तु सूर्य निकला है, केवल हमारे नेत्र ढंके है।

पथ - दर्शकों की भाँति वे लड़के प्रभुपाद को और अधिक सुंदर क्षेत्रों में ले गए। वे वहाँ पहुँचे जहाँ हंस झील में तैर रहे थे । " श्रीमद्भागवत,' ने कहा, प्रभुपाद " भक्तों की तुलना हंसो से करता है और भगवान् कृष्ण के साहित्य की तुलना सुन्दर स्वच्छ झीलों से।” उन्होंने कहा कि जो भक्त नहीं हैं वे कौवों की तरह हैं; वे सांसारिक विषय रूपी कूड़े-कचरों से आकृष्ट होते हैं। एक कंकरीले मार्ग पर चलते हुए वे रुक गए और उन्होंने लड़कों का ध्यान आकृष्ट किया, “इन कंकड़ियों को देखो। जितनी कंकड़ियां यहाँ हैं, उतने ही ब्रह्मांड हैं। और हर ब्रह्मांड में असंख्य जीव रहते हैं । "

भक्तों को, स्वामीजी को एक घाटी में ले जाने में, बड़ी प्रसन्नता हुई; इसकी झाड़ियाँ सफेद और पीले फूलों से पूरी तरह आच्छादित थीं । वे अपने को सौभाग्यशाली समझ रहे थे कि वे कृष्ण को स्वामीजी की दृष्टि से देख पा रहे हैं।

दूसरे दिन सवेरे जब प्रभुपाद ने पार्क में फिर जाना चाहा तो उनके साथ और अधिक भक्त हो लिए; उन्होंने औरों से सुन रखा था कि टहलते समय स्वामीजी किस तरह भिन्न प्रकार की चित्तवृत्ति प्रदर्शित करते हैं। लड़के उन्हें झील की चारों ओर नए मार्गों से ले जाने के लिए फिर तैयार किन्तु अपनी योजनाओं में किसी परिवर्तन की घोषणा किए बिना वे पक्की सड़क पर झील के निकट घूमते रहे ।

प्रभुपाद और उनके अनुयायी सोती हुई बत्तखों के एक झुंड के पास पहुँचे। लोगों के चलने की आवाज से जग कर बत्तखे कां-कां करने लगी, पंख फड़फड़ाने लगीं और वहाँ से जाने लगीं। जब कुछ भक्त बत्तखों को प्रभुपाद के मार्ग से भगाने के लिए जल्दी से आगे बढ़े तो बत्तख खीज और नाराजगी की आवाज करने लगीं। "बत्तखों, रास्ते से हट जाओ,' एक भक्त ने कहा, “तुम लोग स्वामीजी को परेशान कर रही हो ।” प्रभुपाद ने शान्त भाव से कहा, “जैसे हम सोच रहे हैं कि वे हमें बाधा पहुँचा रही हैं, वैसे ही वे सोच रही हैं कि हम उनके लिए बाधक हो रहे हैं । "

प्रभुपाद एक बड़े पेड़ के नीचे रुक गए और उन्होंने जमीन पर पड़ी " इसका क्या मतलब है ?" मुड़कर उन्होंने पूछा। प्रभुपाद "मैं... उह... मैं नहीं जानता कि कुछ चिड़ियों की बीट की ओर संकेत किया । अपनी बगल में खड़े एक नए लड़के की ओर का चेहरा गंभीर था । लड़का शरमा गया, इसका क्या मतलब है ।" प्रभुपाद गंभीर बने रहे, वे उसकी व्याख्या की प्रतीक्षा में थे। भक्त उनकी चारों ओर जमा हो गए। बीट को ध्यानपूर्वक देखते हुए लड़के ने सोचा कि स्वामीजी बीटों की शकल में छिपा कोई गुप्त अर्थ उससे जानने की आशा कर रहे होंगे, जैसे लोग चाय की पत्तियों में भविष्य की बातें पढ़ते हैं । उसे लगा कि उसे कुछ कहना चाहिए । “ यह... उंह... मल है, चिड़ियों की बीट ।” प्रभुपाद मुसकराए और अन्य लोगों की ओर उत्तर के लिए मुड़े। सब मौन थे ।

" इसका मतलब है, " प्रभुपाद ने कहा, "कि ये चिड़ियाँ इसी पेड़ में दो सप्ताह से अधिक समय से रह रही है।" वे हँसे, “चिड़ियाँ भी अपने निवास स्थान से अनुराग रखती हैं। "

जब प्रभुपाद शफलबोर्ड कोर्ट और चेकर्स आदि खेल खेलते हुए बुड्ढों के पास से गुजरे तो वे रुक गए और लड़कों की ओर मुड़े, “जरा देखो । " उन्होंने कहा, "इस देश में वृद्ध लोग नहीं जानते कि वे क्या करें। इसलिए वे बच्चों की तरह खेलते हैं और अपने अंत के दिन व्यर्थ खोते हैं जिनका उपयोग कृष्णभावनामृत के विकास में होना चाहिए। उनके बच्चे बड़े होकर चले गए हैं, इसलिए आध्यात्मिक विकास करने का उनके लिए यह उपयुक्त समय है। लेकिन नहीं, वे कोई बिल्ली या कुत्ता रख लेते हैं और ईश्वर की सेवा के बदले बिल्ली - कुत्ते की सेवा करते हैं। यह बड़ा ही दुर्भाग्यपूर्ण है, पर वे सुनेंगे नहीं। उनके मार्ग निश्चित हो चुके हैं। इसलिए हम युवकों से बात कर रहे हैं, जो खोज के मार्ग में हैं। "

जब प्रभुपाद और लड़के केजर ड्राइव के पास एक ढ़लान वाले हरे मैदान से गुजर रहे थे तो लड़कों ने उन्हें दिखाया कि प्रसिद्ध हिप्पी हिल यही है। प्रातः काल की बेला में मंद ढालू पहाड़ी और यूक्लीप्टस और बांज के वृक्षों से घिरा शान्त घास का मैदान उस समय नीरव और निस्तब्ध था। लेकिन कुछ घंटों में सैंकड़ों हिप्पी उस घास पर इकठ्ठे हो जायँगे, मित्रों से मिलेंगे और तरंग में झूमेंगे। प्रभुपाद ने लड़कों को वहाँ जाकर कीर्तन करने का उपदेश दिया ।

 
 
 
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