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श्रील प्रभुपाद लीलमृत  »  अध्याय 37: एक मंदिर हो  » 
 
 
 
 
 
कलकत्ता

मार्च १९७१

आधी रात का समय था । प्रभुपाद अपनी नीची चौकी के पीछे गद्दी पर बैठे थे। इमारत में केवल उन्हीं के कमरे में बत्ती जल रही थी । अन्य सभी भक्त सो रहे थे। उनके सामने की चौकी पर डिक्टेशन रिकार्ड करने वाली एक मशीन पड़ी थी तथा बंगाली - व्याख्या युक्त श्रीमद्भागवत का एक खण्ड रखा था। उनके आध्यात्मिक गुरु महाराज भक्तिसिद्धान्त सरस्वती का एक छोटा-सा फ्रेम किया हुआ चित्र, गुलाब और ऐस्टर से सजे दो छोटे फूलदानों के बीच विराज रहा था। चौकी के सामने फर्श पर एक चौड़ी चटाई बिछी थी जो सफेद चादर से आच्छादित थी और जिस पर अभी कुछ घंटे पूर्व भक्तजन और अतिथि बैठे थे।

किन्तु अब प्रभुपाद अकेले थे। यद्यपि वे सामान्यतः दस बजे सो जाते थे और तीन या चार घंटे बाद उठ कर अनुवाद - कार्य में लग जाते थे, लेकिन आज रात उन्हें विश्राम नहीं मिला और उनकी भागवत् की पुस्तक बन्द पड़ी रही। उनकी डिक्टेटिंग मशीन ढकी रखी रही।

उन्होंने अपने दो शिष्यों, तमाल कृष्ण और बलिमर्दन, को मायापुर में जमीन खरीदने के लिए भेजा था। छह दिन बीत गए थे, किन्तु वे अभी तक न तो लौटे थे न ही उन्होंने कोई संदेश भिजवाया था। स्वामीजी ने उनसे तब तक न लौटने को कहा था जब तक सौदा तय न हो जाय। किन्तु छह दिन का समय आवश्यकता से अधिक था। वे चिन्तित थे और निरन्तर अपने शिष्यों के विषय में सोच रहे थे।

मंद समीर आया और अपने साथ खुली खिड़की से नीम-वृक्षों की सुगंधि ले आया। रात ठंडी होती जा रही थी और प्रभुपाद ने अपने कंधों के चारों ओर एक हल्की चादर ओढ़ ली थी। वे विचार मग्न थे और सफेद मसनद के सहारे बैठे हुए थे । उनको कमरे के परिचित दृश्यों का +कोई ध्यान नहीं था । उनकी बगल में पीने के पानी का एक मिट्टी का लोटा रखा था और छोटा-सा तुलसी का बिरवा लकड़ी की छोटी चौकी पर पड़ा था। बिजली, जो दिन-रात के अधिकांश भाग में गायब रहती थी, उस समय चालू थी और सिर के ऊपर लटके खुले बल्ब की चारों ओर कीट-पतंग मंडरा रहे थे। एक छिपकली छत में चक्कर लगा रही थी, और कभी-कभी कोई कीड़ा पकड़ने के लिए बल्ब की रोशनी की ओर तेजी से भाग पड़ती थी ।

तमाल कृष्ण और बलिमर्दन इतना समय क्यों लगा रहे थे ? बात छह दिनों से प्रतीक्षा करने से कहीं अधिक की थी; वे मायापुर में जमीन प्राप्त करने का प्रयत्न वर्षों से करते आ रहे थे। और इस बार संभावनाएँ सबसे ज्यादा थीं । उन्होंने तमाल कृष्ण और बलिमर्दन को अच्छी तरह समझाकर भेजा था, और अब तक उन्हें लौट आना चाहिए था । विलम्ब का अर्थ कुछ समस्या या जोखिम भी हो सकता था ।

जिस भूमि खण्ड के लिए वे प्रयत्न कर रहे थे वह नौ बीघे का मैदान, भक्तिसिद्धान्त मार्ग पर, महाप्रभु चैतन्य के जन्मस्थान से एक मील से कम दूरी पर था । मुस्लिम किसान, शेख - बन्धु, जो उस भूमि खण्ड के मालिक थे, ऊँचे दाम माँग रहे थे। हाल ही में कलकत्ता के एक वकील, जो नवद्वीप से परिचित थे, उचित मूल्य पर सौदा करने में सफल हुए थे । शेख - बन्धु १४,५०० रु. में मान गए थे और प्रभुपाद ने कृष्णनगर स्थित अपने बैंक से इस राशि को निकाले जाने की अनुमति दे दी थी। इस प्रकार तमाल कृष्ण और बलिमर्दन मायापुर के लिए रवाना हो गए थे जब कि प्रभुपाद कलकत्ते में ही अपना कार्य करते रहे; वे मायापुर गए हुए अपने शिष्यों की गतिविधियों के विषय में प्रायः सोचते रहते। उनका कार्य प्रभुपाद के लिए अत्यन्त महत्त्वपूर्ण था, वे बराबर उनके मन में बने रहते और प्रभुपाद अपने कार्य के बारे में उन्हें आशीर्वाद देते रहते।

प्रभुपाद मायापुर में इस्कान का एक केन्द्र चाहते थे, यह ऐसी इच्छा थी जो उनके आन्दोलन के बढ़ने के साथ सालों से तीव्र होती आई थी। वे मायापुर आसानी से जा सकते थे और वहाँ रह सकते थे; यह कोई समस्या नहीं थी । किन्तु वे अपने शिष्यों के लिए एक स्थान चाहते थे। उनके गुरु महाराज ने उन्हें पश्चिम में धर्मोपदेश करने का आदेश दिया था; और अब कृष्णभावनामृत संघ की सफलता के साथ पश्चिम के वैष्णव मायापुर में एक केन्द्र चाहने लगे थे, जहाँ वे रह सकते थे, पूजा-अर्चना कर सकते थे और पवित्र धाम के भारी लाभ को प्राप्त कर सकते थे। भक्तिसिद्धान्त सरस्वती ने मायापुर के महत्त्व पर बहुत बल दिया था और उनके कुछ संन्यासी भक्तों के वहाँ मन्दिर थे । तो अन्तर्राष्ट्रीय कृष्णभावनामृत संघ भी मायापुर में शरण क्यों नहीं ले सकता था ?

प्रभुपाद जन्म से ही महाप्रभु चैतन्य और उनके धाम श्री मायापुर के महत्त्व से परिचित थे । वे कलकत्ता में बड़े हुए थे, जहाँ महाप्रभु चैतन्य के विषय में हर एक को मालूम था और चूँकि उनके पिता, गौरमोहन दे, महाप्रभु चैतन्य के शुद्ध भक्त थे, इसलिए बचपन से वे गौर - निताइ और गौड़ - प्रदेश में उनकी लीलाओं के विषय में बंगाली गीत गाया करते थे। उन्होंने महाप्रभु चैतन्य की शिक्षाओं और लीलाओं को, विशेष रूप में अपने गुरु महाराज से कलकत्ता में १९२२ ई. में मिलने के बाद, गहराई से आत्मसात् कर लिया था ।

महाप्रभु चैतन्य ने अपने जीवन के प्रथम चौबीस वर्ष मायापुर और कलकत्ता में बिताए थे। तब भी पाँच सौ वर्ष पूर्व की उनकी प्रत्यक्ष लीलाएँ और उन लीलाओं के स्थान धुंधले हो चले थे, उनके जन्मस्थान का पता नहीं रह गया था, उनकी शिक्षाओं के विषय में भ्रान्तियाँ होने लगी थीं और उनका दुरुपयोग होने लगा था । महाप्रभु चैतन्य से विशुद्ध शिष्य - परम्परा के चलते रहने पर भी, भक्तिसिद्धान्त सरस्वती के पिता श्री भक्तिविनोद ठाकुर के आविर्भाव होने तक महाप्रभु चैतन्य के संकीर्तन - आन्दोलन और शिक्षाओं के प्रसार का आरंभ नहीं हुआ । भक्तिविनोद ठाकुर ने चैतन्य वैष्णव धर्म की बौद्धिक, नैतिक और आध्यात्मिक अखण्डता की पुनः स्थापना के लिए कई ग्रंथ लिखे और प्रचार किया। उन्होंने शोध की और नवद्वीप क्षेत्र को खोज निकाला; इस प्रकार उन्होंने महाप्रभु चैतन्य के ठीक जन्मस्थान को सुनिश्चित किया । वैदिक साक्ष्यों के आधार पर उन्होंने सिद्ध किया कि विष्णु के कई पूर्व अवतारों ने अपनी लीलाएँ नवद्वीप में की थीं।

भक्तिविनोद ठाकुर ने नवद्वीप की केवल विगत महिमा के सम्बन्ध में ही साक्ष्य नहीं जुटाए, प्रत्यक्ष उसके भविष्य की महिमा के सम्बन्ध में भी उन्होंने भविष्यवाणी की, जब वहाँ महाप्रभु चैतन्य की शिक्षाओं पर आधारित धर्म का उद्भव होगा और उसका प्रसार समस्त विश्व में होगा, जब योरप और अमेरिका के वैष्णव अपने बंगाली बन्धुओं से मिल कर “जय शची - नन्दन ! का गायन करने के लिए नवद्वीप में भारी संख्या में एकत्र होंगे। भक्तिविनोद ठाकुर ने लिखा कि ऐसा समय आएगा, जब गंगाजी के मैदान में नवद्वीप - क्षेत्र में, समस्त संसार को महाप्रभु चैतन्य की महिमा का उद्घोष करते हुए, एक भव्य विशाल मंदिर का निर्माण होगा।

भक्तिसिद्धान्त सरस्वती ने अपने पिता और गुरु भक्तिविनोद ठाकुर की इच्छाओं की पूर्ति के लिए, महाप्रभु चैतन्य की शिक्षाओं और नवद्वीप धाम की महिमा के प्रचार के निमित्त गौड़ीय मठ का निर्माण किया था। उन्होंने एक धनाढ्य शिष्य को प्रेरित करके उसकी पूरी सम्पति से मायापुर में महाप्रभु चैतन्य के जन्मस्थान पर एक मंदिर का निर्माण कराया था, और महाप्रभु चैतन्य के कीर्तनों के स्थान पर स्मारक रूप में एक कीर्तन हाल बनवाया था। उन्होंने मायापुर में अपने लिए भी एक आवास बनवाया । उन्होंने समस्त देश में मंदिर बनवाए— जिनकी कुल संख्या चौंसठ थी । किन्तु, चूँकि वे चाहते थे कि विशेष रूप से अंग्रेजी भाषा-भाषी महाप्रभु चैतन्य के आंदोलन को स्वीकार करें, इसलिए प्रथम वरीयता के रूप में उन्होंने कृष्णभावनामृत साहित्य के प्रकाशन और वितरण पर बल दिया था ।

कलकत्ता के मंदिर में अपने कमरे में बैठे श्रील प्रभुपाद भक्तिसिद्धान्त सरस्वती और भक्तिविनोद ठाकुर की दूरदर्शिता से सहमत थे । किन्तु इन महान् कल्पनाओं को कार्यान्वित करने के लिए उन्हें व्यावहारिक कदम उठाने थे और वैसे कदम वे अत्यन्त विनम्र भाव से उठा कर संतुष्ट थे। किसी भक्त को केवल दिवास्वप्न नहीं देखना चाहिए, इस आशा में कि कृष्ण अपने चमत्कार से सब कुछ पूरा कर देंगे।

किन्तु प्रभुपाद केवल निष्क्रिय बने दिवास्वप्न नहीं देख रहे थे। भारत वर्ष में वर्षों से अकेले प्रयास करते हुए वे पश्चिम जाने की अपनी योजना पर अड़े रहे और कृष्ण ने अंत में उनकी इच्छा पूरी की थी। अमेरिका में परिस्थितियाँ जैसी भी रही हों और कृष्ण की कृपा से जो भी छोटी-मोटी सुविधाएँ प्राप्त हुईं, उनका उपयोग करते हुए उन्होंने धर्मोपदेश किया। और धीरे-धीरे, कदम- बकदम, उन्हें सफलता मिली। विश्वव्यापी भक्त संघ की महान् कल्पना को उन्होंने साकार किया था। एक-एक कदम करके वे निरन्तर आगे बढ़ते रहे थे, उत्तरोत्तर अधिक संतोष के साथ अपने महान् लक्ष्य की पूर्ति के निकटतर पहुँचते गए थे, और उन्होंने अपने महत्तर लक्ष्य की प्राप्ति के उद्देश्य को सदैव मन में बनाए रखा था ।

प्रभुपाद कभी-कभी एक गरीब कुम्हार की कहानी सुनाया करते जो अपना कारोबार बढ़ाकर आश्चर्यजनक धनाढ्य बनने का स्वप्न देखा करता था । एक रात कुम्हार सोते समय यह स्वप्न देख रहा था कि उसके पास कितनी भूमि और कितने मकान होंगे और कितनी सुंदर पत्नी होगी। जब कुम्हार को यह विचार आया कि उसकी पत्नी, हो सकता है, उससे झगड़ा करे तो उसे क्रोध आ गया और उसने कहा, “यदि मेरी पत्नी मुझसे लड़ाई करेगी तो मैं उसे ठोकर मार दूंगा ।" और ठोकर मारते हुए उसने अपने भंडार में बचे केवल दोनो बर्तनों को भी तोड़ डाला और इस तरह अकिंचन बन गया ।

कीर्तन करते हुए, लिखते हुए, पढ़ते हुए या धर्मोपदेश करते हुए — सब समय प्रभुपाद कृष्णभावनामृत के प्रचार और पूर्व आचार्यों के स्वप्न को पूरा करने की अपनी योजनाओं में डूबे रहते थे। अब वे अपना अगला कदम पूरा करने की चिन्ता में थे और इसके लिए आधी रात के बाद भी वे अपने दोनों शिष्यों और उनके महत्त्वपूर्ण मिशन पर ध्यान लगाए हुए उनकी प्रतीक्षा कर रहे थे।

जब प्रभुपाद इस तरह विचारों में मन बैठे थे तो जो एकमात्र ध्वनियां सुनाई पड़ती थीं, वे रात की सामान्य ध्वनियां थी : दीवालों के भीतर चूहे, बरामदे में खर्राटे भरता एक ब्रह्मचारी, और दूरी पर सड़क पर अपनी लाठी ठोकता गश्त लगाता रात का एक चौकीदार एक भी मोटर कार नहीं चल रही थी, और कभी-कभी केवल लकड़ी का रिक्शा टूटी-फूटी सड़क पर चरमराता सुनाई पड़ता ।

प्रभुपाद भयभीत थे कि लड़कों को किसी ने लूट तो नहीं लिया। जाने के पूर्व उन्होंने तमाल कृष्ण को सिखा दिया था कि किस प्रकार रुपयों को कपड़े की थैली में भर कर कमर में बाँधते हैं । किन्तु वह धनराशि काफी बड़ी थी और नवद्वीप के आसपास डकैतियाँ पड़ती ही रहती थीं । या फिर किसी अन्य कारण से विलम्ब हुआ हो। कभी - कभी जमीन के सौदों में, जिनमें भारी धनराशि निहित होती है, कचहरी चाहती है कि क्लर्क सारे नोटों के नम्बर तथा मूल्य लिखें। या हो सकता है कि ट्रेन में ही कोई गड़बड़ी हो गई हो ।

सहसा प्रभुपाद को जीने पर पदचाप सुनाई पड़ी। किसी ने बाहरी दरवाजा खोला और अब वह बाहर के बरामदे में से होकर चल रहा था। फिर एक हल्की दस्तक ।

"हां, कौन है ?" प्रभुपाद ने पूछा

तमाल कृष्ण ने प्रवेश किया और श्रील प्रभुपाद के समक्ष दण्डवत् गिर पड़ा ।

" तो फिर क्या खबर है ? " प्रभुपाद ने पूछा ।

तमाल कृष्ण ने विजयपूर्ण नेत्रों से देखा, और कहा, " जमीन आप की हो गई । "

प्रभुपाद ने उच्छ्वास भरते हुए पीछे टेक ली और कहा, "अच्छा, अब तुम आराम करो। "

***

लन्दन

अगस्त, १९७१

प्रभुपाद ने लंदन में भारतीय उच्चायुक्त से अनुरोध किया था कि वे मायापुर में होने वाले इस्कान के शिलान्यास समारोह में भाग लेने के लिए प्रधानमंत्री इन्दिरा गांधी तक उनकी प्रार्थना पहुँचा दें। प्रभुपाद ने पहले ही अपने समस्त जी. बी. सी. सचिवों को इस समारोह में सम्मिलित होने के लिए आदेश दे दिए थे और भक्तों को कहा था कि कलकत्ते के अनेक प्रमुख नागरिकों को आमंत्रित कर दें। उन्होंने भारत- स्थित अपने शिष्यों को लिखा था कि इंदिरा गांधी न आ सकें तो कम से कम बंगाल के राज्यपाल श्री एस. एस. धवन को तो अवश्य ही आमंत्रित कर लें ।

इस बीच प्रभुपाद लंदन में अपने अनेक शिष्यों से मिल रहे थे जो वस्तुकला और डिजाइन में अनुभवी थे; वे चाहते थे कि ये लोग मायापुर परियोजना के लिए रेखाचित्र बना दें। नर-नारायण ने रथ यात्रा के रथ बनाए थे और मंदिर के भीतरी भागों का डिजाइन बनाया था; रणछोड़ ने वास्तुशिल्प का अध्ययन ने स्वयं किया था और भवानन्द व्यावहारिक डिजाइन बनाता था । किन्तु प्रभुपाद ही मायापुर के भवनों की योजनाएँ बनाई थीं। तब उन्होंने अपने तीन सदस्यीय समिति को भवनों के रेखाचित्र और वास्तुकला का नमूना तैयार करने को कहा । वे तुरन्त इस योजना के लिए भारत में धन-संग्रह और सहायता प्राप्त करने का कार्य आरंभ करने वाले थे। जिन भक्तों ने प्रभुपाद की इस योजना के विषय में सुना उन्हें यह आज तक की इस्कान की योजनाओं में सर्वाधिक महत्त्वाकांक्षी योजना लगी ।

प्रात: काल रसेल स्क्वायर में घूमते समय प्रभुपाद विभिन्न भवनों को देखते और पूछते कि वे कितने ऊँचे होंगे। अंत में उन्होंने एक दिन प्रातः काल यह घोषित किया कि मायापुर का मुख्य मंदिर तीन सौ फुट से भी अधिक ऊँचा होना चाहिए । मायापुर में आनेवाली मानसूनी बाढ़ तथा वहाँ की बलुई जमीन के कारण असाधारण कठिनाइयाँ उत्पन्न होंगी, अतः इस भवन को विशिष्ट नींव पर, जो तैरते हुए बेड़े की तरह होगा, बनाना होगा। एक अभियंता ने बाद में इसकी पुष्टि की।

प्रभुपाद ने कहा पहला भवन चार मंजिला अतिथि गृह होगा । उसका डिजाइन, यद्यपि किसी एक वास्तुशिल्प की पद्धति के अनुसरण पर नहीं होगा, किन्तु वह अधिकांश में राजस्थानी शैली का होगा। वे ऐसा गुलाबी लाल रंग का भवन चाहते थे जिसमें अनेक मेहराबें हो और जिसके, निचले फर्श को छोड़ कर, शेष प्रत्येक मंजिल पर चौड़ा संगमरमर का बरामदा हो; यह भवन पूर्व से पश्चिम दिशा में बने जिससे सूर्य इसकी पूरी लम्बाई में ऊपर से गुजर जाय और उसकी धूप सामने के चौड़े बरामदे में सीधी ने पड़े; दक्षिण से चलने वाली समुद्री वायु अतिथि गृह को ग्रीष्मऋतु में शीतल बनाए । भवन को बिजली के पंखों और प्रकाश, आधुनिक प्रसाधनों एवं फौव्वारे - युक्त स्नानागारों से सुसज्जित किया जाय। भवन के कमरे साज-सज्जा युक्त, विस्तृत और खूब हवादार हों ।

प्रभुपाद ने कहा कि यह अतिथि गृह जितनी जल्दी हो सके बनाया जाए । अन्य भवन इसके बाद बनेंगे । वे पाँच सौ भक्तों के लिए आवासीय भवन, एक विशाल प्रसाद - कक्ष जिसमें कई हजार लोग बैठ सकें, एक रसोई घर और एक गोशाला जिसकी गाएँ आसपास के मैदानों में चर सकें, चाहते थे । कालान्तर में इस्कान संलग्न भूमि खण्ड भी खरीद लेगा जिस पर पुष्प वाटिकाओं, वृक्षों, लता गुल्मों, फौव्वारों, जनपथों और albors सहित पार्कों का विकास किया जायगा ।

विशाल मायापुर चन्द्रोदय मंदिर को, जो मुख्य भवन होगा, तीन सौ फुट से कम ऊँचा नहीं होना था जिसमें कई करोड़ डालर की लागत आनी थी । प्रभुपाद के वर्णन से वास्तुशिल्पकार और भक्तजन सभी चकित थे— यह भवन तो संयुक्त राज्य के राष्ट्रपति भवन, कैपिटल, या सेंट पीटर्स गिरजाघर से भी शानदार होगा। मंदिर के केन्द्रीय गुम्बद में ब्रह्माण्ड का त्रिआयामीय माडल होगा । किन्तु यह माडल वैदिक वितरण पर आधारित होगा और उसमें न केवल भौतिक ब्रह्माण्ड को, अपितु आध्यात्मिक ब्रह्माण्ड को भी चित्रित किया जायगा ।

मुख्य हाल में प्रविष्ट होने पर कोई भी व्यक्ति ऊपर की ओर देखने पर समस्त लोकों को वैसे ही चित्रित देखेगा जैसा कि श्रीमद्भागवत में वर्णन है— सबसे नीचे नरकलोक, फिर मध्य लोक जिसमें पृथ्वी स्थित होगी, तब देवताओं के स्वर्गलोक, फिर भौतिक संसार का सर्वोच्च लोक, ब्रह्मलोक, होगा । ब्रह्मलोक के ऊपर दर्शक को शिवलोक दिखेगा और उससे भी ऊपर आध्यात्मिक आकाश या ब्रह्मज्योति होगी । ब्रह्मज्योति के आध्यात्मिक तेज के भीतर स्वतः प्रकाशित वैकुण्ठ - लोक होंगे जिनमें शाश्वत मुक्त जीव निवास करते हैं। इन सब के ऊपर होगा कृष्णलोक, जहाँ ईश्वर अपने मूल शाश्वत रूप में अपने अत्यन्त विश्वासपात्र भक्तों के साथ लीलाएँ करते होंगे।

मंदिर में एक लघु महल भी होगा जिसमें राधा तथा कृष्ण के अर्चा-विग्रह रहेंगे जो रेशमी वस्त्रों से तथा चाँदी, सोने और रत्नों के स्तंभों से घिरे होंगे । मायापुर चन्द्रोदय मंदिर तथा मायापुर नगर इस्कान के विश्व मुख्यालय होंगे।

और आखिर दुनिया के ऐसे अज्ञात भाग में वास्तुशिल्प का यह कल्पित आश्चर्य क्यों ? प्रभुपाद ने इसकी व्याख्या यह कह कर दी कि मायापुर वास्तव में अज्ञात नहीं था; वह केवल सांसारिक दृष्टि से ऐसा लगता है । सांसारिक दृष्टि से, जो केन्द्रीय होता है वही दूर प्रतीत होता है। आत्मा और अगला जीवन दूर प्रतीत होते हैं, जबकि देह और इन्द्रिय-सुख केन्द्रीय लगते हैं । मायापुर में मानव - बोध मंदिर की स्थापना करके श्रील प्रभुपाद विश्व के भौतिकतावादी ध्यान को वास्तविक केन्द्र की ओर पुनः निर्देशित करेंगे ।

इस्कान के मायापुर परियोजना के सौन्दर्य से कोई भी निष्ठावान् दर्शक मोहित हो जायगा और वह देख सकेगा कि सचमुच वैकुण्ठलोक यहीं है। और मायापुर के वासी भक्तजन, हरे कृष्ण कीर्तन के गायन में निरन्तर डूबे रहने और कृष्णभावनामृत के दर्शन की विवेचना करते रहने के कारण, किसी भी बुद्धिमान दर्शक को आश्वस्त कर सकेंगे कि भगवान् चैतन्य महाप्रभु के उपदेश परम सत्य हैं। भक्तजन परम सत्य के दर्शन की व्याख्या करेंगे जिससे दर्शकों को बोध हो सकेगा कि वास्तविक आध्यात्मिक सत्य जातिवादी धार्मिक मत से ऊपर है। साथ ही हरे कृष्ण का अखण्ड कीर्तन तथा भगवान् कृष्ण की विविध सेवाओं में लगे आनन्द - मन भक्तगण यह दिखला सकेंगे कि श्री भगवान् के चिन्तन का एकमात्र सीधा और सरलतम मार्ग भक्तियोग है । इस्कान की मायापुरी नगरी में रहते हुए कोई भी व्यक्ति शीघ्र ही भगवान् का भक्त बन सकेगा और आनंद-विभोर होकर कीर्तन तथा नर्तन करने लगेगा ।

श्रील प्रभुपाद यह प्रदर्शित कर रहे थे कि किस प्रकार भक्ति योग के द्वारा भौतिक वस्तुओं को श्री भगवान् कृष्ण के साथ जोड़ कर संसार को आध्यात्मिक बनाया जा सकता है। और ऐसी आध्यात्मिक करामातें भौतिकतावादियों की उपलब्धियों को मात क्यों न दें ?

भारत के उच्च आयुक्त से यह जान कर प्रभुपाद को खेद हुआ कि प्रधानमंत्री मायापुर में शिलान्यास समारोह में सम्मिलित नहीं हो सकतीं। इसे भी उन्होंने कृष्ण की इच्छा माना। उन्होंने कहा कि वे किसी प्रमुख वैष्णव को अध्यक्षता करने को आमंत्रित करेंगे या वे स्वयं करेंगे। उन्होंने लिखा, “अन्ततः यह भगवान् चैतन्य की इच्छा थी कि किसी सांसारिक पुरुष या महिला को बुलाए जाने की बजाय शिलान्यास का यह पावन कार्य कोई वैष्णव करे । "

वर्षाऋतु आई और गंगा तट के ऊपर बहने लगी जिससे इस्कान की समस्त मायापुर सम्पत्ति डूब गई। अच्युतानन्द स्वामी ने फूस और बांस का एक कुटीर बनाया था जिसमें प्रभुपाद शीघ्र ही आकर रहने वाले थे। लेकिन बाढ़ का पानी इतना ऊँचा उठा कि अच्युतानंद स्वामी को बांस के बेड़े पर रहना पड़ा । उन्होंने प्रभुपाद को लिखा कि भक्तिवेदान्त मार्ग (वह सड़क जो इस्कॉन की संपत्ति और भगवान् चैतन्य के जन्म-स्थल के सामने से जाती है और गंगा नदी के विरुद्ध बांध का काम देती है ) न होता तो क्षति बहुत अधिक होती । प्रभुपाद ने उत्तर दिया,

“हाँ, हम लोगों को श्रील भक्तिसिद्धान्त सड़क ने बचा लिया। हमें आशा है कि कृष्णकृपाश्रीमूर्ति भक्तिसिद्धान्त सरस्वती गोस्वामी महाराज प्रभुपाद सदैव हमारी रक्षा करेंगे। हमेशा उनके चरणारविन्दों की प्रार्थना करते रहो। हमने महाप्रभु चैतन्य की शिक्षाओं का संसार भर में प्रचार करने में जो सफलता पाई है वह केवल उनकी कृपा के कारण है।

***

नई दिल्ली

नवम्बर १०, १९७१

कार हवाई अड्डे के सामने भीड़ में से बाहर निकली। प्रभुपाद पीछे की सीट पर बैठे थे, उनकी बेंत की छड़ी उनके घुटने से सटी थी, हाथ जप माला की थैली में था और वे अपने दिल्ली के शिष्यों से बात कर रहे थे । जब कार नई दिल्ली की विस्तृत सड़कों से होकर गुजर रही थी तो प्रभुपाद ने घुटने तक लम्बी दो पुष्प मालाओं को अपने गले से निकाल कर बगल की सीट पर रख दिया। दोपहर का समय था और नवम्बर का मौसम सुहावना था। प्रभुपाद अगले दिन आरंभ होने वाले इस्कान के दस दिवसीय पंडाल समारोह में भाग लेने के लिए ठीक समय पर पहुँचे थे ।

एक भक्त ने उल्लेख किया कि यह कितना उपयुक्त था कि नई दिल्ली के मेयर, मिस्टर हंसराज गुप्त ने हवाई अड्डे पर प्रभुपाद का स्वागत किया था। प्रभुपाद मुसकराए।

हवाई अड्डे पर मेयर गुप्त की उपस्थिति में वहां एकत्रित जनता के सामने अपने भाषण में प्रभुपाद ने बताया था कि भारत का कर्त्तव्य शेष संसार के कल्याण के लिए कार्य करना है। उन्होंने यह भी बताया था कि किस प्रकार पच्चीस वर्ष की अवस्था में उनकी भेंट उनके गुरु महाराज से हुई थी और अंग्रेजी भाषा-भाषी संसार तक महाप्रभु चैतन्य का संदेश पहुँचाने का आदेश उन्होंने उनसे प्राप्त किया था। सत्तर वर्ष की अवस्था होने तक उन्होंने क्यों प्रतीक्षा की थी, इसका कारण बताते हुए उन्होंने कहा था, “महाप्रभु चैतन्य के संदेश का प्रचार करने के लिए मैं एक सफल साधन बनने का प्रयत्न कर रहा था । ' कृष्णभावनामृत आंदोलन का विस्तार संसार में हो रहा था और अब उसके लिए हजारों धर्मोपदेशकों की आवश्यकता थी । प्रभुपाद ने बताया था, "और काले लोग भी नृत्य कर रहे हैं और वे भारतीयों से पूछ रहे हैं कि आप और स्वामी लोग हम लोगों को यह उदात्त पद्धति क्यों नहीं देते ?"

एक महीना पूर्व अफ्रीका से लौटने के बाद दिल्ली तीसरा नगर था जहाँ प्रभुपाद आए थे । उनका पहला पड़ाव बम्बई था जो ठीक नहीं रहा था । श्यामसुन्दर प्रमाद-वश श्रील प्रभुपाद के टीके का कार्ड नहीं लाए थे, अतः आव्रजन अधिकारियों ने भारत में प्रभुपाद का प्रवेश निषिद्ध कर दिया था और उन्हें दस दिन के लिए बम्बई हवाई अड्डे के अस्पताल में अलग रखा था ।

उनका जीवन एक कमरे तक सीमित हो गया था जिसका बरामदा एक बगीचे की ओर खुलता था । उनके कार्यकलाप का क्षेत्र भी सीमित हो गया था । तब भी वे नाश्ते के बाद प्रात: काल का समय श्यामसुंदर के साथ कुछ पाश्चात्य दार्शनिकों के विषय में संवाद में बिताते थे । श्यामसुंदर कोई विशेष दार्शनिक विचार उनके सामने रखते और प्रभुपाद वैदिक दृष्टि से उसका विवेचन करते थे। तब जब उनके दस दिन के संगरोधकाल का केवल एक दिन शेष रहा तभी उनके टीके का कार्ड पहुँच गया और प्रभुपाद को मुक्त कर दिया गया था।

तुरन्त ही उन्होंने कलकत्ता के लिए प्रस्थान कर दिया जहाँ देश प्रिय पार्क में एक कीर्तन और व्याख्यान - श्रृंखला का कार्यक्रम था। वे कलकत्ता में ढाई सप्ताह रुके थे और उस क्षेत्र के मध्य में जो कभी योरोपीय साहबों का केन्द्र था, अलबर्ट रोड पर इस्कान मंदिर की स्थिति को बहुत पसंद किया था । प्रभुपाद ने कहा था, कहा था, “अब मैं साहबों को साहब- निवास में फिर वापस ला रहा हूँ; किन्तु इस बार वे वैष्णवी रूप में आ रहे हैं। आप यह स्थान कभी न छोड़ें।'

कलकत्ते के कुछ भक्तों ने श्रील प्रभुपाद से शिकायत की थी कि मंदिर में बड़ी कुव्यवस्था थी और अपर्याप्त आय के कारण उनको पूरा भोजन नहीं मिलता था। जब प्रभुपाद ने मंदिर के प्रबन्धकों से इस विषय में प्रश्न किया तो एक भक्त ने उत्तर दिया था, “श्रील प्रभुपाद, मैं केवल आपकी इच्छा का पालन कर रहा था । "

प्रभुपाद ने पूछा था, "क्या यह मेरी इच्छा है कि सभी भक्तों को कष्ट दिया जाय ?"

उन्होंने उनके मतभेदों को निपटा दिया था, बेहतर भोजन का प्रबन्ध करा दिया था और मंदिर के अधिकारियों के जनतांत्रिक विधि से निर्वाचन की भी संस्तुति कर दी थी। लेकिन उन्होंने यह भी समझाकर बता दिया था कि चूँकि कृष्णभावनामृत का प्रचार इतना महत्त्वपूर्ण मिशन था, इसलिए कमियाँ होने पर भी भक्तों को आपस में सहयोग करना चाहिए। उन्होंने कहा था कि भौतिक जगत समुद्र की तरह है; उसमें लहरों का उठना स्वाभाविक है।

कलकत्ता की इस यात्रा में प्रभुपाद अपनी मायापुर की योजनाओं के बारे में भी बोले थे। नर-नारायण ने उस भवन का सही-सही माडल बनाया जिसे नए खरीदे गए भूखण्ड पर इस्कान बनाने वाला था । और प्रभुपाद ने उस माडल को अपने सभी अभ्यागतों को दिखाया था और उसमें सहायता करने को कहा था। इस परियोजना में प्रभुपाद की तल्लीनता को देख कर गिरिराज ने स्वेच्छा से जैसे भी जरूरत हो, सहायता करने की स्वीकृति दी थी । गिरिराज ने कहा था, "ऐसा लगता है कि आप जो दो चीजें सर्वाधिक चाहते हैं वे हैं: पुस्तकों का वितरण और मायापुर में मंदिर का निर्माण ।

प्रभुपाद ने मुसकराते हुए कहा था, “हाँ, हाँ, धन्यवाद । "

जब प्रभुपाद दिल्ली में मिस्टर रामनिवास डंडरिया के निवास पर पहुँचे तो एक प्रतीक्षा -रत सम्वाददाता ने उनसे भेंटवार्ता की ।'

सम्वाददाता ने कहा, "मैं समझता हूँ 'कृष्ण' से आप का तात्पर्य किसी शाश्वत सिद्धान्त से है ।

प्रभुपाद ने उत्तर दिया, "मेरा तात्पर्य सिद्धान्त से नहीं है, अपितु आपकी और मेरी तरह के एक व्यक्ति से है।” प्रभुपाद परम पुरुष के रूप में कृष्ण की व्याख्या कर रहे थे कि अकस्मात् साइरेन बजने लगा ।

सम्वाददाता और घर के अन्य लोग चिल्लाने लगे — “ब्लैक आउट, ब्लैक आउट ।” पाकिस्तान और भारत के बीच युद्ध कई सप्ताहों से आसन्न था और दिल्ली में हवाई आक्रमण के अभ्यास और चेतावनियाँ हर रोज की बातें हो गईं थीं।

अंधेरे कमरे में सम्वाददाता ने गंभीर स्वर में कहा, “ महोदय, यह यथार्थ की उपस्थिति है। पाकिस्तान के साथ युद्ध का खतरा हमारे सिर पर है । यह साइरेन हम पर आनेवाला भयानक यथार्थ है ।

प्रभुपाद ने कहा – “हम हर समय भयानक यथार्थ में हैं— प्रतिदिन चौबीसों घंटे । मान लीजिए ब्लैक आउट न हो। तब भी यदि आप बाहर सड़क में जायँ, तो निश्चित नहीं है कि आप घर वापस आएँगे। इस प्रकार आप हर समय भयानक यथार्थ में हैं। आप ऐसा क्यों कहते हैं कि केवल यह ब्लैक आउट ही भयानक यथार्थ है ? इस भयानक यथार्थ का यह केवल एक आयाम है। बस ।”

सम्वाददाता : “हाँ, किन्तु इस क्षण ...

प्रभुपाद : “क्या आप अनुभव नहीं करते कि आप प्रतिदिन चौबीसों घंटे भयानक यथार्थ में हैं ? पदम् पदम् यद् विपदाम् — विपदा हर कदम पर है ।

सम्वाददाता : “महोदय, मैं यह जानता हूँ। किन्तु यह सामूहिक, राष्ट्रीय विपदा है । क्या आपके पास इसका कोई उपचार है ?

प्रभुपाद : " हमारे पास कृष्णभावनामृत एकमात्र उपचार है। इस पद्धति को स्वीकार करें और आप सुखी रहेंगे । '

सम्वाददाता : “मेरी समझ में किसी को पाकिस्तान के राष्ट्रपति, याहया खां, के पास जाना चाहिए ।"

प्रभुपाद : " याहया खां के पास जाने से क्या लाभ होगा ?"

सम्वाददाता : " वह हमें मार डालना चाहता है । "

प्रभुपाद : " मान लीजिए, वह आपको नहीं मारता, तो क्या आप बच जायँगे ? तो याहया खां के पास जाने से क्या लाभ होगा ? आपको मरना है, आज या कल। यदि आप अपनी रक्षा चाहते हैं तो कृष्ण के पास जाइए। हमारा प्रस्ताव यही है। यदि आप याहया खां के पास जायँ और मान लीजिए कि वह युद्ध नहीं करता तो क्या आप यह कहना चाहते हैं कि आप अमर हो जायँगे ? याहया खां की चापलूसी करने से क्या लाभ होगा ? कृष्ण की स्तुति कीजिए, जिससे आपकी शाश्वत सुरक्षा रहे । आप ऐसा क्यों नहीं करते ?”

सम्वाददाता : “मैं तो केवल सामूहिक सुरक्षा की बात सोच रहा था । मैं आपका तर्क समझता हूँ... '

प्रभुपाद : " आपको जानना चाहिए कि आप हमेशा ही खतरे में हैं। "

सम्वाददाता : “हाँ, श्रीमान् । हम सहमत हैं। दिवंगत आइंस्टीन भी यही बात कहते थे । "

प्रभुपाद : "हमारा कहना यही है । और कृष्ण कहते हैं, 'मैं तुम्हरी रक्षा करूंगा।' अतः हमें कृष्ण की शरण में जाना चाहिए। हम याहया खां के पास क्यों जायँ ?"

सम्वाददाता : “केवल इसलिए कि वह हमें आपदा में डाल रहा है, बस ।'

प्रभुपाद : " आपका मन आपको हर समय विपदा में डालता रहता है, क्योंकि वह हमेशा आपके साथ है । आपका शरीर हर समय आपके साथ है। क्या आप शारीरिक कष्टों से पीड़ित नहीं रहते ? अपने इस कष्ट के निवारण के लिए याहया खां के पास क्यों नहीं जाते ? आप हमेशा खतरे में हैं। आप इसे अनुभव क्यों नहीं करते ?"

संवाददाता : “हम अनुभव करते हैं कि यह एक राष्ट्रीय आपदा है ।'

प्रभुपाद : " ये लक्षण मात्र हैं। लोग मर्ज का केवल अधूरा उपचार कर रहे हैं। हम उन्हें सर्वोत्कृष्ट उपचार बता रहे हैं। यही अंतर है । अधूरे उपचार से आप चंगे नहीं होंगे। आपको सम्पूर्ण उपचार चाहिए ।

जन्म कर्म च मे दिव्यम् एवं यो वेत्ति तत्त्वत:

त्यक्त्वा देहम् पुनर् जन्म नैति माम् एति सोऽर्जुन

जन्म-मरण की पुनरावृत्ति उपचार नहीं है। हम वही चाहते हैं । कृष्णभावनामृत का यही लाभ है— यम् प्राप्य न निवर्तन्ते । तद् धाम परमम् मम । यदि आप कृष्ण के पास जायँ तो आपको पुनः इस भौतिक संसार में वापस नहीं आना होगा ।"

संवाददाता : “मेरा प्रश्न बहुत कल्पना शील था । मान लीजिए एक सौ शुद्ध, साधु, कृष्ण चेतना युक्त लोग ध्यान लगा रहे हैं या परस्पर विचार-विनिमय में लगे हैं और कोई आता है और एक बम फेंक देता है..."

प्रभुपाद : " जो कृष्ण चेतना से युक्त हैं, वे बम से भयभीत नहीं होते। जब वे बम को आता देखते हैं, तो वे सोचते हैं कि कृष्ण की इच्छा थी कि बम आए। कृष्ण - चेतना वाला व्यक्ति किसी चीज से नहीं डरता । भयम् द्वितीयाभिनिवेशतः स्यात् । जिसे ऐसी धारणा हो कि कृष्ण के बाहर भी किसी चीज का अस्तित्व हो सकता है, वही भयभीत होता है। दूसरी ओर, जो जानता है कि हर वस्तु कृष्ण से आ रही है, उसे भयभीत होने का कोई कारण नहीं है । बम आ रहा हो तो वह कहता है— अहा ! कृष्ण आ रहे हैं। भक्त का यही दृष्टिकोण होता है। वह सोचता है, कृष्ण मुझे बम से मारना चाहते हैं । ठीक है। मुझे मरना है।' यही कृष्णभावनामृत है।

जब सम्वाददाता ने पूछा कि क्या वैष्णव बिना युद्ध किए मृत्यु का वरण करेगा तो प्रभुपाद ने कहा कि वैष्णव युद्ध करेगा, किन्तु कृष्ण के निर्देशन में । और उन्होंने अर्जुन और हनुमान के उदाहरण दिए । आगे भी वे समझाते रहे कि कृष्णभावनामृत ही अन्तिम समाधान है। ब्लैकआउट समाप्त हो गया ।

प्रभुपाद के कुछ शिष्यों ने नई दिल्ली पण्डाल कार्यक्रम का आयोजन किया था, जिस तरह भारत में सार्वजनिक उत्सवों का प्रारंभ प्रभुपाद पहले भी कर चुके थे । तमाल कृष्ण, तेजास और गुरुदास दिल्ली के प्रमुख व्यक्तियों की सहायता का आश्वासन पहले ही प्राप्त कर चुके थे—इनमें मेयर और नई दिल्ली के प्रबन्ध और स्वागत समिति के सदस्य सम्मिलित थे। इन लोगों ने अपनी सहमति दे दी थी और अन्य लोगों के लिए परिचय पत्र भी दे दिया था । तब भक्तजन उनके पास अनुदान के लिए गए थे।

भक्तजन जिन लोगों से मिले उनमें से प्रत्येक व्यक्ति प्रभुपाद के प्रति सहानुभूतिपूर्ण था । सब लोग उनका सम्मान करते थे, विशेष कर उनसे मिलने के बाद । वैचारिक स्तर पर कुछ की उनसे असहमति थी । तो भी सभी इस बात से प्रभावित थे कि प्रभुपाद ने पाश्चात्यों को हिन्दू धर्म और कृष्णभावनामृत में दीक्षित किया था, और उनके द्वारा भगवद्गीता की शिक्षाओं के विश्वव्यापी प्रचार के प्रति लोगों के मन में वास्तविक श्रद्धा थी ।

एक साधु के रूप में भारतवासियों के मध्य प्रभुपाद का व्यक्तित्व महान् था । केवल शास्त्रों के आधार पर अपनी बात कहते हुए, वे अपने को पूर्ण रूप से कृष्णार्पित प्रदर्शित करते थे । वे राजनीति और साम्प्रदायिकता से सर्वथा ऊपर थे; वे पूर्णत: आध्यात्मिक और आदरणीय थे । व्यक्तिगत विचारधारा, या आचरण किसी का कैसा भी हो, प्रत्येक व्यक्ति उनको भारतीय संस्कृति का सच्चा प्रतिनिधि, विशुद्ध साधु और गुरु मानता था ।

दस दिवसीय उत्सव में जिन प्रमुख व्यक्तियों ने अतिथि वक्ता के रूप में भाग लेने की सहमति दी, उनमें थे — मेयर श्री हंसराज गुप्त; विख्यात हिन्दी कवि हरवंशराय बच्चन; दिल्ली मेट्रोपोलिटन काउंसिल के चेयरमैन श्री श्यामचरण गुप्त; सुविख्यात वक्ता श्री सी. बी. अग्रवाल; दिल्ली हाईकोर्ट के जज श्री विपिनचन्द्र मिश्र; विख्यात वैज्ञानिक डा. आत्माराम; लखनऊ के उद्योगपति और भूतपूर्व मेयर कर्नल बी. आर. मोहन; प्रसिद्ध उद्योगपति श्री एल. एन. सकलानी; दिल्ली के उपराज्यपाल श्री आदित्य नाथ झा; भारत के प्रतिरक्षा मंत्री श्री जगजीवनराम; और कनाडा के उच्चायुक्त महामहिम जेम्स जार्ज । गुरुदास की मैत्रीपूर्ण वार्ता भारत में संयुक्त राज्य के राजदूत केनेथ कीटिंग से भी हुई थी जिन्होंने बार बार अपना सम्मान कृष्णभावनामृत-आन्दोलन के लिए व्यक्त किया था । राजदूत कीटिंग ने खेद व्यक्त किया कि उत्सव के दिनों में वे नगर से बाहर रहेंगे ।

भक्तों ने उत्सव के लिए नई दिल्ली के व्यावसायिक क्षेत्र के केन्द्र - स्थल कनाट प्लेस में एल.आई.सी. के मैदान पर बहुत सुंदर स्थान प्राप्त कर लिया था। उन्होंने एक विशाल शामियाना लगवा दिया था और प्रकाश की व्यवस्था कर ली थी। पहले दिन का कार्यक्रम छह बजे सवेरे, जयपुर से सद्यः प्राप्त और फूलों से सजे, बृहत् मंच पर आसीन, श्वेत संगमरमर के राधा और कृष्ण के विग्रहों के समक्ष, कीर्तन और आरती से हुआ। प्रारंभ में उपस्थिति विरल थी, किन्तु जब दोपहर के कीर्तन और आरती के बाद प्रसाद का वितरण आरंभ हुआ तब उसमें वृद्धि होने लगी। संध्या का कार्यक्रम कीर्तन से आरंभ हुआ और उत्साहपूर्वक चलता रहा। वह भावनात्मक उत्कर्ष के चरमबिन्दु पर उस समय पहुँचा जब प्रभुपाद ने प्रवेश किया।

दिल्ली के धर्मिष्ठ लोगों के लिए सायंकालीन हरे कृष्ण उत्सव उल्लेखनीय अवसर था। चूँकि उत्सव स्थल और समय उपयुक्त थे और प्रवेश निःशुल्क था, इसलिए एकत्रित जनसमूह की संख्या हजारों-लाखों तक जा पहुँचती थी । कुछ तो विशेष रूप से युवा अमरीकी वैष्णवों को देखने आते थे।

प्रभुपाद के पहुँचने पर जब भक्तजन उन्हें घेरे में लेकर भीड़ के बीच से चलने लगते थे तो सैंकड़ों लोग उनके चरण स्पर्श करने और आशीर्वाद पाने के लिए उनकी ओर उमड़ पड़ते थे। भूरे रंग की ऊनी चादर ओढ़े हुए और सिर पर 'स्वामी टोपी' लगाए हुए जो कभी - कभी उनके सिर पर पीछे की ओर खिसक जाती थी, स्वामीजी अपने सहज अभिजात संतुलन के साथ रंगमंच की ओर शांत मुद्रा में बढ़ते जाते थे ।

नई दिल्ली के मेयर श्री हंसराज गुप्त सबसे पहले बोले । श्रील प्रभुपाद से उनकी पहली भेंट १९६० ई. के प्रारंभ में हुई थी जब प्रभुपाद श्रीमद्भागवतम् के पहले खण्ड के प्रकाशन के लिए उनसे अनुदान माँगने उनके पास गए थे। प्रभुपाद को “निष्ठावान् और भगवान् के निकट " समझ कर मेयर गुप्त ने उनकी सहायता की थी और बाद में प्रभुपाद ने श्रीमद्भागवतम् के प्रथम दो खण्डों की प्रतियाँ उन्हें भेंट की थी । मिस्टर गुप्त पश्चिम में वैष्णव धर्म के प्रचार में प्रभुपाद की सफलता से प्रभावित थे और जब उन्होंने श्रील प्रभुपाद का परिचय कराया तो कृष्णभावनामृत की विचारधारा का, जैसा कि उन्होंने उनके भागवतम् में पढ़ा था, विस्तार से वर्णन किया।

हिन्दी में बोलते हुए उन्होंने कहा कि पाँच वर्षों में दिल्ली के मेयर के रूप में, अनेक बार उन्हें महत्त्वपूर्ण व्यक्तियों का स्वागत करना पड़ा था और उनके सम्मान में भाषण देने पड़े थे, किन्तु वे सब प्रायः औपचारिकता मात्र थे । वे बोले कि श्रील प्रभुपाद के साथ ऐसा नहीं है, क्योंकि जितने लोगों को वे जानते थे उनमें कोई ऐसा नहीं था जिसकी तुलना प्रभुपाद से की जा सके। उन्होंने प्रभुपाद की सराहना 'भारत और सारे संसार में उनके अतिशय अच्छे कार्यों के लिए की। मेयर गुप्त ने कहा, "उन्होंने मुझे प्यार और स्नेह भी दिया है, और, अन्य किसी चीज के मुकाबिले, इसका असर मुझ पर ज्यादा है । "

तत्पश्चात् प्रभुपाद बोले । जब उन्होंने पूछा कि श्रोता - मण्डली उन्हें हिन्दी में बोलते सुनना चाहती है या अंग्रेजी में, तो बहुतों ने कहा – हिन्दी और कुछ ने कहा - अंग्रेजी । किन्तु प्रभुपाद ने घोषणा की, “मैं अंग्रेजी में बोलने जा रहा हूँ, क्योंकि मेरे शिष्य जो यहाँ उपस्थित हैं, अमेरिकन या योरोपीय हैं। वे मेरा अनुसरण कर रहे हैं, इसलिए उनका समझना आवश्यक है। यदि मैं हिन्दी में बोलता हूँ तो वे नहीं समझ सकेंगे। इसलिए मैं अंग्रेजी में बोलने जा रहा हूँ ।"

प्रभुपाद ने जारी रखा, "महिलाओ और सज्जनो, मैं आपको, इस कृष्णभावनामृत-आंदोलन में सहभागी होने के लिए, धन्यवाद देता हूँ। अभी हम एक दिव्य गीत का गायन करेंगे — जय राधा - माधव कुञ्ज बिहारी । जैसा कि आप जानते हैं कि कृष्ण की शाश्वत संगिनी श्रीमती राधाराणी है— कृष्ण की आनंद शक्ति । कृष्ण परम भगवान् हैं। जब वे आनंद मनाना चाहते हैं तब वे अपने आनंद की शक्ति का प्रदर्शन करते हैं, वह शक्ति है राधाराणी ।

जय राधा-माधव के गायन के बाद प्रभुपाद ने आधे घंटे तक कृष्ण - विज्ञान की व्याख्या की। उन्होंने भगवद्गीता से उद्धरण दिए कि कृष्ण इस भौतिक जगत में क्यों आते हैं, जीवात्माएँ एक शरीर से दूसरे शरीर में, एक जन्म से दूसरे जन्म में, कैसे स्थानान्तरण करती हैं और मानव जीवन जीवात्माओं को कैसे अवसर प्रदान करता है कि वे कृष्ण के प्रति अपने प्रेम को पुनः जागरित करें ।

प्रभुपाद ने कहा, “धर्म यही है, केवल कृष्ण के प्रति अर्पित हो जाइए । कृष्ण का अनुगामी बन जाइए।... इसके लिए चर्च की आवश्यकता नहीं है, इसके लिए मस्जिद नहीं चाहिए। इसके लिए कुछ भी नहीं चाहिए। आप जहाँ भी बैठे हों, आप हरे कृष्ण का जप कर सकते हैं। यह सबसे आसान तरीका है । "

श्रीमद्भागवतम् के पुरातन व्याख्याता शुकदेव गोस्वामी का अनुसरण करते हुए, प्रभुपाद ने ऐसे भौतिक जीवन की भर्त्सना की जो " सूअरों और कुत्तों की तरह कठोर परिश्रम" में बीतता है— बिना आत्म-साक्षात्कार के । उन्होंने इस बात पर बल दिया कि भारत के पास ज्ञान का भण्डार है जिसे भारतवासियों को संसार भर में वितरण करना चाहिए। दुर्भाग्य से भारतवासी अपने वास्तविक कर्तव्य को भूलते जा रहे हैं ।

निष्कर्ष रूप में प्रभुपाद ने कहा, “अतएव कृष्णभावनामृत आंदोलन पर इस संदर्भ में बहुत-सी बातें कहने की हैं। अगले दस दिनों में मैं आपके समक्ष उन्हें प्रस्तुत करने का प्रयास करूँगा । यह शुभारंभ है। मेरी आप से प्रार्थना है कि आप यहाँ आएँ । हम कोई शुल्क नहीं लेते। हम कृष्ण पर निर्भर हैं। यदि कृष्ण चाहेंगे तो वे हमें लाभ देंगे। हम पूर्ण रूप से कृष्णार्पित हैं। यदि वे चाहेंगे तो हमारा भरण-पोषण करेंगे। यदि वे चाहेंगे तो हमारे प्राण ले लेंगे । हमें चिन्ता नहीं है। हमारा कोई धंधा नहीं है। हमारी कोई अलग अभिरुचि नहीं है। हमारी आप से प्रार्थना है कि आप आएँ और इस आंदोलन में सहभागी बनें। यह साम्प्रदायिक नहीं है। संसार भर में बहुत से हिन्दू, ईसाई, यहूदी, मुसलमान, और सिक्ख हैं जो अब कृष्णभावनामृत आंदोलन में हैं। हम केवल एक शब्द — कृष्ण, एक शास्त्र - भगवद्गीता, एक मंत्र - हरे कृष्ण का प्रचार करते हैं। गाइए — हरे कृष्ण, हरे कृष्ण, कृष्ण कृष्ण, हरे हरे / हरे राम, हरे राम, राम राम हरे हरे । बहुत-बहुत धन्यवाद ।"

प्रभुपाद ने रंगमंच से जाना चाहा तो भीड़ उनके चरणारविंदों का स्पर्श करने के लिए फिर उनकी ओर उमड़ पड़ी । यद्यपि प्रभुपाद के भक्त उनकी महानता के प्रति आश्वस्त हो चुके थे, फिर भी वह महानता इस जैसे अवसरों पर और भी स्पष्ट रूप में सामने आ जाती थी जब वे उन्हें इतने अधिक प्रभावशाली ढंग से बोलते सुनते थे और भक्तों की भीड़ से उन्हें इस प्रकार घिरे देखते थे।

जब प्रभुपाद अपनी कार की ओर बढ़ रहे थे, उस समय वे शान्त और विनम्र बने रहे, किन्तु उनको चारों ओर से घेरे भक्त, उतावली भीड़ की धक्का-मुक्की से उन्हें बचाने में आकुल थे। भक्तों के भरसक प्रयत्नों के बावजूद भीड़ में से कुछ लोग आगे आ गए और भक्तों की टांगों के बीच से निकल कर प्रभुपाद के समक्ष दण्डवत् पड़ गए।

अपने पास के भक्तों की ओर उन्मुख होते हुए प्रभुपाद ने कहा, 'क्या तुम जानते हो कि वे मेरी पूजा क्यों कर रहे हैं, इसलिए कि मैं यौनाचार - वासना से मुक्त हूँ ।"

लगातार दस दिनों तक पंडाल - समारोह में प्रभुपाद रात में व्याख्यान देते रहे । कई व्याख्यानों में वे कृष्णभावनामृत के संदर्भ में धर्म पर बोले ।

“कृष्णभावनामृत आन्दोलन सर्वोत्कृष्ट योग - पद्धति है। यह बहुत वैज्ञानिक है। ऐसा न सोचें कि यह केवल भावना - प्रेरित आंदोलन है। यह प्रामाणिक है, वैदिक साहित्य से समर्थित है । और वास्तव में इसका प्रभाव बढ़ रहा है। धर्म ईश्वर के प्रति समर्पण है। इन लड़कों और लड़कियों ने इस वास्तविक धर्म को स्वीकार कर लिया है। यह आन्दोलन इतना महत्त्वपूर्ण है, और हम हर एक को अवसर प्रदान कर रहे हैं कि वह कृष्णभावनामृत को स्वीकार करें ।

पाँचवी संध्या को न्यायाधीश मिश्र द्वारा अपने विषय-प्रवेश में धर्म का उल्लेख किए जाने के बाद प्रभुपाद ने अपने व्याख्यान में धर्म शब्द की परिभाषा दी, "धर्म का अर्थ है संवैधानिक स्थिति । अंग्रेजी शब्दकोश में 'रिलीजन' का अर्थ 'फेथ' दिया हुआ है। किन्तु वैदिक शास्त्रानुसार रिलीजन को 'फेथ' की तरह बदला नहीं जा सकता। यह ईश्वर द्वारा दिया गया विधान है। कृष्ण के चरणारविन्दों में समर्पण ही धर्म है। यही कृष्ण का आदेश है। ईश्वर की शरण में जाने में कोई स्वार्थ की भावना नहीं होनी चाहिए ।

" तुरन्त समर्पण क्यों नहीं करते ? बुद्धि से काम लीजिए । वास्तविक धर्म का अर्थ है तुरन्त समर्पण। कई-कई जन्मों तक प्रतीक्षा क्यों करते हैं ? हम आप सबसे प्रार्थना करते हैं कि गंभीरता से कृष्णभावनामृत की इस पद्धति को समझें। आप इसे स्वीकार करें, और आप सुखी होंगे ।"

श्रील प्रभुपाद ने देखा कि भारतवासी अपने धर्म का त्याग कर भौतिकतावादी बनते जा रहे हैं। उन्होंने जोर देकर उनकी भूल का संकेत किया और उसे सुधारने पर बल दिया । " यदि आप अपने राष्ट्र, भारत, की उन्नति चाहते हैं तो आप कृष्णभावनामृत की संस्कृति को स्वीकार करें। इससे आपका देश महिमा मण्डित होगा। प्रौद्यौगिकी के क्षेत्र में आप पाश्चात्य संसार का मुकाबिला नहीं कर सकते। यह असंभव है। पाश्चात्य देश इसीलिए हैं, टेक्नालॉजी की उन्नति करने के लिए। किन्तु आप किसी दूसरे ही उद्देश्य के लिए हैं। आपका विशेष लाभ यह है कि कई जन्मों के बाद और कई पुण्यकर्मों को करने के बाद, आप इस देश, भारतवर्ष में उत्पन्न हुए हैं।

"भारत में गरीबी बहुत है, इसलिए मैं जहाँ भी जाता हूँ, मुझसे कहा जाता है कि मैं बहुत गरीब देश से आया हूँ। भारत अपने ऐसे रूप का विज्ञापन करता है— हमारे मंत्री अन्य देशों से भिक्षा माँगते हैं। हमें भिखमंगों की संस्कृति का माना जाता है। बर्कले विश्वविद्यालय में एक भारतीय विद्यार्थी ने हरे कृष्ण आन्दोलन के अध्ययन का प्रतिवाद किया; प्रतिवाद करने वाला वह एकमात्र विद्यार्थी था। उसने कहा, "स्वामीजी, इस हरे कृष्ण आंदोलन को स्वीकार करने से लाभ क्या है ?" एक दूसरे स्थान में एक लड़की ने मुझसे पूछा, “स्वामीजी, ईश्वर क्या है ?" इसलिए मैने उससे पूछा, “क्या तुम भारतीय हो ? तुम्हें भारतीय कहलाने में शर्म आनी चाहिए, क्योंकि तुम पूछती हो कि ईश्वर क्या है, यद्यपि तुम भारत से आई हो जो ईश्वर का देश है।" भारत वह देश है जहाँ कृष्ण ने अवतार लिया था । अत: तुम जन्म से भले ही भारतीय हो, किन्तु यदि तुम्हारा कोई धर्म नहीं है, तो तुम में और पशुओं में अंतर क्या है ?"

एक रात जब प्रभुपाद बोल रहे थे, श्रोताओं में से एक हिप्पी रंगमंच के पास पहुँचा। उसके लम्बे, सुनहरे बाल अस्तव्यस्त थे और वह वेस्ट जाकेट तथा ऊँचे चमड़े के जूते पहने था। उसके गले में एक जंजीर थी जिससे विष्णु, ब्रह्मा और शिव के छोटे-छोटे फ्रेम किए हुए चित्र लटक रहे थे। जब उस लड़के ने रंगमंच पर चढ़ने का प्रयत्न किया तो कुछ शिष्यों ने उसे पीछे ढकेल दिया । किन्तु श्रील प्रभुपाद ने हस्तक्षेप किया। उन्होंने एक भक्त से एक गद्दी मंगवाई और लड़के के सामने एक माइक्रोफोन रखवा दिया। तब प्रभुपाद बोले— “हाँ ?"

युवक ने पूछा, “क्या आपने आत्मानुभव कर लिया है ?” “क्या आप अपने अन्तर्तम आत्मा से साक्षात्कार कर चुके हैं ? "

प्रभुपाद ने उत्तर दिया, “हाँ।”

पहले तो वह युवक चकरा गया, किन्तु उसने फिर ललकारा, अब, आप मुझे एक दूसरी बात बताइए । भगवद्गीता कब लिखी गई ?"

श्रील प्रभुपाद ने कहा, 'अब तुम मेरे प्रश्न का उत्तर दो। भगवद्गीता से ज्ञान प्राप्त करने की प्रक्रिया क्या है ?"

युवक का प्रत्युत्तर था, "नहीं, आप मुझे बताइए । भगवद्गीता कब लिखी गई ? अपने व्याख्यान में आप ने कहा है कि वह पाँच हजार वर्ष पूर्व लिखी गई थी, किन्तु अन्य स्वामियों का कहना है कि वह केवल डेढ़ हजार वर्ष पूर्व लिखी गई। आप मेरे प्रश्न का उत्तर दीजिए। पहले मैने पूछा है । "

श्रील प्रभुपाद ने क्रोध में अपनी आवाज ऊँची की, “मैं तुम्हारा सेवक नहीं हूँ। मैं कृष्ण का सेवक हूँ । तुम्हें मेरे प्रश्न का उत्तर देना होगा ।'

गर्मागर्म बहस शुरू हो गई। हिप्पी चिल्ला-चिल्ला कर प्रभुपाद से बोलने लगा और प्रभुपाद भी उसी तरह उत्तर देने लगे। अंत में भक्तों ने लड़के को मंच से हटा दिया ।

इस घटना से श्रोता - मंडली भ्रम में पड़ गई। बहुत से लोग जाने लगे। कुछ ने भक्तों से पूछना शुरु कर दिया, “आपके गुरु महाराज को क्रोध क्यों आ गया ?” उन्हें उस आदमी के प्रश्नों का उत्तर देना चाहिए था । " पण्डाल कार्यक्रम के समर्थक कुछ नागरिक नेता भी इस डर से बेचैन हो उठे कि प्रभुपाद ने श्रोताओं में प्रतिकूल प्रभाव उत्पन्न कर दिया था । किन्तु जिनके मन में भक्ति थी वे अपने स्थानों पर यह सुनने को बैठे रहे कि प्रभुपाद आगे क्या कहते हैं ।

भक्तों के लिए कुछ अकल्पनीय जैसा घटित हो गया था। प्रभुपाद ने अपने व्याख्यान के मध्य में एक सनकी हिप्पी को रंगमंच पर क्यों बुलाया, क्यों उसे बैठने का स्थान दिया, क्यों उसे बोलने के लिए माइक्रोफोन दिया, क्यों चिल्ल-पों की सीमा तक उससे बहस करने लगे ? और यह सब हुआ बीस हजार की श्रोता - मण्डली के सामने ।

भवानंद : एक व्यक्ति ने, जिसने पण्डाल समारोह के आयोजन में सहायता की थी, प्रतिवाद किया, "ओह ! स्वामीजी क्रोध में आ गए। यह अच्छा नहीं । किन्तु ऐसा लगता है कि श्रील प्रभुपाद ने यह जान-बूझकर किया था। उस शाम को वे बहुत देर तक यह बताते रहे थे कि भगवद्गीता को कैसे समझा जाना चाहिए और तब उन्होंने उस हिप्पी को रंगमंच पर आने दिया था। हमारे लिए यह अचरज भरा था। हम कुछ समझ नहीं सके ।

गिरिराज : श्रील प्रभुपाद वास्तव में पूरी घटना के द्वारा भगवद्गीता को समझने की प्रक्रिया को प्रदर्शित कर रहे थे। उस आदमी के जाने के बाद प्रभुपाद ने अपना व्याख्यान यह कह कर पूरा किया कि हमें कृष्ण या कृष्ण के प्रतिनिधि के प्रति विनम्र भाव रखना चाहिए, अपितु उनकी सेवा करनी चाहिए और उनसे जिज्ञासा करनी चाहिए न कि केवल चुनौती - पूर्ण प्रश्न पूछने चाहिए। पूरी घटना से यही बात स्पष्ट होती है।

यदुवर : श्रोता - मण्डली में बहुतों ने घटना को गलत ढंग से समझा। इससे मतभेद पैदा हुआ। किन्तु प्रभुपाद ने जो कुछ किया उसे समझने वालों के लिए स्पष्ट था कि वह हिप्पी बदमाश था और यह उपयुक्त समय था कि उसके मूर्खतापूर्ण प्रश्नों के विरुद्ध दिव्य क्रोध का प्रदर्शन किया जाय ।

तेजास : जब सब कुछ समाप्त हो गया तो प्रभुपाद ने हम लोगों को बताया, "यह ठीक वैसा ही है जैसे गोपियों का कृष्ण के लिए लोलुप होने पर, अर्जुन भी कृष्ण के लिये क्रोधित होता । अतः यह बुरा नहीं है कि कृष्ण के लिए एक भक्त को क्रोध आए ।” किन्तु भीड़ में से बहुतों की समझ में यह बात नहीं आई कि एक भक्त किस प्रकार निर्विशेष नहीं है। भारतीयों को, निर्विशेष योगियों को, जो किसी प्रकार का भाव प्रदर्शित नहीं करते, देखने का अभ्यास है। भीड़ में से अधिकांश लोग निर्विशेषवादी थे ।

पण्डाल कार्यक्रम की आखिरी रात में प्रभुपाद की कनाडा के उच्चायुक्त जेम्स जार्ज से वार्ता हुई:

मि. जार्ज : " आपने बहुत सारे कनाडा और अमेरिकावासियों को आकृष्ट किया है । "

प्रभुपाद : “मैने उन्हें आकृष्ट नहीं किया है, कृष्ण ने आकृष्ट किया है । "

मि. जार्ज : "सच है ।'

प्रभुपाद : " कृष्ण सर्व आकर्षक हैं। मैं केवल आकर्षित होने का साधन प्रस्तुत कर रहा हूँ। यही मेरा धंधा है। यह उसी तरह है जैसे एक चुम्बक लोहे को आकृष्ट करता है। यदि लोहे में जंग लग जाय तो चुम्बक की शक्ति उसे आकृष्ट नहीं कर सकती। इसलिए मेरा काम गन्दगी दूर करना है। इस प्रक्रिया का नाम है— चेतो दर्पण मार्जनम् । – अर्थात् हृदय का स्वच्छीकरण । "

" इस समय हम में से प्रत्येक व्यक्ति में यह सोचने की चेतना है, 'मैं यह शरीर हूँ।' चूँकि आप का जन्म कनाडा में हुआ था, इसलिए आप सोच रहे हैं कि आप कनाडा के हैं। चूँकि मेरा जन्म भारत में हुआ था, इसलिए मैं सोच रहा हूँ कि मैं भारतीय हूँ। और चूँकि उसका जन्म अमेरिका में हुआ था, इसलिए वह सोच रहा है वह अमेरिकन है । हम में से कोई भी अमेरिकन, कनाडियन या भारतीय नहीं है। हम सब जीवित प्राणी हैं।'

मि. जार्ज : "मुझे यह सब समझने में कोई कठिनाई नहीं है। किन्तु चेतना में यह परिवर्तन कैसे लाया जाय, उदाहरण के लिए पश्चिम में? मेरी समझ में आपका मिशन यही है । '

प्रभुपाद : " पश्चिम या पूर्व का प्रश्न नहीं है। यह दर्शन है, यह विज्ञान है । उदाहरण के लिए, गणित में दो और दो का जोड़ चार होता है। पश्चिम में और पूर्व में दोनों स्थानों में इसका एक ही अर्थ होता है। यह नहीं है कि पश्चिम में दो और दो का जोड़ पाँच होता हो और पूर्व में दो और दो का जोड़ तीन होता हो। हर स्थान में दो और दो का जोड़ चार ही होता है।

" अतएव मानव समाज में सबसे पहले यह समझ आनी चाहिए कि हम केवल ये शरीर नहीं हैं । यह सामान्य जानकारी की बात है। इस बिन्दु से चलने पर हमारे आध्यात्मिक ज्ञान में वृद्धि हो सकती है। यदि हम यही न जानें कि आत्मा क्या है तो फिर आध्यात्मिक ज्ञान में वृद्धि का प्रश्न ही कहाँ रह जाता है ?"

इस वार्तालाप के बाद मि. जार्ज प्रभुपाद के साथ रंगमंच पर गए और उनका परिचय श्रोता - मण्डली को दिया ।

" कई वर्षों से मैं इन स्वामीजी से मिलना चाह रहा था और जानना चाहता था कि उनमें ऐसा क्या है जो हमारे कनाडा और उत्तरी अमेरिका के इन सारे नवयुवकों को प्रभावित कर रहा है। मुझे आप के आमंत्रण पर यहाँ आने में प्रसन्नता हुई, और विशेष कर स्वामीजी से मिलने में। मैं समझता हूँ, जैसा कि कुछ देर पहले उन्होंने स्वयं मुझे बताया, कि वास्तव में कुछ घट रहा है। वह स्वयं कर रहे हैं या, जैसा कि उन्होंने कहा, उनके माध्यम से यह हो रहा है—यह बात महत्त्व की नहीं है। किन्तु कुछ हो रहा है और जिसे भी संदेह हो उसे यह देखने के लिए आज रात यहाँ होना चाहिए । कुछ घट रहा है, न केवल दिल्ली में, वरन् यह घट रहा है टोरन्टो में, क्लीवलैंड में, लास एंजीलीज में, न्यू यार्क में और सर्वत्र । यह क्या है ? मैं नहीं जानता कि वे इस प्रश्न का उत्तर कैसे देंगे। मेरे लिए, एक गहरे स्तर पर, जो कुछ घट रहा है वह एक जिज्ञासा का जागरण है । "

अपने व्याख्यान में प्रभुपाद ने शरीर की तुलना एक मशीन से की जिसे आत्मा रूपी ड्राइवर संचालित करता है । और आत्मा का स्वाभाविक दर्जा कृष्ण के सेवक के समान है। मिस्टर जार्ज को सम्बोधित करते हुए प्रभुपाद ने अपने व्याख्यान का समापन इस प्रकार किया ।

“यहाँ कनाडा के माननीय उच्चायुक्त उपस्थित हैं। मेरी प्रार्थना है कि चूँकि आप हमारे देश में आए हैं, इसलिए इस विचारधारा को समझने का प्रयत्न करें। मैने आप के देश, कनाडा, की यात्रा की है और, जैसा कि आपने उल्लेख किया है, वहाँ मान्ट्रियल, टोरन्टो, वान्कूअर, हैमिल्टन और ओटावा में हमारी पाँच शाखाएँ हैं। अतः लड़के संघर्ष कर रहे हैं। वे हमारी संस्कृति और इन पुस्तकों का वितरण कर रहे हैं और मुझे बहुत उत्साहवर्धक रिपोर्टें मिली हैं। बहुत से युवक भी आ रहे हैं। यह बहुत वैज्ञानिक आंदोलन है। इसलिए मैं प्रार्थना करता हूँ कि आप अपनी सरकार से कहें कि वह आपके देश में कृष्णभावनामृत आन्दोलन का प्रवेश कराने में इन लड़कों को सुविधा प्रदान करे। बहुत - बहुत धन्यवाद । हरे कृष्ण ।'

***

दस दिवसीय सफल पण्डाल - उत्सव जिसमें सात लाख लोगों ने भाग लिया था, के पश्चात् श्रील प्रभुपाद अपने शिष्यों को एक लघु पर्यटन पर वृंदावन ले गए। अपनी प्रचार - यात्राओं में वे अमृतसर, सूरत, इन्दौर, गोरखपुर, इलाहाबाद, प्रचार-यात्राओं वाराणसी जैसे स्थानों में हो आए थे, लेकिन वृन्दावन नहीं गए थे । पण्डाल उत्सव के लिए दिल्ली में इतने अधिक शिष्यों के इकट्ठा होने पर, प्रभुपाद ने इसे एक अच्छा अवसर समझा कि उन्हें निकट के वृंदावन की यात्रा कराई जाय ।

वे दो वाहनों में निकले, श्रील प्रभुपाद और अन्य चार श्रीमती कमला बख्शी की ऐम्बैसेडर कार में चले और चालीस भक्त एक किराए की बस में पीछे-पीछे आए। वृंदावन जाते समय दिल्ली-आगरा रोड पर, नगर के बाहर स्थित, कल-कारखानों, कृषि क्षेत्रों, बाग-बगीचों और गाँवों से गुजरते समय प्रभुपाद मौन बने रहे। कुछ घंटों की यात्रा के बाद जब वे वृंदावन के निकट पहुँचे तो प्रभुपाद ने ड्राइवर को एक गाँव और उस छोटे कस्बे के बीच स्थित मीठे पानी वाले कुएँ की ओर मुड़ने का आदेश दिया। वहाँ प्रभुपाद और उनके दल के लोगों ने जल पिया, ताजे फलों का नाश्ता किया और तब वे आगे बढ़े। छटिकरा रोड, जो सीधे वृंदावन को जाती थी, पहुँचने के पहले प्रभुपाद की कार खराब हो गई ।

तेजास : जब प्रभुपाद की कार खराब हो गई तो शेष यात्रा उन्होंने हम लोगों के साथ बस में पूरी की। प्रभुपाद के साथ हमारा सम्बन्ध बहुत श्रद्धा का था, यद्यपि एक ही बस में उनके साथ यात्रा करते हुए हम उनके अति निकट की स्थिति में थे । प्रभुपाद ने इस विषय में कभी कुछ नहीं कहा। उन दिनों हम वास्तव में बहुत कुछ एक परिवार की तरह थे— प्रभुपाद हम में से प्रत्येक को जानते थे और हम में से हर एक उनको जानता था और उनसे बात करता था, तब भी उनके प्रति हम बहुत श्रद्धालु थे ।

वृंदावन में मिस्टर जी. एल. सरार्फ नाम के सज्जन ने प्रभुपाद, उनके सचिवों और दल की महिला सदस्यों को अपने घर, सर्राफ भवन में ठहराया। शेष शिष्य निकट की एक धर्मशाला में ठहरे ।

प्रभुपाद वृन्दावन एक तीर्थयात्रा से अधिक उद्देश्य लेकर आए थे, वे इस्कान के निमित्त भूमिखण्ड के लिए प्रयत्न करने और उसे प्राप्त करने आए थे। सन् १९६७ ई. में जब वे अमेरिका से वृन्दावन आए थे तो उस समय वे स्वास्थ्य लाभ के लिए आए थे, किन्तु स्वस्थ होते ही उन्होंने वृंदावन में अपने शिष्यों के वास्ते एक स्थान खोजा था। उन्होंने एक " अमरीकी भवन" स्थापित करने का प्रयत्न किया था— एक ऐसा केन्द्र जहाँ उनके शिष्य वृंदावन के आदर्श वातावारण में रह कर कृष्णभावना की संस्कृति में प्रशिक्षण प्राप्त कर सकें और फिर वहाँ से बाहर जाकर प्रचार कर सकें। किन्तु दो महीने तक " अमरीकी भवन" की स्थापना की संभावना न दिखाई पड़ने पर वे चले गए थे।

लेकिन इस बार वे वृन्दावन में उस नगर के विख्यात विश्व राजदूत के रूप में आ रहे थे, जिसकी प्रसिद्धि पश्चिम में राधाकृष्ण और वृंदावन की महिमा के प्रचार के लिए हो चुकी थी। हरे कृष्ण आंदोलन की सफलता का व्यापक प्रचार भारत में हो रहा था, जबकि प्रभुपाद, अपने विदेशी शिष्यों के दल के साथ, नगर - नगर की यात्रा करके कीर्तनों का आयोजन कर रहे थे, श्रीमद्भागवतम् पर व्याख्यान दे रहे थे और पश्चिम के देशों में कृष्णभावनामृत के प्रसार के बारे में बता रहे थे। अतएव जब प्रभुपाद वृंदावन में अपने चालीस शिष्यों के साथ पहुँचे तो पूरे नगर में उनकी उपस्थिति की धूम मच गई।

वृंदावन की नगरपालिका ने उनके विधिवत् स्वागत का आयोजन किया जिसमें प्रमुख स्थानीय नागरिकों और साधुओं ने भाग लिया। नगर की ओर से एक प्रवक्ता ने श्रील प्रभुपाद और उनकी उपलब्धियों की सराहना की । "ओ महान् आत्मा, आज हम वृन्दावन के निवासी, जो ब्रजवासी कहे जाते हैं, इस पवित्र वृंदावन में एकजुट होकर आपका विनम्र भाव से स्वागत करते हैं और ऐसा करने पर हमें अत्यन्त गर्व का अनुभव हो रहा है। ... आप बहुत वर्षों तक राधा - दामोदर मंदिर में रहे हैं और आप ने ध्यानपूर्वक महामहिम राधाराणी की उपासना की है और इस प्रकार अब सारे विश्व के उद्धार करने की दिव्य दृष्टि आप ने प्राप्त की है। आपकी परिपूर्णता के प्रमाण के रूप में हम अपने समक्ष इन विदेशी शिष्यों को देख सकते हैं, और हम गर्व का अनुभव करते हैं यह देख कर कि आप ने इन्हें किस प्रकार विशुद्ध भक्तों के रूप में बदल दिया है ।

"वैदिक संस्कृति के महान् प्रचारक ! आपके पूर्व भी बहुत से महान् स्वामी विदेशों में गए थे, किन्तु अब आपने आश्चर्यजनक रूप में संकीर्तन आन्दोलन और भक्ति मार्ग की उदात्त विचार-धारा का प्रचार पश्चिम के देशों में किया है । और इस युग में यही एक मार्ग है संसार के सभी लोगों को शान्ति और समृद्धि देने का । धर्म और संस्कृति का प्रचार करने के लिए आपका पवित्र नाम सदैव जाज्वल्यमान रहेगा।

" हम निस्संकोच कह सकते हैं कि हम आपके प्रति बहुत आत्मीयता का अनुभव कर रहे हैं और स्वागत का यह मानपत्र प्रस्तुत करने का यह सुअवसर पाने से हमें पूर्ण संतोष की अनुभूति हो रही है। हम यह मान कर चल रहे हैं कि आप हम वृंदावनवासियों में से एक हैं। हमें पूरा निश्चय है कि आप जहाँ भी जायँगे, अपने साथ वृंदावन धाम का प्रभाव ले जायँगे । वृंदावन धाम की संस्कृति, धर्म, दर्शन, और दिव्य संस्थिति आपके साथ सर्वत्र यात्रा करती है। आपकी दिव्य विभूति द्वारा ले जाए गए महान् संदेश से समस्त संसार के लोग वृंदावन धाम के साथ आत्मीयता से जुड़ते जा रहे हैं। हमें पूर्ण विश्वास है कि केवल आपके प्रचार के माध्यम से वृंदावन का दिव्य संदेश समस्त विश्व में फैल जायगा । हमारी कामना है कि आप अपने इन सत्कार्यों में सफलता से मण्डित हों । "

तत्पश्चात् प्रभुपाद बोलें । उन्होंने यह समझाते हुए आरंभ किया कि किस प्रकार कृष्णभावनामृत संघ विश्व स्तर पर दैव - वर्णाश्रम की स्थापना का प्रयत्न कर रहा है।

" हमें यह नहीं सोचना चाहिए कि कृष्ण हिन्दू या भारतीय हैं। कृष्ण सब के लिए हैं। ये विदेशी कृष्णभावनामृत को यह समझ कर स्वीकार कर रहे हैं कि कृष्ण सब के लिए हैं। वे धार्मिक सिद्धान्तों का हिन्दू, मुस्लिम या ईसाई जैसा कोई रूप स्वीकार नहीं कर रहे हैं। ये निर्धारित धर्म हैं। यदि मैं अपने को हिन्दू कहूँ तो यह मेरा धर्म नहीं है—यह मेरी निर्धारित उपाधि है। क्योंकि मेरा जन्म एक हिन्दू परिवार में हुआ है, इसलिए मैं अपने को हिन्दू कहता हूँ । या क्योंकि मेरा जन्म एक विशेष देश में हुआ है, इसलिए मैं अपने को अमेरिकन या भारतीय कहता हूँ । किन्तु हमारा कृष्णभावनामृत संघ ऐसी निर्धारित उपाधियों के लिए नहीं है। यह कृष्णभावनामृत सर्वोपाधिविनिर्मुक्तम् है। जब कोई सभी निर्धारित उपाधियों से मुक्त हो जाता है तब वह कृष्णभावनामृत को स्वीकार कर सकता है। जब तक कोई हिन्दू, मुस्लिम या ईसाई बना है, तब तक उसके लिए कृष्णभावनामृत का कोई प्रश्न नहीं है।

" अतएव ये लड़के या लड़कियाँ, महिलाएँ या पुरुष जो मेरे साथ आ गए हैं अपनी उपाधियों का त्याग कर चुके हैं। अब वे कनाडियन, अमेरिकन या ऑस्ट्रेलियन नहीं रह गए हैं। अब वे अपने को कृष्ण के शाश्वत सेवक मानते हैं। बिना इसके, भौतिक प्रदूषणों से मुक्त होने का प्रश्न नहीं है। जब तक भौतिक प्रदूषण बना है हमें शास्त्रों के अनुसार ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र, ब्रह्मचारी, गृहस्थ, वानप्रस्थ, संन्यास आदि सामाजिक वर्गों और आश्रमों का विधान करना पड़ता है। ये सभी भौतिक उपाधियाँ हैं। लेकिन यह कृष्णभावनामृत-आंदोलन उन भौतिक उपाधियों को लांघ जाने के लिए है और इन विदेशियों की शिक्षा इसी आलोक में हो रही है।

“जब २६, सेकंड एवन्यू, न्यू यार्क में मैने प्रचार आरंभ किया तो केवल आधा दर्जन लड़के मुझे सुनने के लिए आते थे। सुनने का तात्पर्य यह है कि मैं गाता था, हरे कृष्ण मंत्र का कीर्तन करता था और भगवद्गीता से कुछ श्लोक पढ़ता था और वे धैर्यपूर्वक मुझे सुनते थे । — क्योंकि मैं जानता हूँ की यदि कोई धैर्यपूर्वक कृष्ण के पवित्र नाम या उनकी लीलाओं को सुनता है तो — शृण्वताम् स्वकथाः कृष्णः - कृष्ण उसे भीतर से पवित्र कर देते हैं ।

“ अतः इन लड़कों और लड़कियों के साथ भी वास्तव में यही हुआ । मैं लड़के-लड़कियाँ कहता हूँ, क्योंकि पाश्चात्य देशों में इनमें कोई भेद नहीं है। इन्हें समान स्वतंत्रता मिलती है। हमारे देश में अब भी भेद-भाव है । मेरा तात्पर्य है कि सयाने लड़कों और लड़कियों को स्वतंत्रतापूर्वक आपस में मिलने-जुलने नहीं दिया जाता, यद्यपि अब यह होने लगा है। लेकिन योरोपीय देशों में ऐसा कोई बंधन नहीं है। इसलिए लड़के-लड़कियों के बीच भेद-भाव करने की कोई संभावना नहीं थी । इसलिए उनमें से बहुत से हमारे साथ उपस्थित हैं। मैं टाम्पकिंस स्क्वायर पार्क में कीर्तन किया करता था और ये लड़के और लड़कियाँ मुझे घेर लेते थे और नाचने तथा हरे कृष्ण मंत्र गाने लगते थे। उनमे से कुछ थोड़ा आगे बढ़े, शुद्ध हुए और आगे होकर बोले, “स्वामीजी, कृपा करके मुझे अपना शिष्य बना लीजिए । "

" इसलिए मेरी शर्त थी कि जो कोई मेरा शिष्य बनना चाहता है उसका चार प्रकार के दुष्कर्मों से मुक्त होना जरूरी है : स्त्रियों के साथ अवैध सम्बन्ध, मांस भक्षण, मादक द्रव्य सेवन, द्यूत-क्रीड़ा। इस प्रकार इन शर्तों पर ये लड़के और लड़कियाँ मेरे शिष्य - शिष्याओं के रूप में स्वीकृत हुए । पञ्चरात्रिकी विधि के अनुसार जब ये काफी आगे बढ़ जाते हैं तो मेरे गुरु महाराज कृष्णकृपाश्रीमूर्ति भक्तिसिद्धान्त सरस्वती गोस्वामी प्रभुपाद के आदेशानुसार, उनका उपनयन संस्कार किया जाता है। शास्त्रानुसार उन्हें म्लेच्छ या यवन परिवारों से आया हुआ नहीं माना जाना चाहिए, क्योंकि अब उनका शुद्धीकरण हो गया है। ऐसा उल्लेख शुकदेव गोस्वामी द्वारा श्रीमद्भागवतम् में भी किया गया है, और आप इसे जानते हैं :

किरात-हूणान्ध्र - पुलिन्द - पुल्कशा आभीर- शुम्भा यवनाः खसादयः

येऽन्ये च पापा यद्-अपाश्रयाश्रयाः शुद्धयन्ति तस्मै - प्रभविष्णवेनमः

शुद्ध कैसे हों ? – सच्चे प्रामाणिक आध्यात्मिक गुरु की शरण में जाकर । अतः पञ्चरात्रिकी - विधि के अनुसार ये सभी शुद्ध हैं और उनमें से बहुतों के पास यज्ञोपवीत भी हैं। "

प्रभुपाद बताते रहे कि पवित्र नाम में हर किसी को उन्नत बनाने की शक्ति चाहे उसका जन्म जहाँ भी हुआ हो। उन्होंने हरिदास ठाकुर का उदाहरण दिया, जो जन्म से मुसलमान होते हुए भी, पवित्र नाम के जप के आचार्य स्वीकृत हुए थे । प्रभुपाद ने कृष्णभावनामृत की गत्यात्मकता का भी वर्णन किया और बताया कि किस प्रकार, रूप गोस्वामी के युक्त वैराग्य सिद्धान्त के अनुसार, कृष्णभावनामृत-आंदोलन भौतिक वस्तुओं को कृष्ण की सेवा में प्रयुक्त कर रहा है।

" पाश्चात्य देशों में लोगों की स्थिति बहुत वैभवपूर्ण है। मेरे शिष्य मुझे ऐसा आवास देते हैं जिसकी कल्पना एक राज्यपाल भी नहीं कर सकता। मुझे स्मरण है कि कुछ समय पहले लखनऊ में मैं एक रात एक सरकारी मकान में अतिथि था । उस समय विश्वनाथ दास गवर्नर थे; वे मेरे परिचित थे । अतः मुझे उस वैभवपूर्ण मकान का स्मरण है जहाँ एक रात मैने विश्राम किया था । किन्तु मेरे ये शिष्य मुझे सब कुछ दे रहे हैं । हम उसे ठुकरा नहीं सकते, क्योंकि अमेरिका में जीवन स्तर यही है। आप यह नहीं कह सकते— 'नहीं; मैं इस बढ़िया कक्ष में नहीं सोऊँगा । मैं सड़क में सोऊँगा । मैं एक संन्यासी हूँ ।' तब मेरा सम्मान कोई नहीं करेगा। अमेरिका में रहन-सहन का स्तर इसी प्रकार का है । इसलिए रूप गोस्वामी कहते हैं कि आप किसी चीज में आसक्ति न होने दें, किन्तु यदि कृष्ण के सेवार्थ आप को ऐसी चीजों का सेवन करना पड़े तो आप उन्हें स्वीकार करें।

" लोग माया की सेवा में आसक्त हैं, किन्तु हम हर वस्तु का उपयोग भगवान् की सेवा में करना चाहते हैं । यही कृष्णभावनामृत आंदोलन है। इसलिए हम वायुयान का इस्तेमाल करते हैं, डिक्टाफोन का इस्तेमाल करते हैं और टेलीटाइप मशीन का इस्तेमाल करते हैं। अपना फर्श साफ करने के लिए भी हम मशीन का इस्तेमाल करते हैं। यह जीवन प्रणाली की बात है । हमारे हर केन्द्र में कई नई कारें हैं। उनके बिना काम नहीं चल सकता । योरप और अमेरिका में सामान्यतः कोई भद्र पुरुष सड़क में पैदल नहीं चलता । वहाँ की जीवन-पद्धति यही है। इसलिए हमें स्वीकार करना पड़ता है, लेकिन हमें उनमें आसक्त नहीं होना चाहिए। हमारी आसक्ति केवल कृष्ण में होनी चाहिए और कृष्ण के सेवार्थ हम कोई भी वस्तु स्वीकार कर सकते हैं । यही कृष्णभावनामृत-आंदोलन है । '

प्रभुपाद ने अपने व्याख्यान की समाप्ति जमीन की माँग के साथ की। वे अपने संघ के लिए वृंदावन में एक मंदिर की स्थापना करना चाहते थे ।

बाद में मोटर पार्ट्स के विक्रेता, एक सज्जन मि. एस. ने, जो वृंदावन में रहते थे, एक भूमिखण्ड प्रभुपाद को देने की सहमति दी जिसे उनके परिवार ने किसी उपयुक्त धार्मिक उद्देश्य के लिए सुरक्षित रखा था। प्रभुपाद मुसकराए। वे वृंदावन में अभी पहुँचे ही थे कि कृष्ण इस्कान केन्द्र की स्थापना के लिए उन्हें सुअवसर प्रदान करने लगे थे। प्रभुपाद ने मि. एस. को भगवान् कृष्ण की सेवा में जमीन देने के लिए धन्यवाद दिया। उनके भूमि अनुदान से- कृष्णभावनामृत-आंदोलन का संवर्धन होगा और दाता, मि. एस., लाभान्वित होंगे।

प्रभुपाद अभिज्ञ थे कि वृंदावन के प्रमुख नागरिकों की ओर से उनका जो औपचारिक स्वागत-सत्कार हो रहा था उसके पीछे गहरे दुराव, यहाँ तक कि संदेह, की भावना छिपी थी, विशेष कर वृंदावन के बड़े-बड़े मंदिरों का स्वामित्व रखने वाले जातिगोस्वामियों में । श्रील प्रभुपाद के विदेशी शिष्यों को एक प्रकार का भक्त स्वीकार करते हुए भी वृंदावन के बहुत-से निवासी इन विदेशी वैष्णवों को ब्राह्मण, संन्यासी या पुजारी के रूप में स्वीकार करने के अनिच्छुक थे । यह भ्रामक धारणा इस पारम्पारिक हिन्दू विचारधारा के कारण थी कि केवल ब्राह्मण परिवारों में उत्पन्न लोग ही ब्राह्मण हो सकते हैं।

किन्तु प्रभुपाद भक्तिसिद्धान्त सरस्वती के चरण - चिह्नों पर चल रहे थे जो मुक्त भाव से किसी को भी स्वीकार कर लेते थे— चाहे उसकी सामाजिक स्थिति कुछ भी हो और वह पुरुष हो या स्त्री । जब १९३२ ई. में भक्तिसिद्धान्त सरस्वती अपने एक हजार से अधिक अनुयायियों को लेकर वृन्दावन की तीर्थयात्रा पर आए थे तब कुछ गध जाति ब्राह्मणों ने इन तीर्थयात्रियों को मंदिरों में प्रवेश नहीं करने दिया था । उन पर पत्थर फेंक कर उन्हें परेशान किया गया था और दूकानदारों ने उनका बहिष्कार किया था । उस समय भक्तिसिद्धान्त सरस्वती वहाँ के ब्राह्मणों से मिले थे और शास्त्रों के आधार पर सिद्ध करके उन्हें दिखाया था कि आत्मा, दिव्य होने के कारण, उपाधियों से मुक्त है और जो कोई वैष्णव हो जाता है वह स्वयमेव ब्राह्मण होने की योग्यता अर्जित कर लेता है । किन्तु विरोध - भावना चलती रही थी ।

श्रील भक्तिसिद्धान्त का अनुगमन करते हुए प्रभुपाद ने भी इनकार किया कि गोस्वामी की उपाधि उत्तराधिकार में प्राप्त की जा सकती है। गोस्वामी का तात्पर्य उससे है जो अपनी इन्द्रियों को वशीभूत कर ले और यह उपाधि किसी द्वारा केवल इसलिए नहीं धारण की जा सकती कि उसका जन्म तथाकथित गोस्वामियों के परिवार में हुआ है।

वृंदावन के मूल गोस्वामी ये छह थे : श्री सनातन, श्री रूप, श्री रघुनाथ भट्ट, श्री जीव, श्री गोपाल भट्ट एवं श्री रघुनाथ दास गोस्वामी । ये सभी संन्यासी थे । अतः संतानविहीन थे । लगभग पाँच सौ वर्ष पूर्व इन गोस्वामियों ने वृंदावन में कृष्ण के लीला- स्थलों की खोज की थी और वृंदावन में पहले विशाल मंदिरों का निर्माण कराया था। अपने मंदिरों में विग्रह की पूजा-अर्चना के लिए उन्होंने विवाहित शिष्य नियुक्त किए थे और अब उन मूल पुजारियों के वंशज वृंदावन के मंदिरों के गोस्वामियों के रूप में एकाधिकार का दावा कर रहे थे ।

प्रभुपाद ने इस मामले में अपने गुरु महाराज के संघर्ष के सम्बन्ध में नेक्टर आफ डिवोशन (भक्ति रसामृत - सिन्धु) में लिखा था :

भगवान् चैतन्य के महान् पार्षद, महाप्रभु नित्यानंद, के तिरोभाव के पश्चात् पुरोहितों के एक वर्ग ने नित्यानंद के वंशज होने का दावा किया और अपने को गोस्वामी जाति के कहने लगे। उन्होंने यह भी दावा किया कि भक्ति-विधान और भक्ति के प्रचार का अधिकार केवल उनके विशेष वर्ग को है जो नित्यानंद - वंश कहलाता था । इस तरह उन्होंने अपने छद्म अधिकार का प्रयोग कुछ समय तक किया, जब तक कि गौड़ीय वैष्णव सम्प्रदाय के प्रभावशाली आचार्य, श्रील भक्तिसिद्धान्त सरस्वती ठाकुर ने उनकी धारणा को पूर्णतया ध्वस्त नहीं कर दिया। कुछ समय तक घोर संघर्ष चलता रहा लेकिन उसकी परिणति सफलता में हुई और अब यह ठीक ही स्थापित हो गया है कि भक्ति किसी विशेष वर्ग तक सीमित अधिकार नहीं है।

अतएव प्रभुपाद ने जाति गोस्वामियों के जन्म - अधिकार की विचारधारा का विरोध किया। और जाति गोस्वामियों को प्रभुपाद के आंदोलन से डर था, क्योंकि यह उनके जन्मजात सामाजिक प्रभुत्व को चुनौती देता था । तब भी पाश्चात्य जगत में वृंदावन की महिमा का प्रचार करने के बाद उनकी विजयपूर्ण वापसी के इस अवसर पर, किसी ने उनके मंदिर स्थापना के प्रयत्नों का विरोध नहीं किया। जो असहमत थे वे मौन साध गए या प्रशंसा के फूल बरसाने लगे ।

यह स्थान रमण - रेती में था। प्रभुपाद ने देखा कि यह जागीर वृन्दावन के बाहर व्यस्त छटिकरा सड़क पर स्थित है जो वृंदावन को जाने वाली मुख्य सड़क है और आगरा और ताजमहल का मुख्य यातायात मार्ग है। यह भूमि वृंदावन - परिक्रमा पथ के भी निकट है जहाँ से होकर प्रति वर्ष लाखों यात्री वृंदावन की परिक्रमा करते हैं और इसके मंदिरों तथा पवित्र स्थानों का दर्शन करते हैं।

रमण-रेती (अर्थात् रमणीक बालू) प्रायः जंगल थी जिसमें कुछ आश्रम थे और परित्यक्त खेत थे। यह कृष्ण के प्रिय स्थल के रूप में विख्यात है जहाँ पर पाँच हजार वर्ष पूर्व वे अपने भाई बलराम और ग्वालों के साथ खेला करते थे। रमण - रेती ईश्वर के दिव्य प्रेम से ओत-प्रोत थी जो वृंदावन का विशिष्ट वातावरण है।

यद्यपि अनेक नगर अधिकारियों ने यदा-कदा चर्चा की थी कि नगर भूमि का अनुदान कर सकता है, किन्तु प्रभुपाद ने श्री एस. के प्रस्ताव को अधिक गंभीरता से लिया । मि. एस. ने बताया कि यद्यपि बहुत से अन्य साधू उस भूमि की माँग कर रहे थे, किन्तु वे और उनकी पत्नी अभी किसी निर्णय पर नहीं पहुँचे थे; वे ऐसे समुदाय को वह भूमि देना चाहते थे जो यथाशीघ्र उस पर राधाकृष्ण का मंदिर बनवा सके। जब प्रभुपाद ने विश्वास दिलाया कि वे ऐसा करेंगे तो मि. एस. ने वचन दिया कि वह भूमि अब प्रभुपाद की हो गई ।

प्रभुपाद ने ऐसे वादे पहले भी सुने थे और प्रायः वे झूठे साबित हुए थे किन्तु इस प्रस्ताव को गंभीर समझ कर उन्होंने अपने कुछ शिष्यों को वृंदावन में रहने के लिए नियुक्त कर दिया कि मि. एस. के साथ इकरारनामा तैयार करा सकें।

इस बीच प्रभुपाद अपने शिष्यों को वृन्दावन के बहुत से महत्त्वपूर्ण पवित्र स्थानों की तीर्थयात्रा पर ले गए : बरसाना ( श्रीमती राधाराणी का जन्मस्थान ), गोकुल ( कृष्ण की प्रथम लीलाओं का स्थल ), राधाकुण्ड, गोवर्धन और वृंदावन के बड़े मन्दिर । गोवर्धन पर प्रभुपाद ने अपने शिष्यों से कहा कि वे गोवर्धन पर्वत पर पैर न रखें या गोवर्धन पर्वत से कोई पत्थर न उठाएँ । गोवर्धन पर्वत कृष्ण से अभिन्न है। गोवर्धन पर्वत पर प्रभुपाद अपने शिष्यों को एक छोटे से मंदिर में ले गए और वहाँ उन्हें कृष्ण का चरण चिह्न दिखाया। चरण चिह्न बहुत बड़ा था। भक्तों को आश्चर्य हुआ कि यदि कृष्ण के चरण इतने बड़े थे तो वे अवश्य आठ फुट के रहे होंगे। प्रभुपाद ने कहा, “हाँ, उस समय वे और बड़े थे ।"

गोवर्धन के निकट, बिन्दु सरोवर में, जो राधा और कृष्ण के प्रथम मिलन का स्मारक स्वरूप जलाशय है, भक्तों ने तैरते हुए स्नान किया जबकि प्रभुपाद ने निकट के मैदान में बाल्टियों के जल से नहाया। बाद में जब प्रभुपाद प्रसाद ग्रहण करने लगे तो भक्त, कुत्तों को पत्थर मार कर और चिल्लाकर भगाने में लग गए, लेकिन प्रभुपाद ने उन्हें मना किया और कहा, “छोड़ो उन्हें ।” और वे अपनी प्लेट से कुत्तों को प्रसाद फेंकने लगे।

राधाराणी के जन्मस्थान बरसाना में, भक्तगण प्रभुपाद को एक पालकी में बैठाकर ढालू सीढ़ियों को पार कर मंदिर तक ले गए। पहाड़ी के सिरे से उन्होंने दूर स्थित एक दूसरी पहाड़ी की ओर देखा । इशारा करते हुए उन्होंने कहा, 'वहाँ देखो, कृष्ण उस पहाड़ी से नीचे आया करते थे और राधा इस पहाड़ी से नीचे जाया करती थीं, और वे दोनों मध्य में मिलते थे। वहाँ घना जंगल था । अतएव यह एक विशेष स्थल है, क्योंकि यह राधा और कृष्ण का मिलन - स्थल है । "

प्रत्येक पवित्र स्थान में प्रभुपाद बैठ जाते थे और कीर्तन कराते थे और विग्रह के सम्मुख जाकर प्रणति निवेदन करते थे। तब वे संक्षेप में उस स्थान से सम्बद्ध कृष्ण की लीलाओं का वर्णन करते थे।

दीनदयाद्रि : तीर्थस्थानों में भारतीय, पैसे मांगने के लिए प्रभुपाद का हमेशा पीछा करते रहते। वे सोचते थे कि उनके शिष्य, अमरीकी होने के कारण, धनी हैं, इसलिए वे पैसे माँगते थे। प्रभुपाद कुछ दे देते, लेकिन वे इतने अधिक थे कि ज्योंही प्रभुपाद एक को कुछ देते त्योंही उन्हें आधे दर्जन अन्य घेर लेते और उन्हें आगे बढ़ने से रोक देते। कुछ मंदिरों में उन्होंने हमें अंदर नहीं जाने दिया ।

तत्पश्चात् प्रभुपाद अपनी टोली को यमुना के किनारे उस स्थान पर ले गए जहाँ कृष्ण ने अपनी माता को अपने मुख में पूरा ब्रह्माण्ड दिखाया था । जल का स्पर्श करते हुए प्रभुपाद ने कहा, “मुझ जैसे बूढ़े व्यक्ति के लिए यह बहुत अधिक ठंडा है। लेकिन तुम लोग स्नान करो। मैं अपने सिर पर कुछ बूंदें डाल लूँगा।” उन्होंने स्त्रियों को एक अन्य स्थान पर तैरने के लिए निर्देशित किया जहाँ भारतीय महिलाएँ नहाती थीं और पुरुष पानी में कूद पड़े और तैरने लगे। वे जलक्रीड़ा करते रहे और किनारे पर खड़े प्रभुपाद उन्हें देखते रहे । एकाएक प्रभुपाद ने एक गमछा पहन लिया, नदी के तीर तक गए, अपने सिर पर कुछ जल छिड़का और तब घुटने तक पानी में चलते गए । यमुना के जल में डुबकी लगाकर वे भक्तों के साथ एक-दूसरे पर जल छिड़कते हुए नहाने लगे, यह देख कर भक्त प्रसन्नता से विह्वल हो उठे ।

प्रभुपाद ने निर्णय किया कि वे मि. सराफ के घर पर अपने कमरे में ठहरे रहेंगे जबकि उनके पुराने मित्र हितसरन शर्मा भक्तों को वृन्दावन के प्रसिद्ध मंदिरों में ले गए। लेकिन प्रभुपाद अपने शिष्यों के साथ राधा - दामोदर मंदिर जरूर गए जहाँ १९६५ ई. में अमेरिका जाने के पूर्व, वे कई वर्ष रह चुके थे और श्रीमद्भागवतम् तथा बैक टु गॉडहेड पत्रिका लिखते रहे थे।

राधा दामोदर मंदिर में प्रभुपाद ने भक्तों को वृंदावन में एक इस्कान मंदिर बनाने की अपनी योजना के विषय में बताया और उन्होंने राधा - दामोदर मंदिर के पुजारी को सुझाव दिया कि इस्कान को राधा - दामोदर मंदिर का प्रयोग करने दें।

प्रभुपाद ने कहा, “हम पूरा मंदिर बढ़िया ढंग से सुसज्जित करेंगे और विग्रह के लिए चाँदी का एक सिंहासन बनाएँगे। पचास से सौ तक लोग यहाँ प्रसाद ग्रहण करेंगे। यह अनन्य होगा। यदि आप चाहें तो हम यह कर सकते हैं। अन्यथा, हम किसी और जगह अपना मंदिर बनाएँगे। हम धन खर्च करने को तैयार हैं। यदि आप अवसर दें तो हम यहाँ खर्च करेंगे। हम इसे वृंदावन में महान् उत्सव का केन्द्र बनाना चाहते हैं, क्योंकि यह जीव गोस्वामी का स्थान है । रूप गोस्वामी और जीव गोस्वामी कभी यहाँ बैठते थे। हमारे पास साहित्य है, हमारे पास पुस्तकें हैं। संसार भर के लोग हमारा साथ दे रहे हैं। "

यमुना देवी दासी : कृष्णकृपाश्रीमूर्ति प्रभुपाद प्राय: यह संकेत देते रहते कि वे कितना अधिक चाहते थे कि राधा - दामोदर मंदिर में उनके कमरों का रख-रखाव बढ़िया ढंग से हो। उन कमरों के प्रति उनके मन में अत्यधिक लगाव था । एक रात सराफ भवन में रहते हुए वे राजी हुए कि राधा दामोदर मंदिर के अपने कमरों में वे एक बार लगातार पूरे चौबीस घंटे रहेंगे। हम लोगों के लिए यह घटना बड़ी उन्मेषकारी थी जिसकी हम उत्सुकता से प्रतीक्षा करने लगे । राधा - दामोदर मंदिर में अपने साथ रात बिताने के लिए उन्होंने तीन या चार शिष्यों का चयन किया ।

सराफ भवन सेवा कुंज से, जहाँ राधा दामोदर मंदिर स्थित है, कुछ दूर था। मैं बड़े तड़के उठी और वृंदावन की सड़कों को पार करती हुई राधा दामोदर मंदिर पहुँच गई। मैने देखा कि प्रभुपाद के सोने के कमरे में लाल पत्थर की जालीदार खिड़कियों और लकड़ी के शटर्स से रोशनी आ रही थी। वे आगे-पीछे घूमते हुए जप कर रहे थे।

मुझे आश्चर्य हुआ कि एकाएक लकड़ी के दरवाजे खुल गए और आँगन का एक कोना प्रकाश की किरणों से भर गया। प्रभुपाद अपने कमरे में प्रकाश के एक नंगे बल्ब के नीचे खड़े थे। जब उन्होंने मुझे देखा तो पूछा, तुम यहाँ कैसे पहुँची ?" मैने कहा कि मैं पैदल पहुँची थी। वे बोले, “ओह, यह ठीक नहीं। सड़क में बहुत खतरे हैं। वहाँ बहुत सारे आवारा कुत्ते होते हैं। डकैत भी होते हैं। इस क्षेत्र में कोई एक लोटे के लिए भी जान ले सकता है।

इस तरह प्रभुपाद से कुछ डाँट मिली तो दूसरी ओर वे प्रसन्न भी लग रहे थे। वे बोले, "तो तुम मंत्र का जप कर रही हो ?” और मैने कहा, “हाँ श्रील प्रभुपाद ।" वे बोले, "यह बहुत अच्छा है। रूप गोस्वामी की समाधि पर जाओ और वहीं मंत्र का जप करो।

तब चार बजे के आसपास अन्य दर्शनार्थी प्रातः कालीन आरती कार्यक्रम के लिए एक-एक करके आने लगे। प्रभुपाद वहाँ आए जहाँ हम लोग जप कर रहे थे और उन्होंने कहा कि राधा - दामोदर मंदिर में यह कोना आध्यात्मिक संसार के चक्के में केन्द्र की तरह है। उन्होंने अनुरोध किया कि उनके कमरे का रख-रखाव ठीक से हो और उसकी सफाई हर दिन की जाय।

राधानाथ : मैं प्रभुपाद से बम्बई में थोड़ी देर के लिए मिला था और तदनन्तर अकेले ही वृंदावन में रहने के लिए चला गया था। मैं वहाँ स्थानीय लोगों के साथ छह महीने रहा और वहाँ ही कृष्णभावनामृत से मेरा वास्तविक लगाव हुआ । मैं अन्य बाबा लोगों के साथ नदी तट पर रहता था — बहुत सरल ढंग से। मैं जानता हूँ कि प्रभुपाद के साथ उस प्रथम संसर्ग के कारण ही मुझ में ऐसा बीजवपन हुआ था ।

एक दिन कीर्तन करते हुए अमरीकी भक्तों से भरी एक बस वृंदावन आ पहुँची और मैं सोचने लगा, “ ओह ! वे यहाँ फिर आ गए।" मैने जो पहली बात पूछी, वह थी, " क्या प्रभुपाद आ रहे हैं?" और उन्होंने कहा, “हाँ, प्रभुपाद आए हैं। वे कल सवेरे बोलेंगे।"

वृंदावन के कई गुरुओं के प्रति मेरे मन में आकर्षण हो चुका था — उनमें प्रभुपाद के गुरुभाई थे और अन्य सम्प्रदायों के भक्त भी थे। किन्तु जब मैं सवेरे भागवतम् की कक्षा में आया और प्रभुपाद को 'जय राधा माधव' का गायन करते हुए सुना तो मैं वहाँ बैठ गया और सुनता रहा । कृष्ण के प्रति प्रेम की ऐसी गुणवत्ता से युक्त दूसरा व्यक्ति मैने कभी नहीं देखा था। भारत- वर्ष में मैने जितने महान पुरुष देखे थे वे महत्त्वहीन हो गए, जब मैने प्रभुपाद को 'जय राधा माधव' का गायन करते देखा । वे इतने तल्लीन और गंभीर थे और उनकी भक्ति की गुणवत्ता इतनी गहन थी कि मुझे सहसा विश्वास नहीं हो रहा था।

वे कभी कभी मेरी ओर देख लिया करते थे, यह एक तरह का संकेत था कि उन्हें याद है कि मैं बम्बई से हूँ। तदनन्तर वे प्रवचन करने लगे और वृंदावन की महिमा का बखान उन्होंने बड़े ही अच्छे ढंग से किया। उन्होंने बताया कि वृंदावन कितना आश्चर्यजनक है और वहाँ का वातावरण कितना आध्यात्मिक है। और उन्होंने यह भी बताया कि वहाँ के वातावरण का लाभ पाने के लिए भक्तों को कितना सावधान रहना चाहिए ।

उस दिन से मैं सोचने लगा, “यही मेरे गुरु महाराज हैं, "केवल उनके बोलने के ढंग के कारण । उनका व्याख्यान इतना सुस्पष्ट और ऐसा सर्वग्राही था कि उन्होंने अन्य सभी विचारधाराओं और शिक्षकों को, जिनके बारे में मैं जानता था, उसमें समेट लिया था। मैने यह भी देखा कि प्रभुपाद का दृष्टान्त विशुद्ध था और उनके शिष्य पापपूर्ण जीवन का वास्तव में त्याग कर रहे थे । मैं उनके दर्शन के लिए नित्य जाया करता था, यद्यपि मैं अभी भी यमुना के तट पर रहे जा रहा था।

वृंदावन के सभी लोग प्रभुपाद की महिमा का बखान कर रहे थे। उन्हें उन पर गर्व था, क्योंकि वृंदावन के लोग वृंदावन पर आसक्त हैं। वे कृष्ण से प्रेम करते हैं और वे वृंदावन पर आसक्त हैं, क्योंकि वृंदावन वह स्थान है जहां कृष्ण रहते हैं। यही उनकी प्रवृत्ति है। वे वृंदावन की भूमि की उपासना करते हैं । किन्तु उन्होंने मुझे बताया कि वे प्रभुपाद के प्रशंसक हैं। उनमें से अधिकतर लोग उन्हें 'स्वामी भक्तिवेदान्त' कहते थे। वे कहते कि " वे सब से महान् संत है क्योंकि वे वृंदावन का प्रचार सारे विश्व में कर रहे हैं। वृंदावन की महिमा का ज्ञान वे समस्त विश्व को करा रहे हैं। "

तब एक दिन प्रभुपाद और उनके शिष्य रमण-रेती के एक आश्रम में गए। मैं वहाँ देर से उस समय पहुँचा जब प्रभुपाद वहाँ से जा रहे थे । उन्हें टैक्सी तक पहुँचने में करीब बीस गज रह गए थे और बहुत-से ब्रजवासी उन्हें मार्ग में दण्डवत् प्रणाम कर रहे थे। मैंने अपने को बहुत नगण्य अनुभव किया, भीड़ के अन्य सदस्यों की भाँति । और जब प्रभुपाद मेरे पास से होकर गुजरे तो मैंने भी पूरी तरह उन्हें दण्डवत् प्रणाम किया ।

जब मैंने उठने के लिए अपना सिर उठाया तो मैने देखा कि प्रभुपाद के चरण ठीक मेरे सामने थे। मैने सोचा, “ओह, मेरे भगवान्, प्रभुपाद ठीक मेरे सामने खड़े हैं। मैने धीरे-धीरे उनकी ओर देखा और प्रभुपाद ठीक वहाँ खड़े मेरी ओर देख रहे थे। उन्होंने मेरी आँखों में कुछ सेकंडों तक देखा और उसके बाद कहा, “तो तुम वृंदावन में कितने समय से हो ?” मैंने कहा, " करीब छह महीने से, श्रील प्रभुपाद ।” उन्होंने मेरी ओर फिर देखा और वे बहुत गंभीर मनोदशा में थे, बहुत दयाद्र, मेरी आँखों में देखते हुए । उन्होंने सिर हिलाया और कहा, "क्या तुम्हें यहाँ रहना अच्छा लगता है ?" मैं बोला, “मैं अपने जीवन में जिन जगहों में रहा हूँ उनमें यह सबसे अद्भुत है । '

तब एकाएक उनकी गंभीर मुद्रा सुंदर मुसकान में बदल गई। उनकी आँखों में गहरी चमक थी और वे पाँच या दस सेकंड तक मुझे देखते रहे। मुझे यह बहुत लम्बा समय लगा। मुझे विश्वास नहीं हो रहा था कि वे मुझ पर इतनी कृपा बरसा रहे हैं और तब उन्होंने उत्तर दिया, "यह बहुत अच्छा है। वृंदावन अद्भुत स्थान है।" तब वे आगे बढ़ गए।

मेरे लिए यह बहुत विशेष बात थी, क्योंकि अधिकतर भक्त मुझ से हमेशा यही कहते थे कि वृंदावन में मेरे रुकने का कारण मेरा माया में फँसना है और वृंदावन में मैं अपने कार्यक्रम से एक प्रकार से बँधा हूँ। मैं अनुभव कर रहा था कि भक्तों को समझ नहीं है और मुझे उन पर क्रोध आता था, सोच कर कि वे वृंदावन के वातावरण को नहीं समझ रहे थे। अब प्रभुपाद के शब्दों से हरे कृष्ण आंदोलन के बारे में मेरी सभी चिन्ताएँ शान्त हो गईं। प्रभुपाद से यह मेरा अत्यन्त घनिष्ठ व्यक्तिगत सम्पर्क था। प्रभुपाद ने जो कुछ कहा उसका उतना महत्त्व नहीं था, महत्त्व मेरे विषय में उनको व्यक्तिगत दिव्य चिन्ता का था। तो मैं उनकी कक्षाओं में प्रतिदिन जाने लगा और उनके दर्शन करने लगा और मेरे मन में कोई संदेह नहीं रह गया। उन्होंने कृष्णभावनामृत के सभी स्तरों पर मुझे बहुत अच्छी तरह आश्वस्त कर दिया ।

जब प्रभुपाद चले गए तो भक्तों ने कहा कि मुझे उन सब के साथ समस्त भारत की परिक्रमा पर जाना चाहिए और उन्होंने बताया कि प्रभुपाद ने व्यक्तिगत रूप से मुझे आने को कहा है। मेरे मन में प्रभुपाद के प्रति अविश्वसनीय रूप में भूरि-भूरि प्रशंसा के भाव उठे कि प्रभुपाद कितने कृपालु हैं, लेकिन वृंदावन से भी मेरा अतिशय लगाव था । मैने उनसे कहा कि मैं यहीं रहना चाहता हूँ और यदि वे कभी वापस आए तो मैं प्रभुपाद की सेवा यहीं करूँगा, किन्तु मैं वृंदावन छोड़ना नहीं चाहता ।

उसके कुछ समय बाद ही, मेरा वीसा समाप्त हो गया । इसलिए मुझे देश छोड़ना पड़ा। लेकिन मेरे छोड़ने के पहले ही वृंदावन के लोगों, और विशेष कर बाबा लोगों ने मुझे बताया कि स्वामी भक्तिवेदान्त ने पश्चिम में नया वृंदावन स्थापित किया है। उन्होंने कहा, “यदि आप को वृंदावन छोड़ना पड़ रहा है तो आप नया वृंदावन जाइए। आप जो भी करें, वृंदावन को न छोड़िए । नया वृंदावन और प्राचीन वृंदावन एक ही हैं, क्योंकि स्वामी भक्तिवेदान्त ने पश्चिम में वृंदावन का निमार्ण किया है। उन्होंने बड़े गर्व से यह बताया । अतएव मैने नया वृंदावन के लिए प्रस्थान किया । "

प्रभुपाद ने अपने शिष्यों को वृंदावन धाम में रहने के शिष्टाचार का प्रशिक्षण दिया। उन्होंने कहा, "इस पवित्र धाम में यदि मेरा कोई शिष्य किसी पात्र से गलत ढंग से जल पीता है और उस पात्र को गंदा कर देता है तो इसे हर कोई देखेगा। इस गंदगी के लिए आलोचना का पात्र मत बनो, अन्यथा मेरी आलोचना होने लगेगी। शिष्यों का धर्म है कि वे शिष्टता के नियमों का पालन कड़ाई से करें। मैं इस संस्था में भारत में इतनी शक्ति व्यय कर रहा हूँ, क्योंकि मैं तुम लोगों को यहाँ रहने का प्रशिक्षण देना चाहता हूँ ।

प्रभुपाद ने अपने पश्चिम के शिष्यों को वृंदावन में अपनी सफलता के बारे में लिखा ।

मैं इस समय अपने चालीस शिष्यों के दल के साथ वृंदावन में हूँ और यहाँ के पवित्र स्थानों की परिक्रमा प्रतिदिन करता हूँ। हम कल बस से दिल्ली लौटेंगे। वृंदावन के अधिकारियों और निवासियों ने बड़े अच्छे ढंग से हमारा अभिवादन किया है और वे नगर की सड़कों में हमारी संकीर्तन पार्टी को हर्षोल्लास के साथ कीर्तन करते देख कर आश्चर्य से अभिभूत हैं। मेयर ने सार्वजनिक रूप से कहा है कि मैने आश्चर्यजनक कार्य किया है, और सच तो यह है कि वे अनुभव करते हैं कि मेरे पाश्चात्य देशों में जाने के पहले वहां वृंदावन के बारे में कोई नहीं जानता था । अब तुम्हारे देश से कृष्ण का देश देखने के लिए सैंकड़ों यात्री और हिप्पी आते हैं। वृंदावन के भक्त समझ गए हैं कि वृन्दावन की विश्व - ख्याति केवल मेरे प्रचार के कारण है, इसलिए अब वे अपने नगर के स्वामीजी की इतनी अधिक सराहना कर रहे हैं।

***

दिल्ली

दिसम्बर १, १९७१

दिल्ली लौटने पर प्रभुपाद और उनके चालीस शिष्य, जो उनके साथ वृंदावन गए थे, बिड़ला मंदिर में ठहरे। मेजबान ने प्रभुपाद को औपचारिक बगीचों के पिछले भाग में स्थित एक छोटा-सा मकान, जो विशेष अतिथियों के लिए सुरक्षित रहता था, दिया ।

इस बीच देश की राजधानी में राजनीतिक अशान्ति बनी रही, क्योंकि भारत और पाकिस्तान के बीच पूरे युद्ध का खतरा बढ़ता जा रहा था। शांत वृंदावन भी, जो दिल्ली से केवल नब्बे और आगरा से चौंतीस मील पर स्थित था, और जहाँ सेना का बृहत् जमाव था, अशान्त हो गया। एक रात जब प्रभुपाद सराफभवन में सोए थे तो स्थानीय अधिकारियों ने ब्लैक आउट की घोषणा कर दी थी। श्रील प्रभुपाद और उनके शिष्यों को उनके कमरों तक सीमित हो जाना पड़ा था, बिजली बंद हो गई थी, हर एक ने अपनी खिड़कियों को कम्बलों से ढक दिया था जिससे मोमबत्ती का प्रकाश भी बाहर से न देखा जा सके।

लेकिन राजनीतिक हलचलों और युद्ध के खतरे के बावजूद, प्रभुपाद धर्मोपदेश करने के लिए अब दिल्ली पहुँच गए थे। दिल्ली पहुँचने के दूसरे दिन वे अमरीकी दूतावास में, भारत में अमेरिका के राजदूत, केनेथ कीटिंग, से मिले।

श्रील प्रभुपाद ने मिस्टर कीटिंग को कृष्णभावनामृत की मूल विचारधारा की व्याख्या की : भौतिक शरीर और आत्मा या शरीर में निवास करने वाला आत्मा । उन्होंने मिस्टर कीटिंग से कहा, “आप के पास यह धारीदार कोट है, किन्तु मैं आपको मिस्टर धारीदार कोट कह कर सम्बोधित नहीं कर सकता। इस पर भी हम इसी तरह सम्बोधित किए जा रहे हैं। इस शरीर के साथ हमारा तादात्म्य किया जा रहा है।" और प्रभुपाद ने चौरासी लाख योनियों में से आत्मा के स्थानान्तरण की व्याख्या की ।

मि. कीटिंग ने टिप्पणी की, "यह बहुत मनोरंजक है। मैं आत्मा के स्थानान्तरण में विश्वास करता हूँ ।

प्रभुपाद बोले, "यह यथार्थ है । ठीक जैसे यह बच्चा एक शरीर से दूसरे शरीर में स्थानान्तरण कर रहा है” – उन्होंने सरस्वती की ओर इशारा किया - " उसी तरह जब मैं इस शरीर का त्याग करूँगा तो मैं दूसरे शरीर में स्थानान्तरण कर जाऊँगा । यह एक विज्ञान है।

“मैं देखता हूँ कि अमरीकी लड़के और लड़कियाँ, यद्यपि वे धनी और सम्मान्य परिवारों के होते हैं, हिप्पी बनते जा रहे हैं। आप लोगों ने बड़े-बड़े विश्वविद्यालय स्थापित कर रखे हैं, फिर भी वे निराशा - ग्रस्त होते जा रहे हैं। भौतिक सम्पन्नता में और अधिक रहने से उन्हें संतोष नहीं है । इस तरह मानव समाज की वर्तमान स्थिति आपदापूर्ण है, क्योंकि हर एक असंतुष्ट और भ्रमित अनुभव कर रहा है । "

मिस्टर कीटिंग ने पूछा, "क्या आप के विदेशी और भारतीय दोनों तरह के अनेक शिष्य हैं ? "

“हाँ, जहाँ तक भारतीयों का सम्बन्ध है उनमें से प्रत्येक कृष्ण को परम ईश्वर मानता है । "

मि. कीटिंग ने कहा, “मैं इन अमरीकी युवकों की निष्ठा से बहुत प्रभावित हूँ |

प्रभुपाद बोले, “प्रत्येक व्यक्ति ज्योंही कृष्णभावनामृत का विज्ञान समझ जाता है, वह उसे तुरंत स्वीकार कर लेता है । '

मि. कीटिंग ने कहा, "जब स्वामी राजनंदजी यहाँ आए थे तो मैंने उनसे ईश्वर की परिभाषा पूछी। वे एक मिनट सोचते रहे। फिर बोले, 'हाँ, मैं कहूँगा कि ईश्वर वह सूत्र है जो एक अच्छे व्यक्ति को दूसरे अच्छे व्यक्ति से जोड़ता है।' मैं समझता हूँ कि वह बहुत मजेदार परिभाषा थी । "

प्रभुपाद ने कहा, "इसका उल्लेख भगवद्गीता में है। आपके पास मोतियों का एक हार है और वह धागे से पिरोया हुआ है। सभी मोती उस धागे में स्थित हैं । उसी तरह हर वस्तु ईश्वर में स्थित है—यही नहीं कि केवल अच्छे लोग ही उस धागे रूपी ईश्वर में स्थित हों । वेदान्त सूत्र में दी गई परिभाषा सर्वथा पूर्ण है— जन्माद्यस्य यतः । ईश्वर प्रत्येक वस्तु का मूल उद्गम स्थान है । आपका क्या कहना है ?"

मि. कीटिंग ने उत्तर दिया, “मैं बहुत प्रभावित हूँ।”

प्रभुपाद ने बोलना जारी रखा, “ ईश्वर की एक दूसरी परिभाषा यह है कि वह सर्व आकर्षक है। प्रत्येक प्राणी में किसी सीमा तक वैभव, शक्ति, यश, सौन्दर्य, त्याग, और ज्ञान का आकर्षण होता है । आप अपने देश के राजदूत या प्रतिनिधि हैं। इसलिए आप में आकर्षण है। कभी कभी कुछ लोग मेरे पास आते हैं और कहते हैं, 'हम स्वामीजी से मिलेंगे।' इस तरह यह आकर्षण हर एक में होता है । किन्तु ईश्वर का अर्थ है: वह जो अपने में सम्पूर्ण आकर्षण रखता है । '

कुछ समय के पश्चात् राजदूत कीटिंग ने क्षमा-याचना की, उन्हें किसी अन्य कार्यक्रम में जाना था। “मैं एक राजदूत हूँ। मुझे लोकोत्तर से लेकर तुच्छ सांसारिक मामले देखने पड़ते हैं। आपके आगमन से मुझे बड़ी प्रसन्नता हुई । "

श्रील प्रभुपाद, “मैं भी अब सांसारिक दृष्टिकोण पर आ रहा हूँ। अगली बार जब मैं संयुक्त राज्य आऊँगा तो राष्ट्रपति से मिलना चाहूँगा । "

मि. कीटिंग ने तत्परता जताई, "मैं एक पत्र लिख सकता हूँ। आपकी सहायता करने में मुझे प्रसन्नता होगी ।

प्रभुपाद मुसकराए, 'आप सारे संसार की सहायता करने में व्यस्त हैं जिससे शान्ति स्थापित हो और लोग सुखी हो सकें। किन्तु सुखी होने की बजाय आपके देश के लोग हिप्पी बनते जा रहे हैं— कुछ गड़बड़ है। और यह एक अवसर है उस गड़बड़ को ठीक करने का — कृष्णभावनामृत । अतएव हम कुछ ठोस, वैज्ञानिक कार्य करें जिससे लोग सुखी बन सकें ।

उस शाम को प्रभुपाद ने अपने एक शिष्य को मि. कीटिंग से भेंट के बारे में लिखा ।

तुम्हें जान कर प्रसन्नता होगी कि यहाँ दिल्ली में आज सवेरे मैने भारत में तुम्हारे अमरीकी राजदूत मि. केनेथ कीटिंग से भेंट की । हमारे आंदोलन के लिए उनके मन में बड़ा सम्मान है और उन्होंने वादा किया है कि जब शायद अगली वसंत ऋतु के अंत में मैं तुम्हारे देश वापस लौटूंगा तो तुम्हारे राष्ट्रपति से भेंट की व्यवस्था करने में वे मेरी सहायता करेंगे। मैने उनसे प्रार्थना की है कि वे इस आंदोलन की सहायता करें और यह सहायता हिप्पियों को सुखी लोगों में बदल कर तुम्हारे देश को बड़ी आपदा से बचाएगी ।... देखें क्या होता है।

अगले दिन जब प्रभुपाद प्रातः भ्रमण के लिए दिल्ली की सड़कों पर निकले थे तो उन्होंने अपने एक शिष्य के पास से साइकिल पर गुजरते हुए समाचार-पत्र बेचने वाले एक लड़के से समाचार पत्र की एक प्रति खरीदने को कहा । प्रभुपाद ने सुर्खियाँ पढ़ी : " आपात् स्थिति लागू, शत्रु के तीन वायुयान मार गिराए गए। " उन्होंने एक भक्त से ऊँची आवाज़ में पढ़वाया ।

पाकिस्तान ने पश्चिमी मोर्चे पर भारी आक्रमण कर दिया है। भारत के सात हवाई अड्डों पर बमबारी की गई। पूंच्छ में बड़ी संख्या में पाकिस्तानी सैनिकों ने युद्ध विराम रेखा का अतिक्रमण किया। प्रधानमंत्री ने आज रात आकाशवाणी के अपने प्रसारण में इसे भारत के विरुद्ध पाकिस्तान द्वारा पूर्ण युद्ध की घोषणा बताया । ... इसके पूर्व राष्ट्रपति ने राष्ट्रीय आपात स्थिति की घोषण की ।

राष्ट्रीय आपात स्थिति का अन्तर्राष्ट्रीय मतलब यह था कि अमेरिका भारत को आपूर्ति बंद करके पाकिस्तान की सहायता करेगा, चीन भारत को धमकाएगा और रूस भारत की सहायता करेगा ।

श्रील प्रभुपाद तत्काल बोले, "यह युद्ध बहुत दिनों तक नहीं चलेगा। यह जल्दी ही समाप्त हो जायगा । और पाकिस्तान हार जायगा ।'

उस दिन देर रात में उन्होंने इंदिरा गांधी को आकाशवाणी पर प्रसारण करते हुए सुना ।

मैं इस समय अपने देश और अपनी जनता के लिए बड़े खतरे के क्षण में बोल रही हूँ।... आज बंगलादेश का युद्ध भारत का युद्ध बन गया है। इससे मुझ पर, मेरी सरकार पर और भारत की जनता पर बड़ी जिम्मेदारी आ गई है। अपने देश को युद्ध में संलग्न करने के अतिरिक्त हमारे सामने अन्य कोई विकल्प नहीं है । "

प्रभुपाद भयभीत नहीं हुए। केवल युद्ध ही " भयानक वास्तविकता” नहीं है। जन्म, मरण, वृद्धावस्था, रोग और अनेक अन्य भौतिक विपदाएँ भी अनिवार्य हैं— युद्ध हो या न हो । किन्तु प्रभुपाद समाचारों से अवगत होते रहे और किसी किसी दिन श्यामसुंदर उनके लिए तीन-चार विभिन्न समाचार-पत्र खरीद लाता था ।

कुछ दिन बिड़ला मंदिर में रहने के बाद प्रभुपाद अपने दल के साथ पुरानी दिल्ली के कमला नगर मुहल्ले की एक धर्मशाला में चले गए। वहाँ पर प्रभुपाद ने वे व्याख्यान दिए जिन्हें उनके शिष्य बाद में "ब्लैक आउट व्याख्यान" कहते थे। काले रंग में रंगे अखबारों और काले कम्बलों से खिड़कियाँ ढकी रहती थीं, आसमान में लड़ाकू जेट हवाई जहाज चक्कर लगाते रहते थे और मोमबत्तियों के प्रकाश में कमरे के अंदर प्रभुपाद अपने शिष्यों को व्याख्यान देते रहते थे ।

“इस कलियुग में युद्ध की प्रवृत्ति बहुत बलवान है।” उन्होंने कहा, "और लोगों की मनोवृत्ति इतनी दूषित होती जा रही है कि वे आणविक अस्त्रों के संग्रह में लगे हैं जिससे वे मानवता का विनाश कर सकें।” कभी-कभी प्रभुपाद किसी एक शिष्य से भी लोगों के सामने बोलने को कहते थे। कोई अतिथि तो उपस्थित होता नहीं था, क्योंकि ब्लैक आउट में कोई सड़क पर नहीं चल सकता था और किसी किसी रात में तो पुलिस दरवाजा खटखटाती थी कि भक्तों को मोमबत्तियां भी बुझा देनी चाहिए ।

प्रभुपाद ने एक पत्र में लिखा, “भारत में युद्ध के कारण हमारे कार्यक्रम कम हो गए हैं और हर रात ब्लैकआउट होता है।" दिल्ली में ही नहीं, देश के अन्य भागों में भी, उनके शिष्यों को प्रचार कार्य में कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा था। मायापुर में सरकार द्वारा भक्तों को उस क्षेत्र को छोड़ देने का आदेश दिया गया था, क्योंकि वह बंगलादेश की सीमा के बहुत निकट था।

जैसी कि प्रभुपाद ने भविष्यवाणी की थी, युद्ध बहुत दिन तक नहीं चला। १७ दिसम्बर को प्रभुपाद ने इंडियन एक्सप्रेस की सुर्खियों में पढ़ा, "नियाजी का आत्मसमर्पण, बंगलादेश स्वतंत्र भारत द्वारा पश्चिमी मोर्चे पर एकपक्षीय युद्ध-विराम का निर्णय । प्रभुपाद प्रसन्न हो उठे। उन्होंने अपने भक्तों को विश्वासपूर्वक बताया कि युद्ध की शीघ्र समाप्ति का कारण उनके द्वारा एक महीना पूर्व पंडाल में बृहत् स्तर पर संकीर्तन - यज्ञ था ।

उसी पृष्ठ पर जिस पर भारत की विजय का उद्घोष था, मोटे अक्षरों में यह भी अंकित था— “ प्रधानमंत्री द्वारा युद्ध के लिए संयुक्त राज्य पर दोषारोपण । " इंदिरा गांधी ने राष्ट्रपति निकसन को युद्ध के लिए दोषी ठहराया था । सड़कों में चलते-फिरते अमरीकी भक्त, भारतीयों के अविश्वास का आभास पाकर, बहुत चिन्तित थे और समाचार-पत्रों में प्रतिदिन के प्रचार से स्थिति और भी खराब हो रही थी । प्रभुपाद ने लिखा, "इस समय भारत में अमेरिका के विरुद्ध बहुत अधिक प्रचार है। इसका कारण उस देश का भारत के विरुद्ध व्यवहार और भारत का पाकिस्तान से युद्ध है । "

दिल्ली राजनीतिक हलचलों का केन्द्र बन गया था, और प्रभुपाद ने अपने शिष्यों को वहाँ से अन्यत्र भेज देने का निर्णय किया । यद्यपि उनके शिष्य शान्तिपूर्ण और राजनीतिक कार्यकलापों से दूर थे, फिर भी प्रभुपाद ने कुछ को कलकत्ता भेज दिया और शेष को वे अपने साथ बम्बई ले गए। अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति से महाप्रभु चैतन्य के आन्दोलन की अग्रसर होती लहर रुकने वाली नहीं थी ।

 
 
 
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